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परिवर्तिनी एकादशी 2026 - व्रत कथा, पूजा विधि और महत्व
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परिवर्तिनी एकादशी 2026 - व्रत कथा, पूजा विधि और महत्व

10 मिनट पढ़ेंप्रकाशित जून 10, 2026
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By Pandit Mahesh Trivedi · Festival Traditions & Panchang

Reviewed by Anjali Mehta · Editor, M.A. Religious Studies

परिवर्तिनी एकादशी क्या है?

परिवर्तिनी एकादशी भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को आती है। इसे पार्श्व एकादशी, पद्मा एकादशी या वामन एकादशी भी कहा जाता है। इसका नाम परिवर्तन शब्द से बना है, क्योंकि भक्तों की मान्यता है कि इसी दिन भगवान विष्णु अपनी योग-निद्रा में करवट बदलते हैं, जो देवशयनी एकादशी से आरंभ होती है। कहा जाता है कि वे एक ओर से दूसरी ओर करवट लेते हैं। इस व्रत का पुण्य वाजपेय यज्ञ के समान माना गया है और यह विष्णु को समर्पित सर्वाधिक प्रिय एकादशियों में से एक है।

तिथि और 2026 में कब है

परिवर्तिनी एकादशी भाद्रपद शुक्ल एकादशी को मनाई जाती है, जो ग्रेगोरियन कैलेंडर में प्रायः अगस्त के अंत या सितंबर के आरंभ में पड़ती है। एकादशी तिथि का आरंभ और समाप्ति हर वर्ष बदलती है और आपके स्थान के सूर्योदय पर निर्भर करती है, इसलिए सही तिथि और पारण का समय क्षेत्र के अनुसार भिन्न हो सकता है। व्रत का पारण द्वादशी के दिन सूर्योदय के बाद एक निश्चित अवधि में किया जाता है। हम सुझाव देते हैं कि व्रत आरंभ करने से पहले अपने नगर के लिए सही तिथि और पारण मुहूर्त वंदना पंचांग पर अवश्य देख लें

महत्व और वामन अवतार का संबंध

इस एकादशी का वामन अवतार से विशेष संबंध है, जो भगवान विष्णु का वामन-ब्राह्मण रूप है। राजा युधिष्ठिर को सुनाई गई कथा के अनुसार, इस दिन उपवास का पुण्य इतना महान है कि वह कई जन्मों के संचित पापों को धो देता है। परिवर्तिनी एकादशी पर विष्णु के वामन रूप की पूजा से विनम्रता, समृद्धि और मोक्ष की प्राप्ति मानी जाती है। चूँकि भगवान अपनी चातुर्मास निद्रा के मध्य में हैं, भक्त उनके करवट लेने को इस स्नेहमय स्मरण के रूप में देखते हैं कि ईश्वर विश्राम में भी संसार की रक्षा करते हैं। भक्त तुलसी अर्पित करते हैं, घी का दीप जलाते हैं और दिन को स्मरण व दान को समर्पित करते हैं।

परिवर्तिनी एकादशी व्रत कथा

परिवर्तिनी एकादशी व्रत कथा

यह कथा राजा बलि की है, जो एक उदार किंतु अभिमानी दैत्यराज था और जिसने अपनी भक्ति व पराक्रम से तीनों लोक जीत लिए थे। संतुलन की पुनर्स्थापना के लिए भगवान विष्णु ने वामन अर्थात एक छोटे ब्राह्मण बालक का रूप धारण किया और बलि के विशाल यज्ञ में पधारे। उन्होंने विनम्रता से केवल तीन पग भूमि माँगी। बलि के सहमत होते ही वामन ने विराट त्रिविक्रम रूप धारण कर दो पगों में पृथ्वी और स्वर्ग नाप लिए। तीसरे पग के लिए सत्यनिष्ठ बलि ने अपना शीश अर्पित कर दिया। उसकी सत्यता से प्रसन्न होकर भगवान ने उसे पाताल का राज्य दिया और उसके द्वार की रक्षा का वचन दिया। व्रत में यह कथा सुनने से समर्पण और कृपा में आस्था दृढ़ होती है।

चरणबद्ध पूजा विधि

व्रत को श्रद्धा से करने हेतु यह सरल विधि अपनाएँ: 1. सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। 2. भगवान विष्णु के समक्ष व्रत रखने का संकल्प लें। 3. विष्णु या वामन की मूर्ति या चित्र स्थापित कर उनके समक्ष तुलसी दल अर्पित करें। 4. घी का दीप व धूप जलाएँ तथा पीले पुष्प, चंदन और नैवेद्य अर्पित करें। 5. दिनभर विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें, व्रत कथा पढ़ें और विष्णु मंत्रों का जप करें। 6. अपने स्वास्थ्य अनुसार निर्जल अथवा फलाहार व्रत रखें, अन्न और चने का त्याग करें। 7. रात्रि में जागरण कर भजन और स्मरण करें। 8. द्वादशी को निर्धारित समय में किसी ब्राह्मण या ज़रूरतमंद को भोजन कराकर पारण करें।

जप के लिए मंत्र

इस दिन विष्णु के नामों का जप मन को शुद्ध करता है और भक्ति को गहरा करता है। सबसे सरल और प्रभावशाली मूल मंत्र हैं: 1. ॐ नमो भगवते वासुदेवाय - भगवान विष्णु को द्वादशाक्षर नमस्कार। 2. ॐ नमो नारायणाय - अष्टाक्षर नारायण मंत्र। 3. वामन रूप के लिए ॐ वामनाय नमः का जप करें। आप विष्णु सहस्रनाम का पाठ या अच्युतम केशवम जैसे भजन भी गा सकते हैं। तुलसी की माला पर अपने चुने मंत्र की निश्चित संख्या में आवृत्ति करें और वामन अवतार की विनम्रता व समर्पण की भावना मन में रखें।

व्रत के आध्यात्मिक लाभ

व्रत के आध्यात्मिक लाभ

श्रद्धा से परिवर्तिनी एकादशी का व्रत करने से महान यज्ञों का पुण्य, पूर्व पापों का नाश और भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है। शास्त्रीय वचनों के अतिरिक्त इस व्रत के व्यावहारिक लाभ भी हैं: हल्के आहार से शरीर को विश्राम मिलता है, जबकि जप और कथा से अशांत मन शांत होता है। दान और स्मरण से वही विनम्रता विकसित होती है जो वामन कथा सिखाती है। साथ मिलकर व्रत करने वाले परिवार घर में कृतज्ञता और भक्ति की लय का गहरा अनुभव करते हैं। व्रत को फल के बदले सौदा नहीं, बल्कि भगवान को समय और ध्यान का प्रेमपूर्ण अर्पण मानें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इसे परिवर्तिनी एकादशी क्यों कहते हैं?+

इसका नाम परिवर्तन शब्द से बना है, जिसका अर्थ है करवट लेना। मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु अपनी चार माह की योग-निद्रा में, जो देवशयनी एकादशी से आरंभ होती है, दूसरी ओर करवट लेते हैं।

परिवर्तिनी एकादशी 2026 की सही तिथि क्या है?+

यह भाद्रपद शुक्ल एकादशी को आती है, जो प्रायः अगस्त के अंत या सितंबर के आरंभ में होती है। तिथि और पारण का समय आपके स्थान व सूर्योदय पर निर्भर करता है, इसलिए सही तिथि वंदना पंचांग पर अपने नगर के अनुसार देखें।

इस दिन विष्णु के किस अवतार की पूजा होती है?+

इस दिन विष्णु के वामन अवतार, अर्थात उनके वामन-ब्राह्मण रूप, की विशेष पूजा होती है। इसीलिए इसे वामन एकादशी भी कहते हैं और राजा बलि की कथा पूजा का केंद्र है।

व्रत में कौन-सा आहार लिया जा सकता है?+

भक्त अन्न, चावल और चने का त्याग करते हैं। स्वास्थ्य अनुसार निर्जल व्रत या फल, दूध और जल लिया जा सकता है। दिनभर भारी और तामसिक भोजन से बचा जाता है।

परिवर्तिनी एकादशी का व्रत कब खोलना चाहिए?+

व्रत अगले दिन द्वादशी को सूर्योदय के बाद निश्चित पारण अवधि में खोला जाता है। पारण से पूर्व भोजन दान करना शुभ माना जाता है। पारण मुहूर्त वंदना पंचांग पर देखें।

क्या यह एकादशी व्रत कोई भी रख सकता है?+

हाँ, किसी भी आयु और पृष्ठभूमि के भक्त इसे रख सकते हैं। जो अस्वस्थ, गर्भवती या पूर्ण उपवास में असमर्थ हैं, वे फलाहार के साथ आंशिक व्रत रखकर जप और कथा पर ध्यान दे सकते हैं।

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About the author

Pandit Mahesh Trivedi · Festival Traditions & Panchang

Pandit Mahesh leads the festival-date and Panchang content on Vandnaa. He cross-references multiple regional panchangs (Drik, Vaishnava, Bengali, Marathi) for every festival date published on the site.

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