भीमाशंकर कहाँ है
भीमाशंकर छठा ज्योतिर्लिंग है, जो महाराष्ट्र के सह्याद्रि (पश्चिमी घाट) में, पुणे से लगभग 110 किमी दूर खेड़ तालुका में स्थित है। यह घने, धुंध भरे वनों के बीच बसा है जो भीमाशंकर वन्यजीव अभयारण्य बनाते हैं, जो दुर्लभ भारतीय विशालकाय गिलहरी का घर है। यह मंदिर भीमा नदी के उद्गम के रूप में पूजित है, जो यहाँ से निकलकर दक्षिण-पूर्व में कृष्णा से मिलने जाती है। इसका दूरस्थ, हरा-भरा परिवेश दर्शन को आध्यात्मिक तीर्थ के साथ-साथ प्रकृति की यात्रा भी बना देता है।
देवता और लिंग रूप
यहाँ भगवान शिव भीमाशंकर रूप में पूजे जाते हैं, वह प्रभु जिन्होंने एक राक्षस का नाश करने हेतु भीम का विशाल रूप धारण किया। स्वयंभू (स्वयं प्रकट) लिंग चौड़ा और मोटा है, इसीलिए कुछ इसे मोटेश्वर महादेव - 'विशाल प्रभु' कहते हैं। मंदिर पत्थर की नागर शैली में बना है, जिसमें बाद में हेमाडपंथी शैली के निर्माण जुड़े। भक्त इस लिंग में शिव के उस उग्र किंतु रक्षक रूप को देखते हैं जो अपने भक्तों की रक्षा हेतु उठ खड़े होते हैं।
त्रिपुरासुर की कथा
शिव पुराण के अनुसार, कुम्भकर्ण के पुत्र भीम (कुछ कथाओं में त्रिपुरासुर) नामक एक शक्तिशाली राक्षस ने देवताओं व ऋषियों को त्रस्त किया और शिव की पूजा वर्जित कर दी। जब उसकी क्रूरता चरम पर पहुँची और उसने पूजा करते एक भक्त राजा पर आक्रमण किया, तब भगवान शिव लिंग से प्रकट हुए एक भयंकर रूप में और राक्षस को भस्म कर दिया। देवताओं की प्रार्थना पर शिव यहाँ ज्योतिर्लिंग रूप में रहने को सहमत हुए, और युद्ध के पसीने से भीमा नदी बनी कही जाती है।
भीमाशंकर की विशेषता क्या है

भीमाशंकर उन कुछ ज्योतिर्लिंगों में है जो वनाच्छादित पर्वतीय अभयारण्य में गहराई में बसे हैं, इसलिए यह तीर्थ भक्ति को झरनों, शिखरों व प्राचीन वृक्षों की सुंदरता से जोड़ता है। यह दक्कन की पवित्र जीवनरेखा भीमा नदी का उद्गम है। मंदिर परिसर में एक पुराना नंदी, 18वीं सदी में भेंट की गई घंटी और पास के मोक्षकुंड व गुप्त भीमाशंकर स्थल हैं। शीतल, धुंध भरी जलवायु और घनी हरियाली पूरे स्थल को एक दुर्लभ, शांत पवित्रता देती हैं।
दर्शन और यात्रा सुझाव
मंदिर आमतौर पर प्रातः लगभग 4:30 बजे काकड़ आरती के लिए खुलता है और दिनभर शाम की आरती तक खुला रहता है, लगभग 9:30 बजे रात्रि को बंद होता है; पर्वों के दौरान समय की पुष्टि करें। निकटतम रेलवे स्टेशन व हवाई अड्डा पुणे में हैं, जहाँ से सड़क व बस सेवाएँ मंदिर तक पहुँचती हैं। मुख्य मार्ग से मंदिर तक पत्थर की सीढ़ियों की श्रृंखला उतरती है, अतः आरामदायक जूते पहनें। सर्वोत्तम ऋतु मानसून के बाद (अक्टूबर से फरवरी) है जब वन हरा-भरा होता है पर रास्ते सूखे व सुरक्षित रहते हैं।
जप हेतु शिव मंत्र
दर्शन से पूर्व भक्त सरल व शक्तिशाली पंचाक्षर मंत्र का जप करते हैं:
ॐ नमः शिवाय
अनेक भक्त स्वास्थ्य व रक्षा हेतु महामृत्युंजय मंत्र भी पढ़ते हैं:
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्॥
शांत, भक्तिमय मन से जप करते हुए लिंग पर बेलपत्र, जल और श्वेत पुष्प अर्पित करें।
भीमाशंकर के पर्व

महाशिवरात्रि यहाँ का सबसे भव्य पर्व है, जो रातभर की पूजा व अभिषेक हेतु विशाल भीड़ खींचता है। पवित्र श्रावण मास में जल व बेलपत्र अर्पित करते भक्तों का अटूट प्रवाह रहता है। कार्तिक पूर्णिमा और त्रिपुरी पूर्णिमा भी विशेष पूजा व दीप प्रज्वलन से मनाई जाती हैं, जो राक्षस त्रिपुरासुर के नाश का स्मरण कराती हैं। इन दिनों वन-मंदिर दीपों से जगमगाता है और 'हर हर महादेव' की गूँज से भर उठता है।
त्वरित उत्तर
भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग कहाँ स्थित है?+
भीमाशंकर छठा ज्योतिर्लिंग है, जो महाराष्ट्र की सह्याद्रि पहाड़ियों में पुणे से लगभग 110 किमी दूर बसा है। यह एक वनाच्छादित वन्यजीव अभयारण्य के भीतर है और भीमा नदी का उद्गम है।
इसे भीमाशंकर क्यों कहते हैं?+
इसका नाम राक्षस भीम के नाम पर है जिसे शिव ने यहाँ विशाल रूप में नष्ट किया। उस युद्ध के पसीने से भीमा नदी बनी कही जाती है, और शिव भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग रूप में यहाँ रह गए।
भीमाशंकर जाने का सर्वोत्तम समय कौन सा है?+
अक्टूबर से फरवरी, मानसून के ठीक बाद, आदर्श है जब वन हरा-भरा होता है पर रास्ते सूखे व सुरक्षित रहते हैं। महाशिवरात्रि और श्रावण मास सबसे अधिक आध्यात्मिक रूप से ऊर्जावान समय हैं।
भीमाशंकर मंदिर कैसे पहुँचें?+
निकटतम रेलवे स्टेशन व हवाई अड्डा पुणे में हैं, लगभग 110 किमी दूर, जो सड़क व नियमित बसों से जुड़े हैं। मुख्य मार्ग से मंदिर तक पत्थर की सीढ़ियाँ उतरती हैं, अतः आरामदायक जूते सुझाए जाते हैं।
भीमाशंकर में क्या अर्पित करना चाहिए?+
भक्त 'ॐ नमः शिवाय' का जप करते हुए लिंग पर जल, बेलपत्र, श्वेत पुष्प और दूध अर्पित करते हैं। अनेक स्वास्थ्य व रक्षा हेतु महामृत्युंजय मंत्र भी पढ़ते हैं।
भीमाशंकर में कौन से पर्व मनाए जाते हैं?+
महाशिवरात्रि सबसे भव्य है, जिसमें रातभर पूजा होती है। श्रावण मास, कार्तिक पूर्णिमा और त्रिपुरी पूर्णिमा भी विशेष पूजा व मंदिर भर दीप प्रज्वलन से मनाई जाती हैं।
About the author
Pandit Ravindra Sharma · Vedic Rituals & Bhakti, 22+ years
Pandit Ravindra is the Vandnaa editorial team's resident specialist on aarti, chalisa, and daily devotion. He has performed home and temple pujas across Varanasi and Delhi for over two decades and contributes the bhakti-focused articles on this site.
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