अन्नपूर्णा स्तोत्रम् क्या है?
अन्नपूर्णा स्तोत्रम् देवी अन्नपूर्णा की एक भक्ति स्तुति है, पार्वती का वह स्वरूप जो संसार को अन्न से पोषित करता है, जिसकी रचना महान आदि शंकराचार्य ने की। देवी काशी (वाराणसी) की अधिष्ठात्री हैं, जो सभी प्राणियों को भोजन कराती हैं।
स्तोत्रम् उनकी सुंदरता, करुणा और अन्न (भोजन), समृद्धि तथा ज्ञान और वैराग्य के उच्च धन को प्रदान करने की शक्ति की स्तुति करता है। यह सम्पन्न, शांतिपूर्ण घर के लिए पढ़ा जाता है जिसमें पोषण की कभी कमी न हो।
अर्थ सहित प्रमुख श्लोक
आरंभिक श्लोक: नित्यानन्दकरी वराभयकरी सौन्दर्यरत्नाकरी निर्धूताखिलघोरपावनकरी प्रत्यक्षमाहेश्वरी। प्रालेयाचलवंशपावनकरी काशीपुराधीश्वरी भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी॥
अर्थ: हे नित्य आनंद देने वाली, वर और अभय प्रदान करने वाली, सौंदर्य की रत्नाकर; समस्त पापों को हरने वाली; प्रत्यक्ष महेश्वरी; हिमालय वंश को पावन करने वाली; काशी की अधीश्वरी - हे माता अन्नपूर्णेश्वरी, अपनी कृपा के सहारे मुझे भिक्षा दें।
प्रसिद्ध समापन प्रार्थना: अन्नपूर्णे सदापूर्णे शंकरप्राणवल्लभे। ज्ञानवैराग्यसिद्ध्यर्थं भिक्षां देहि च पार्वती॥
अर्थ: हे अन्नपूर्णा, सदा परिपूर्ण, शंकर की प्राणप्रिया; ज्ञान और वैराग्य की सिद्धि हेतु मुझे भिक्षा दें, हे पार्वती।
पूर्ण स्तोत्रम् में लगभग बारह श्लोक हैं, प्रत्येक देवी का वर्णन करता है और 'भिक्षां देहि' - मुझे भिक्षा दें - की विनती से समाप्त होता है।
लाभ और पाठ विधि
लाभ:
- अन्न, समृद्धि और वैभव की कभी कमी न होने का आशीर्वाद
- सुखी, सामंजस्यपूर्ण और भरापूरा घर
- कृतज्ञता जो अन्न का सम्मान करती है और उसे कभी बर्बाद नहीं करती
- ज्ञान और वैराग्य का उच्च धन
पाठ विधि: 1. प्रातः, श्रेष्ठ है स्नान के बाद, दिन का भोजन पकाने से पहले पढ़ें। 2. रसोई के पास अन्नपूर्णा या पार्वती के चित्र के समक्ष दीप जलाएँ। 3. स्तोत्रम् श्रद्धा से पढ़ें; परिवार के खाने से पहले भोजन का पहला अंश (भोग) देवी को अर्पित करें। 4. हर भोजन को आशीर्वाद देने और भूखों से अन्न बाँटने की आदत बनाएँ - अन्नपूर्णा की सच्ची पूजा।
इसे अन्नपूर्णा जयंती, शुक्रवार या नवरात्रि को पढ़ना विशेष शुभ है।
लोग सबसे ज़्यादा क्या पूछते हैं
अन्नपूर्णा स्तोत्रम् की रचना किसने की?+
अन्नपूर्णा स्तोत्रम् परंपरागत रूप से 8वीं सदी के महान संत और दार्शनिक आदि शंकराचार्य द्वारा काशी की देवी अन्नपूर्णा की स्तुति में रचित माना जाता है।
'भिक्षां देहि' का क्या अर्थ है?+
'भिक्षां देहि' का अर्थ है 'मुझे भिक्षा दें'। स्तोत्रम् में भक्त विनम्रता से देवी अन्नपूर्णा से अन्न, समृद्धि, और ज्ञान व वैराग्य के उच्च उपहारों की भिक्षा माँगता है।
अन्नपूर्णा स्तोत्रम् कब पढ़ना चाहिए?+
इसे प्रतिदिन प्रातः भोजन पकाने से पहले पढ़ा जा सकता है, और अन्नपूर्णा जयंती, शुक्रवार तथा नवरात्रि में विशेष शुभ है। पाठ के बाद भोजन का पहला अंश देवी को अर्पित करें।
अन्नपूर्णा स्तोत्रम् का मुख्य लाभ क्या है?+
यह घर को अन्न, समृद्धि और वैभव से आशीर्वादित करने, और अन्न कभी बर्बाद न करने वाली कृतज्ञता के साथ ज्ञान व वैराग्य का उच्च धन देने वाला माना जाता है।
About the author
Acharya Vinaya Kapoor · M.A. Sanskrit, Mantra & Stotra Studies
Acharya Vinaya holds an M.A. in Sanskrit from Banaras Hindu University and writes the mantra and stotra commentary on Vandnaa. Her focus is on accurate pronunciation, traditional context, and helping modern readers connect with classical texts.
Meet the Vandnaa editorial team →
