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अनंत शेष: भगवान विष्णु के नीचे विराजमान दिव्य नाग का रहस्य
Spiritual Wisdom

अनंत शेष: भगवान विष्णु के नीचे विराजमान दिव्य नाग का रहस्य

7 मिनट पढ़ेंप्रकाशित जून 16, 2026
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By Anjali Mehta · Editor, M.A. Religious Studies

Reviewed by Dr. Suresh Iyer · Vastu Shastra & Jyotish, 18+ years

अनंत शेष कौन हैं?

अनंत शेष, जिन्हें आदिशेष या शेषनाग भी कहा जाता है, वह विशाल बहुफणी दिव्य नाग हैं जिन पर भगवान विष्णु क्षीरसागर नामक दुग्ध-सागर में शयन करते हुए दर्शाए जाते हैं। माता लक्ष्मी उनके चरणों के पास बैठकर सेवा करती हैं, यह दृश्य भारत भर के मंदिरों और घरों में विष्णु के सबसे परिचित रूपों में से एक है।

इस नाम का अर्थ भी गहरा है, अनंत का अर्थ है 'जिसका कोई अंत नहीं', और शेष का अर्थ है 'जो शेष रह जाता है'। दोनों मिलकर उस सत्ता की ओर संकेत करते हैं जो सृष्टि और प्रलय के हर चक्र से परे स्थिर रहती है।

अनंत शेष से जुड़ी कथा

परंपरा के अनुसार, शेष सर्प ऋषि कश्यप के अनेक नाग-पुत्रों में से एक थे, परंतु अपने भाई-बहनों की आपसी कलह और स्पर्धा से हटकर उन्होंने पूरी तरह तपस्या और विष्णु-भक्ति का मार्ग चुना। उनके इस अनुशासन से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने उन्हें समस्त पृथ्वी को अपने फण पर स्थिर रखने का महान दायित्व सौंपा, ऐसा कहा जाता है।

शेष की अटूट भक्ति से प्रसन्न होकर विष्णु ने उन्हें अपना शाश्वत आसन और शय्या बनाया। कुछ परंपराओं में यह भी माना जाता है कि आगे चलकर शेष की भक्ति रामायण में लक्ष्मण और कृष्ण-लीला में बलराम के रूप में प्रकट हुई, हालांकि भक्त इन संबंधों को श्रद्धा और आस्था के विषय के रूप में स्वीकार करते हैं, न कि ऐतिहासिक तथ्य के रूप में।

अनंत शेष का प्रतीकात्मक अर्थ

अनंत शेष स्वयं अनंत काल का प्रतीक हैं, वह आधार जो सृष्टि के एक चक्र के अंत में प्रलय के बाद भी शेष रहता है। उनके असंख्य फण सृष्टि के अनगिनत आयामों के प्रतीक माने जाते हैं, जो सभी ईश्वर के आश्रय और संरक्षण में स्थित हैं।

विशाल शेषनाग पर शांतिपूर्वक शयन करते विष्णु का यह दृश्य, जिनके भीतर संपूर्ण सृष्टि विद्यमान है, यह गहरा स्मरण कराता है कि प्रलय के बीच भी एक अडिग व्यवस्था और शांति ईश्वर के आश्रय में सदा बनी रहती है।

पूजा और मंदिरों में अनंत शेष

पूजा और मंदिरों में अनंत शेष

अनंत शेष की स्वतंत्र रूप से पूजा कम ही होती है, परंतु वे विष्णु के अनंतशयन स्वरूप के केंद्र में हैं, जो भारत के अत्यंत पूजनीय मंदिरों में देखने को मिलता है, जैसे तिरुवनंतपुरम का पद्मनाभस्वामी मंदिर और श्रीरंगम का रंगनाथस्वामी मंदिर, जिसका नाम ही शेषनाग पर शयन करते विष्णु को दर्शाता है।

इस रूप का ध्यान करते समय भक्त एक प्रिय श्लोक का पाठ करते हैं: 'शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं' अर्थात 'शांत स्वरूप, सर्प पर शयन करने वाले, कमल-नाभि वाले, देवताओं के स्वामी'। नागपंचमी के अवसर पर भी भक्त शेषनाग का स्मरण करते हैं, जब हिंदू घरों में सामान्यतः सर्पों का सम्मान और पूजन किया जाता है।

अनंत शेष से मिलने वाला सार

अनंत शेष का चिंतन भक्तों को स्थिरता और समर्पण का मूल्य सिखाता है, यह कि सच्ची शक्ति बेचैनी में नहीं बल्कि बिना किसी अपेक्षा के शांत और अटूट सहारे में निहित है, ठीक जैसे शेष बिना किसी शिकायत के पृथ्वी को धारण करते हैं और विष्णु को वहन करते हैं।

परंपरा के अनुसार, इस दिव्य नाग का स्मरण भक्त को याद दिलाता है कि दैनिक जीवन के हर तूफान के नीचे, श्रद्धा में टिकी एक गहरी शांति सदा विद्यमान रहती है, जिसकी ओर सदा लौटा जा सकता है। ऐसे स्वरूपों की पूजा श्रद्धा और प्रेम का कार्य है, व्यापार नहीं।

भक्तों के सामान्य प्रश्न

अनंत शेष नाम का क्या अर्थ है?+

अनंत का अर्थ है असीम और शेष का अर्थ है जो बचा रहता है, दोनों मिलकर इस नाग को अनंत काल के प्रतीक के रूप में दर्शाते हैं, जो सृष्टि के हर चक्र से परे बना रहता है।

क्या अनंत शेष विष्णु का ही रूप हैं या एक अलग सत्ता?+

परंपरा में शेष को विष्णु का ही रूप नहीं, बल्कि एक पृथक, परम भक्त दिव्य नाग माना जाता है जो सदा उनकी सेवा में रहते हैं, हालांकि कुछ भक्त दोनों को सार रूप से अभिन्न भी मानते हैं।

अनंतशयन विष्णु रूप के लिए कौन से मंदिर प्रसिद्ध हैं?+

केरल का पद्मनाभस्वामी मंदिर और तमिलनाडु के श्रीरंगम स्थित रंगनाथस्वामी मंदिर उन सबसे प्रसिद्ध मंदिरों में हैं जहाँ विष्णु को अनंत शेष पर शयन करते हुए पूजा जाता है।

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About the author

Anjali Mehta · Editor, M.A. Religious Studies

Anjali is the managing editor for Vandnaa and oversees the festival and vrat coverage. She holds an M.A. in Religious Studies and reviews every published article for accuracy, accessibility, and tradition-fidelity.

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