देवी चामुंडेश्वरी कौन हैं
मैसूर शहर को निहारती चामुंडी पहाड़ी पर स्थित चामुंडेश्वरी मंदिर दक्षिण भारत के सबसे पूजनीय शक्ति स्थलों में से एक है। यहां की प्रमुख देवी चामुंडेश्वरी को देवी दुर्गा के एक उग्र किंतु करुणामयी स्वरूप के रूप में पूजा जाता है, जिनके विषय में भक्तों का विश्वास है कि वे आज भी नगर और उसके निवासियों की रक्षा करती हैं।
मंदिर का ऊंचा गोपुरम, स्वर्ण-रजत से सुसज्जित गर्भगृह और पारंपरिक सीढ़ियों पर मिलने वाली विशाल नंदी प्रतिमा, इस पहाड़ी तीर्थ के प्रति पीढ़ी दर पीढ़ी बनी भक्ति को दर्शाते हैं। मैसूर के पूर्व राजपरिवार वाडियार वंश के लिए चामुंडेश्वरी सदियों से कुलदेवी के रूप में पूजनीय रही हैं।
इतिहास और महिषासुर की कथा
देवी महात्म्य की परंपरा के अनुसार, महिषासुर नामक भैंस रूपी असुर ने एक वरदान पाकर तीनों लोकों में उत्पात मचाया था, जिसे परास्त करना देवताओं के वश में नहीं रहा। तब सभी देवताओं ने अपनी शक्तियां मिलाकर देवी दुर्गा को प्रकट किया। भक्तों की मान्यता है कि इसी पहाड़ी पर देवी और महिषासुर के बीच घमासान युद्ध हुआ और अंततः देवी ने उसका वध कर उसके अत्याचार का अंत किया।
कहा जाता है कि नीचे बसे नगर का नाम भी इसी कथा से जुड़ा है, समय के साथ 'महिषुरु' शब्द 'मैसूरु' में बदल गया। पहाड़ी की तलहटी के पास आज भी महिषासुर की एक भव्य प्रतिमा इस कथा की याद दिलाती है। मंदिर स्वयं शताब्दियों पुराना माना जाता है, जिसे वाडियार राजाओं ने पीढ़ी दर पीढ़ी अपनी अटूट श्रद्धा से पुनर्निर्मित और समृद्ध किया।
महत्व और भक्त क्या मांगते हैं
भक्तों के लिए चामुंडेश्वरी असत्य पर सत्य की विजय की प्रतीक हैं, यह विश्वास दिलाती हैं कि चाहे कठिनाई कितनी भी विशाल क्यों न लगे, श्रद्धा और धर्म अंततः विजयी होते हैं। परिवार यहां कठिन समय में साहस, संकटों से रक्षा और घर में सुख-शांति की कामना लेकर आते हैं।
- विवाहित स्त्रियां प्रायः अपने परिवार की सुख-समृद्धि और दीर्घायु के लिए प्रार्थना करती हैं
- कई भक्त इन्हें अपनी कुलदेवी मानकर पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा को आगे बढ़ाते हैं
- जो भक्त जीवन की बाधाओं से जूझ रहे हैं, उनके लिए महिषासुर की कथा विशेष अर्थ रखती है
- यह मंदिर मैसूर की पहचान और गौरव से गहराई से जुड़ा हुआ है
दर्शन गाइड: समय, उत्सव और कैसे पहुंचें

अधिकांश दक्षिण भारतीय मंदिरों की तरह चामुंडेश्वरी मंदिर में भी प्रातः और सायं दर्शन का समय होता है, बीच में विश्राम अवधि रहती है, फिर भी यात्रा से पहले स्थानीय जानकारी अवश्य लें।
- सर्वोत्तम समय: शांत दर्शन के लिए प्रातःकाल, या मैसूर दशहरा (लगभग सितंबर-अक्टूबर) के दौरान जब पूरा नगर देवी का भव्य उत्सव मनाता है
- मैसूर दशहरा: नगर का सबसे प्रसिद्ध उत्सव, इस मंदिर की कथा से गहराई से जुड़ा हुआ, जिसमें शोभायात्राएं, रोशनी से सजा महल और सांस्कृतिक आयोजन होते हैं
- चढ़ाई का मार्ग: श्रद्धालु चाहें तो मंदिरों से सजी परंपरागत सीढ़ियों से चढ़ सकते हैं, जिसके मध्य विशाल नंदी प्रतिमा के दर्शन होते हैं
- कैसे पहुंचें: चामुंडी पहाड़ी मैसूर शहर से थोड़ी ही दूरी पर है; निकटतम रेलवे स्टेशन मैसूर जंक्शन है और निकटतम हवाई अड्डा मैसूर एयरपोर्ट है, बेंगलुरु का अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा भी सड़क मार्ग से भली भांति जुड़ा है
जपने योग्य मंत्र और सीख
देवी के समक्ष जपा जाने वाला एक सरल मंत्र है ॐ चामुंडेश्वर्यै नमः, जिसका अर्थ है 'माता चामुंडेश्वरी को नमन।' कई भक्त महिषासुर मर्दिनी स्तोत्र की पंक्तियां भी पढ़ते हैं, जो देवी की असत्य पर विजय का गुणगान करती हैं।
चामुंडेश्वरी की कथा अंततः धैर्य और विश्वास की शिक्षा देती है, कि अंधकार चाहे कितना भी विशाल क्यों न दिखे, अंतिम विजय सदा सत्य की होती है। हर तीर्थ की भांति यहां की पूजा भी श्रद्धा और प्रेम का कार्य है, कोई लेन-देन नहीं।
लोग सबसे ज़्यादा क्या पूछते हैं
चामुंडेश्वरी मंदिर की प्रमुख देवी कौन हैं?+
यहां की प्रमुख देवी चामुंडेश्वरी हैं, जो देवी दुर्गा का एक उग्र स्वरूप हैं और मैसूर के वाडियार राजपरिवार की कुलदेवी तथा महिषासुर की संहारक के रूप में पूजी जाती हैं।
चामुंडेश्वरी मंदिर जाने का सबसे अच्छा समय क्या है?+
शांत दर्शन के लिए प्रातःकाल उपयुक्त है, जबकि मैसूर दशहरा का समय, जो प्रायः सितंबर-अक्टूबर में आता है, विशेष रूप से शुभ माना जाता है क्योंकि पूरा नगर देवी का उत्सव मनाता है।
चामुंडेश्वरी मंदिर का मैसूर दशहरा से क्या संबंध है?+
मैसूर दशहरा देवी की महिषासुर पर विजय का उत्सव है, जिसकी कथा सीधे इस पहाड़ी मंदिर से जुड़ी है, जिससे चामुंडेश्वरी इस पूरे उत्सव की अधिष्ठात्री देवी मानी जाती हैं।
About the author
Pandit Ravindra Sharma · Vedic Rituals & Bhakti, 22+ years
Pandit Ravindra is the Vandnaa editorial team's resident specialist on aarti, chalisa, and daily devotion. He has performed home and temple pujas across Varanasi and Delhi for over two decades and contributes the bhakti-focused articles on this site.
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