भवानी अष्टकम् क्या है?
भवानी अष्टकम् आठ श्लोकों का स्तोत्र (अष्टक) है जो देवी भवानी को समर्पित है, पार्वती या दुर्गा का सौम्य स्वरूप, जिसे आदि शंकराचार्य ने रचा। भवानी भव (शिव) की संगिनी और अस्तित्व व कृपा की दात्री हैं।
गर्जनशील महिषासुर मर्दिनी स्तोत्र के विपरीत, भवानी अष्टकम् पूर्ण समर्पण (शरणागति) का कोमल गीत है। इसमें भक्त स्वीकार करता है कि उसकी न माता है, न पिता, न मित्र, न धन, न अनुष्ठान या शास्त्र का ज्ञान जो उसे बचा सके - केवल देवी ही उसका आश्रय हैं। हर श्लोक हृदयस्पर्शी टेक 'गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानी' से समाप्त होता है - 'आप ही मेरा आश्रय हैं, केवल आप, हे भवानी।'
आरंभिक श्लोक
स्तोत्र भक्त की पूर्ण असहायता और समर्पण से आरंभ होता है:
देवनागरी: न तातो न माता न बन्धुर्न दाता न पुत्रो न पुत्री न भृत्यो न भर्ता। न जाया न विद्या न वृत्तिर्ममैव गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि॥
लिप्यंतरण: न तातो न माता न बंधुर्न दाता न पुत्रो न पुत्री न भृत्यो न भर्ता न जाया न विद्या न वृत्तिर्ममैव गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि
अर्थ: न पिता, न माता, न संबंधी, न दाता, न पुत्र, न पुत्री, न सेवक, न पति, न पत्नी, न विद्या, न कोई आजीविका सचमुच मेरी है। आप ही मेरा आश्रय हैं, केवल आप ही मेरा आश्रय हैं, हे भवानी।
इन थोड़े शब्दों में संत हर सांसारिक सहारा त्यागकर अपना समस्त अस्तित्व दिव्य माता में विश्राम कराते हैं। टेक 'गतिस्त्वं' ('आप ही आश्रय हैं') आठों श्लोकों का समापन करती है।
लाभ और आंतरिक अर्थ
भवानी अष्टकम् आश्रय और शांति के स्तोत्र रूप में प्रिय है:
- संकट में शांति: शोक, भय या हानि के समय इसका पाठ सांत्वना और माता द्वारा थामे जाने का भाव देता है।
- अहंकार का त्याग: यह सिखाता है कि कोई सांसारिक सहारा अंततः हमारा नहीं, जिससे अभिमान और आसक्ति घुल जाती है।
- समर्पण (शरणागति) की गहराई: यह दिव्य की शरण लेने की सबसे सरल और शुद्ध अभिव्यक्तियों में से एक है।
- चिंता से मुक्ति: सम्पूर्ण भार देवी में रखने से चिंता और बेचैनी सहज होती है।
- भक्ति की मधुरता: इसके कोमल शब्द और टेक हृदय को स्वाभाविक रूप से भक्ति की ओर मोड़ते हैं।
आंतरिक अर्थ गहन है: जब हर बाहरी सहारा अनित्य दिखता है, तब आत्मा अपना एकमात्र स्थायी आश्रय दिव्य माता में पाती है, जो शरणागत को कभी नहीं त्यागतीं।
भवानी अष्टकम् का जप कैसे करें

1. उत्तम समय: प्रातः या संध्या, विशेषकर शुक्रवार और नवरात्रि में। यह संकट के क्षणों में या सोने से पहले भी सुंदर प्रार्थना है। 2. तैयारी: स्नान करें, देवी के चित्र के समक्ष बैठें, और यदि संभव हो तो दीप व धूप जलाएँ। 3. भाव: यह समर्पण का स्तोत्र है, इसलिए इसे शीघ्रता से नहीं, भाव से धीरे जपें। अर्थ को हृदय में उतरने दें। 4. पाठ: आठों श्लोक गाएँ, और टेक 'गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि' को हर बार आश्रय के भाव को गहरा करने दें। 5. नित्य अभ्यास: दिन में एक बार भी भक्ति से इसका पाठ मन को शांति और स्थिरता देता है। 6. समापन: क्षण भर शांत बैठें, अपनी चिंताएँ माता को अर्पित करें, और सरल प्रणाम तथा प्रार्थना से समापन करें।
भक्तों के सामान्य प्रश्न
भवानी अष्टकम् की रचना किसने की?+
भवानी अष्टकम् परंपरागत रूप से आदि शंकराचार्य को समर्पित है, जो महान संत और अद्वैत दार्शनिक थे। यह उनके सबसे प्रिय समर्पण स्तोत्रों में से एक है।
'गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि' का अर्थ क्या है?+
इसका अर्थ है 'आप ही मेरा आश्रय हैं, केवल आप ही मेरा आश्रय हैं, हे भवानी।' यह टेक आठों श्लोकों के अंत में आती है, जो भक्त के एकमात्र सहारे रूप में देवी के प्रति पूर्ण समर्पण व्यक्त करती है।
देवी भवानी कौन हैं?+
भवानी देवी पार्वती या दुर्गा का सौम्य स्वरूप हैं, भव (शिव) की संगिनी और जीवन व कृपा की दात्री। वे व्यापक रूप से पूजी जाती हैं, विशेषकर महाराष्ट्र में तुलजा भवानी के रूप में।
भवानी अष्टकम् कब पढ़ना चाहिए?+
इसका पाठ प्रतिदिन किया जा सकता है, परंतु यह विशेषकर शुक्रवार, नवरात्रि, और संकट या चिंता के क्षणों में उपयुक्त है, जब इसका समर्पण संदेश गहरी शांति और सांत्वना देता है।
About the author
Acharya Vinaya Kapoor · M.A. Sanskrit, Mantra & Stotra Studies
Acharya Vinaya holds an M.A. in Sanskrit from Banaras Hindu University and writes the mantra and stotra commentary on Vandnaa. Her focus is on accurate pronunciation, traditional context, and helping modern readers connect with classical texts.
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