महिषासुर मर्दिनी स्तोत्र क्या है?
महिषासुर मर्दिनी स्तोत्र, जो अपने पहले शब्दों 'ऐगिरि नंदिनी' से प्रसिद्ध है, आदि शंकराचार्य द्वारा रचित देवी दुर्गा की एक शक्तिशाली स्तुति है। महिषासुर मर्दिनी का अर्थ है 'महिषासुर का वध करने वाली', वह भैंसासुर जिसे देवी ने लोकों की रक्षा हेतु नष्ट किया, जैसा देवी महात्म्य में वर्णित है।
यह स्तोत्र अपनी प्रवाहमयी लय और समृद्ध अनुप्रास के लिए प्रसिद्ध है। प्रत्येक श्लोक स्तुति पर स्तुति करता है, देवी को नंदिनी (पर्वतराज हिमवान की पुत्री), नंद की प्रसन्नता, असुरों की संहारक, और विजयी नृत्य करती परम शक्ति बताता है। यह विशेषकर नवरात्रि में प्रिय है, जब भक्त देवी के समक्ष इसे पूर्ण भक्ति से गाते हैं।
प्रसिद्ध आरंभिक श्लोक
स्तोत्र इस प्रसिद्ध आह्वान से आरंभ होता है:
देवनागरी: अयि गिरिनन्दिनि नन्दितमेदिनि विश्वविनोदिनि नन्दिनुते गिरिवरविन्ध्यशिरोऽधिनिवासिनि विष्णुविलासिनि जिष्णुनुते। भगवति हे शितिकण्ठकुटुम्बिनि भूरिकुटुम्बिनि भूरिकृते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥
लिप्यंतरण: अयि गिरि-नंदिनि नंदित-मेदिनि विश्व-विनोदिनि नंदि-नुते गिरि-वर-विंध्य-शिरोऽधि-निवासिनि विष्णु-विलासिनि जिष्णु-नुते भगवति हे शिति-कंठ-कुटुंबिनि भूरि-कुटुंबिनि भूरि-कृते जय जय हे महिषासुर-मर्दिनि रम्य-कपर्दिनि शैल-सुते
अर्थ: हे पर्वतराज की पुत्री, जो पृथ्वी को आनंदित करती हैं और विश्व को विनोदित करती हैं, नंदी द्वारा वंदित; हे विंध्य पर्वत के शिखर पर निवास करने वाली, जिनमें विष्णु आनंदित होते हैं, विजयी इंद्र द्वारा स्तुत; हे भगवती, नीलकंठ शिव की संगिनी, विशाल परिवार वाली, महान कार्य करने वाली - जय हो, जय हो आपकी, हे महिषासुर का वध करने वाली, सुंदर केशराशि वाली, हे शैल पुत्री।
टेक 'जय जय हे महिषासुर-मर्दिनि' हर श्लोक के अंत में लौटती है, जिससे सम्पूर्ण स्तोत्र देवी को विजय का जयघोष बन जाता है।
ऐगिरि नंदिनी जप के लाभ
भक्त इस स्तोत्र का पाठ शक्ति, साहस और देवी की रक्षा के लिए करते हैं:
- साहस और आंतरिक शक्ति: यह स्तुति निर्भयता और कठिनाइयों का सामना करने की शक्ति जगाती है, जैसे दुर्गा ने महिषासुर का सामना किया।
- विघ्न और नकारात्मकता का नाश: इसे गाने से भय, शत्रु और नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है, ऐसा माना जाता है।
- कठिनाइयों पर विजय: विजयी टेक आत्मविश्वास और पार पाने की इच्छाशक्ति जगाती है।
- भक्ति और एकाग्रता: इसकी लय मन को दिव्य माता पर गहन एकाग्रता में खींचती है।
- शक्ति का आशीर्वाद: सच्चा पाठ घर में कल्याण, समृद्धि और शांति के लिए दुर्गा की कृपा का आह्वान करता है।
गहरा लाभ आंतरिक है: असुर के संहारक की स्तुति करके भक्त भीतर की आसुरी प्रवृत्तियों - अहंकार, क्रोध और भय - के नाश की प्रार्थना करता है।
स्तोत्र का जप कैसे करें

1. उत्तम समय: स्नान के बाद प्रातःकाल, या संध्या के समय। यह नवरात्रि में और मंगलवार तथा शुक्रवार को सर्वाधिक प्रभावी है, जो देवी को प्रिय दिन हैं। 2. स्थान: दुर्गा के चित्र के समक्ष बैठें, घी या तेल का दीप जलाएँ और लाल पुष्प, कुमकुम तथा धूप अर्पित करें। 3. प्रणाम से आरंभ: आरंभ से पहले क्षण भर स्थिर होकर, हाथ जोड़कर दिव्य माता को प्रणाम करें। 4. पाठ: श्लोकों की स्वाभाविक प्रवाहमयी लय के साथ जप करें। यदि पूरा स्तोत्र (लगभग बीस श्लोक) लंबा लगे, तो पहले श्लोक से आरंभ करें और सीखते हुए जोड़ते जाएँ। 5. टेक: हर श्लोक के अंत में 'जय जय हे महिषासुर-मर्दिनि' टेक को भाव से गूँजने दें। 6. समापन: दुर्गा आरती, रक्षा और साहस की प्रार्थना तथा प्रसाद वितरण से समापन करें। गति से अधिक निरंतरता और भक्ति महत्वपूर्ण है।
लोग सबसे ज़्यादा क्या पूछते हैं
ऐगिरि नंदिनी स्तोत्र किसने लिखा?+
महिषासुर मर्दिनी स्तोत्र, जो अपने आरंभिक शब्दों 'ऐगिरि नंदिनी' से जाना जाता है, परंपरागत रूप से आदि शंकराचार्य को समर्पित है, जो 8वीं शताब्दी के महान संत और दार्शनिक थे।
महिषासुर मर्दिनी का अर्थ क्या है?+
महिषासुर मर्दिनी का अर्थ है 'महिषासुर का वध करने वाली'। यह देवी दुर्गा की उपाधि है, जिन्होंने लोकों की रक्षा हेतु भैंसासुर महिषासुर का नाश किया, जैसा देवी महात्म्य में वर्णित है।
ऐगिरि नंदिनी जप का उत्तम समय कब है?+
यह नवरात्रि में और मंगलवार तथा शुक्रवार को सर्वाधिक प्रभावी है, जो देवी को प्रिय दिन हैं। स्नान के बाद प्रातःकाल या संध्या इसके पाठ के लिए उत्तम समय हैं।
इस स्तोत्र के पाठ के लाभ क्या हैं?+
नियमित पाठ साहस, आंतरिक शक्ति और देवी की रक्षा देता है, भय, विघ्न और नकारात्मकता दूर करता है, ऐसा माना जाता है। आध्यात्मिक रूप से यह भीतर की आसुरी प्रवृत्तियों - अहंकार, क्रोध और भय - पर विजय की प्रेरणा देता है।
About the author
Acharya Vinaya Kapoor · M.A. Sanskrit, Mantra & Stotra Studies
Acharya Vinaya holds an M.A. in Sanskrit from Banaras Hindu University and writes the mantra and stotra commentary on Vandnaa. Her focus is on accurate pronunciation, traditional context, and helping modern readers connect with classical texts.
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