जटा टवी गलज्जल प्रवाह पावितस्थले गलेऽव लम्ब्य लम्बितां भुजङ्ग तुङ्ग मालिकाम्। डमड्ड डमड्ड डमड्ड मन्निनाद वड्डमर्वयं चकार चण्ड ताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम्॥ जटा कटाह संभ्रम भ्रमन्निलिम्प निर्झरी विलोल वीचिवल्लरी विराजमान मूर्धनि। धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्ट पावके किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम॥ धराधरेन्द्र नन्दिनी विलासबन्धु बन्धुर स्फुरद्दिगन्त सन्तति प्रमोद मानमानसे। कृपाकटाक्ष धोरणी निरुद्धदुर्धरापदि क्वचिद्विगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि॥ ॥ इति शिव तांडव स्तोत्रम् समाप्तम् ॥