चौदह देवता कौन हैं
चतुर्दश देवता, अर्थात चौदह देवता, त्रिपुरा की पूर्व रियासत के परंपरागत अधिष्ठाता देव हैं। वे वर्तमान नगर से कुछ किलोमीटर दूर पुराने अगरतला, जिसे पुरान हवेली भी कहते हैं, स्थित चतुर्दश देवता मंदिर में विराजित हैं।
चौदह की सूची त्रिपुरा के राजाओं के इतिहास ग्रंथ राजमाला में मिलती है, और इसमें वे स्वरूप हैं जिन्हें हिंदू भक्त तुरंत पहचानते हैं:
- हर, शिव
- उमा, पार्वती
- हरि, विष्णु
- मा, लक्ष्मी
- वाणी, सरस्वती
- कुमार, कार्तिकेय
- गणप, गणेश
- विधि, ब्रह्मा
- पृथ्वी
- समुद्र
- गंगा
- अग्नि
- कामदेव
- हिमाद्रि, हिमालय
विशिष्ट बात यह है कि इनकी उपासना पूर्ण प्रतिमा रूप में नहीं होती। केवल देवताओं के मुख धातु में विराजित और पूजित हैं, इसीलिए भक्त इसे प्रायः चौदह मुखों का मंदिर कहते हैं।
यह सूची स्वयं बहुत कुछ बताती है। पौराणिक देवताओं के साथ यहां पृथ्वी, समुद्र, नदी, अग्नि और पर्वत भी स्वतंत्र देव रूप में पूजित हैं।
चंताई: जनजातीय समाज से आने वाला पुरोहित
इस उपासना की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसे कौन संपन्न करता है।
चतुर्दश देवता के प्रमुख पुरोहित को चंताई कहा जाता है, और यह पद ब्राह्मण वंश का नहीं, जनजातीय त्रिपुरी समाज का है। त्रिपुरा के माणिक्य राजाओं के काल से यही व्यवस्था चली आ रही है और आज भी जारी है।
व्यवहार में इसका अर्थ:
- मंदिर के अनुष्ठान त्रिपुरी समाज की परंपरा के अनुसार होते हैं, अपनी विधि, पूजा भाषा और सामग्री सहित
- त्रिपुरा के राजकीय संरक्षण ने इस व्यवस्था को बदला नहीं, बनाए रखा, इसलिए राज्य के प्रमुख देवताओं की सेवा सदा जनजातीय पुरोहित के हाथ रही
- इसीलिए यह मंदिर उस दुर्लभ उदाहरण में है जहां किसी रियासत के आधिकारिक देवता पूरी तरह जनजातीय अनुष्ठान परंपरा में संभाले गए
चंताई के साथ मंदिर में अन्य परंपरागत पदाधिकारी भी हैं, जिनकी वार्षिक उत्सवों में निश्चित वंशानुगत भूमिकाएं हैं।
आगंतुकों के लिए सबसे पहले यही समझने योग्य है। चतुर्दश देवता न तो हिंदू उपासना में समाई किसी जनजातीय परंपरा का उदाहरण हैं, न स्थानीय देवताओं की जगह लेते हिंदू देवताओं का। वे दोनों को साथ बनाए रखने का उदाहरण हैं, जिसके केंद्र में जनजातीय पुरोहित है।
खर्ची पूजा: चौदह देवताओं का स्नान
खर्ची पूजा चतुर्दश देवता का वार्षिक उत्सव है, जो आषाढ़ में होता है, और यह त्रिपुरा का सबसे बड़ा धार्मिक आयोजन है।
यह उत्सव लगभग सप्ताह भर चलता है और उसका क्रम निश्चित है:
- चौदह देवताओं को शोभायात्रा में मंदिर से पास बहने वाली हावड़ा नदी के तट तक ले जाया जाता है
- उन्हें विधिपूर्वक स्नान कराया जाता है, जो उत्सव की केंद्रीय क्रिया है और चंताई तथा परंपरागत पदाधिकारियों द्वारा संपन्न होती है
- फिर देवता मंदिर लौटाए जाते हैं और उत्सव के दिनों तक उनकी पूजा होती है
- साथ ही विशाल मेला लगता है, जिसमें पूरे त्रिपुरा और आसपास के क्षेत्रों से लोग आते हैं
नाम की व्याख्या प्रायः पृथ्वी के दोष या अशुद्धि हटाने के भाव से की जाती है। इस दृष्टि में पृथ्वी, जो स्वयं चौदह में से एक के रूप में पूजित हैं, कृषि चक्र के बाद शुद्धि चाहती हैं, और देवताओं का स्नान वह शुद्धि भूमि तथा उसके लोगों दोनों के लिए पूर्ण करता है।
यही कारण है कि खर्ची किसी एक समाज का नहीं, पूरे राज्य का पर्व माना जाता है। इसमें जनजातीय और गैर जनजातीय, नगर और गांव, सब सम्मिलित होते हैं, और यह मेला त्रिपुरा का प्रमुख वार्षिक आयोजन है।
केर पूजा: बंद सीमाओं का पर्व

खर्ची के लगभग पखवाड़े बाद आती है केर पूजा, जो भारत के सबसे विलक्षण अनुष्ठानों में से एक है।
केर पूजा किसी निर्धारित क्षेत्र की रक्षा के लिए की जाती है। केर शब्द सीमा को दर्शाता है, और यह अनुष्ठान रक्षित किए जा रहे क्षेत्र, ऐतिहासिक रूप से राजधानी, के चारों ओर रक्षा घेरा स्थापित करता है।
अनुष्ठान की अवधि में उस सीमा के भीतर कड़े नियम लागू रहते हैं:
- उस काल में आवागमन प्रतिबंधित रहता है
- निर्माण, तेज़ ध्वनि और कुछ गतिविधियां रोक दी जाती हैं
- परंपरागत रूप से निर्धारित समय पर अग्नि जलाना और कुछ घरेलू कार्य वर्जित रहे हैं
- नियम सीमा के भीतर सब पर समान रूप से लागू होते हैं, समाज कोई भी हो
केर के देवता को प्रतिमा नहीं, रक्षक उपस्थिति माना जाता है, और यहां भी अनुष्ठान परंपरागत पुरोहित द्वारा संपन्न होते हैं।
केर पूजा इसलिए समझने योग्य है कि वह इस व्यवस्था का मूल तर्क दिखाती है। खर्ची शुद्ध करती है, केर रक्षा करती है। एक पर्व पृथ्वी और उसके देवताओं को स्नान कराता है, अगला सीमा को अनिष्ट से बंद करता है। दोनों मिलकर ऐसी भक्ति व्यवस्था दिखाते हैं जो व्यक्तियों के नहीं, एक निश्चित भूमि के कल्याण के लिए बनी है, और किसी राज्य के आधिकारिक देवताओं से यही अपेक्षा थी।
त्रिपुरा की व्यापक भक्ति में चौदह देवता
त्रिपुरा के भक्ति परिदृश्य में शाक्त उपासना, बंगाल से आया वैष्णव प्रभाव और त्रिपुरी तथा अन्य समाजों की परंपराएं साथ मिलती हैं।
- त्रिपुर सुंदरी, माताबाड़ी, उदयपुर - राज्य का सबसे प्रसिद्ध स्थान, शक्तिपीठों में गिना जाने वाला और स्थल की कच्छप आकृति के कारण कूर्म पीठ कहलाने वाला
- चतुर्दश देवता, पुराना अगरतला - राजकीय देवता, खर्ची और केर पूजा सहित
- उदयपुर में गोमती तट पर भुवनेश्वरी मंदिर, माणिक्य राजाओं से जुड़ा और रवींद्रनाथ ठाकुर की रचनाओं से ज्ञात
- उनाकोटी - उत्तर त्रिपुरा की पहाड़ियों में विशाल शैव शिलाचित्र, जिनका पूरा इतिहास आज भी शोध का विषय है
- दुर्गा पूजा और दीपावली - पड़ोसी बंगाल जैसी तीव्रता से, जहां माताबाड़ी का दीपावली मेला विशाल भीड़ खींचता है
इन्हें जोड़ती है माणिक्य राजवंश की दीर्घ संरक्षण परंपरा, जिसने शाक्त और वैष्णव उपासना का सहयोग किया और साथ ही राज्य के अपने चौदह देवताओं को परंपरागत पुरोहित के अधीन बनाए रखा।
यात्रा की योजना बनाने वालों के लिए अगरतला केंद्र है। चतुर्दश देवता मंदिर नगर से थोड़ी दूर है, त्रिपुर सुंदरी और भुवनेश्वरी सहित उदयपुर लगभग एक घंटे पर, और उनाकोटी उत्तर की ओर लंबी यात्रा है।
मंदिर दर्शन
चतुर्दश देवता मंदिर तक पहुंचना सरल है और वर्ष में कभी भी दर्शन हो सकते हैं, पर परंपरा पूर्ण रूप में उत्सव काल में ही दिखती है।
- स्थान - पुराना अगरतला, जिसे पुरान हवेली भी कहते हैं, अगरतला नगर से लगभग आठ किलोमीटर दूर
- उपयुक्त समय - पूर्ण उत्सव के लिए आषाढ़ की खर्ची पूजा, जब देवता नदी तक ले जाए जाते हैं और लगभग सप्ताह भर मेला चलता है। शेष समय सुबह शांत रहती है।
- खर्ची में क्या अपेक्षित है - बहुत बड़ी भीड़, शोभायात्रा मार्ग पर यातायात बंद, मेला परिसर में दुकानें और सांस्कृतिक प्रस्तुतियां
- शिष्टाचार - अनुष्ठान चंताई और परंपरागत पदाधिकारी संपन्न करते हैं। निर्धारित क्षेत्र से ही देखें, बिना पूछे अनुष्ठान की फोटो न लें, और शोभायात्रा के समय स्वयंसेवकों के निर्देश मानें।
- केर पूजा - ध्यान रखें कि इस अनुष्ठान के दौरान सीमा के भीतर आवागमन पर प्रतिबंध रहते हैं, इसलिए उस काल की यात्रा से पहले तिथियां देख लें
- आसपास - अगरतला का उज्जयंत महल, उदयपुर की त्रिपुर सुंदरी और भुवनेश्वरी, और उत्तर में उनाकोटी
जिन भक्तों की रुचि इसमें है कि हिंदू उपासना स्थानीय परंपराओं को कैसे साथ लेकर चलती है, उनके लिए यह मंदिर देश के सर्वाधिक शिक्षाप्रद स्थानों में है, क्योंकि यहां दोनों परंपराएं एक ही स्थान पर, एक ही समय दिखाई देती हैं।
पाठकों के प्रश्न
चतुर्दश देवता कौन हैं?+
ये त्रिपुरा की पूर्व रियासत के चौदह परंपरागत देवता हैं, जो पुराने अगरतला में विराजित हैं। राजमाला की सूची में शिव, पार्वती, विष्णु, लक्ष्मी, सरस्वती, कार्तिकेय, गणेश, ब्रह्मा, पृथ्वी, समुद्र, गंगा, अग्नि, कामदेव और हिमालय सम्मिलित हैं।
केवल देवताओं के मुख ही क्यों पूजित हैं?+
मंदिर में चौदह देवता पूर्ण प्रतिमा के बजाय धातु के मुख रूप में विराजित हैं, इसीलिए इसे प्रायः चौदह मुखों का मंदिर कहा जाता है। यही यहां सदियों से चली आ रही उपासना विधि है।
चंताई कौन होते हैं?+
चंताई चतुर्दश देवता के प्रमुख पुरोहित होते हैं, और यह पद ब्राह्मण वंश का नहीं, जनजातीय त्रिपुरी समाज का है। अनुष्ठान उसी समाज की परंपरा के अनुसार होते हैं और सदियों से ऐसा ही चला आ रहा है।
खर्ची पूजा क्या है?+
खर्ची पूजा चौदह देवताओं का वार्षिक उत्सव है, जो आषाढ़ में होता है, जब उन्हें शोभायात्रा में हावड़ा नदी तक ले जाकर विधिपूर्वक स्नान कराया जाता है। यह लगभग सप्ताह भर चलता है और त्रिपुरा का सबसे बड़ा धार्मिक आयोजन है।
केर पूजा क्या है?+
केर पूजा खर्ची के लगभग पखवाड़े बाद होती है और किसी निर्धारित क्षेत्र की रक्षा के लिए की जाती है। एक रक्षा सीमा स्थापित की जाती है, और अनुष्ठान की अवधि में उसके भीतर आवागमन तथा कुछ गतिविधियां प्रतिबंधित रहती हैं।
चतुर्दश देवता मंदिर कहां है?+
त्रिपुरा में पुराने अगरतला, जिसे पुरान हवेली कहते हैं, अगरतला नगर से लगभग आठ किलोमीटर दूर। उदयपुर की त्रिपुर सुंदरी लगभग एक घंटे की दूरी पर हैं और प्रायः उसी यात्रा में दर्शन कर लिए जाते हैं।
About the author
Pandit Mahesh Trivedi · Festival Traditions & Panchang
Pandit Mahesh leads the festival-date and Panchang content on Vandnaa. He cross-references multiple regional panchangs (Drik, Vaishnava, Bengali, Marathi) for every festival date published on the site.
Meet the Vandnaa editorial team →


