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गोवत्स द्वादशी 2026 - वसु बारस गाय पूजा विधि और व्रत कथा
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गोवत्स द्वादशी 2026 - वसु बारस गाय पूजा विधि और व्रत कथा

9 मिनट पढ़ेंप्रकाशित जून 10, 2026
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By Pandit Mahesh Trivedi · Festival Traditions & Panchang

Reviewed by Pandit Ravindra Sharma · Vedic Rituals & Bhakti, 22+ years

गोवत्स द्वादशी क्या है

गोवत्स द्वादशी *गाय (गौ माता) और उसके बछड़े (वत्स) की पूजा को समर्पित कोमल पर्व है। महाराष्ट्र में वसु बारस, उत्तर भारत में बछ बारस और अन्यत्र नंदिनी व्रत* के नाम से जाना जाने वाला यह दीपावली की उत्सव-शृंखला का आरंभ करता है। सनातन धर्म में गाय निस्वार्थ दान, पोषण और मातृत्व का प्रतीक मानी जाती है, कहा जाता है उसमें समस्त देवता निवास करते हैं। इस दिन परिवार गाय व बछड़े को नहलाते-सजाते, तिलक लगाते, भोजन अर्पित करते और दूध व पोषण देने के लिए प्रेम व कृतज्ञता से उनकी परिक्रमा करते हैं।

तिथि और 2026 में यह कब है

गोवत्स द्वादशी कार्तिक कृष्ण पक्ष की द्वादशी को आती है, धनतेरस से ठीक एक दिन पहले, जो दीपावली उत्सवों का अनौपचारिक आरंभ है। ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार यह सामान्यतः अक्टूबर या नवंबर में पड़ती है। चूँकि तिथि का समय हर वर्ष चंद्र पंचांग के साथ बदलता है और आपके क्षेत्र में द्वादशी सूर्योदय से भिन्न रूप में जुड़ सकती है, अपने शहर की सही तिथि और पूजा मुहूर्त वंदना पंचांग पर देखें। पूजा प्रायः संध्या (प्रदोष काल) में, अक्सर गायों के घर लौटने पर की जाती है, इसलिए स्थानीय समय जाँचना उचित है।

गोवत्स द्वादशी का महत्व

यह पर्व गाय को मातृत्व की देखभाल और समृद्धि के जीवंत स्वरूप रूप में सम्मान देता है। गाय व बछड़े की पूजा समृद्धि, संतान की कुशलता और भगवान कृष्ण - वृंदावन में गौ-चराने वाले प्रिय गोपाल - के आशीर्वाद लाती मानी जाती है। माताएँ विशेष रूप से यह व्रत अपनी संतान की दीर्घायु, स्वास्थ्य व उन्नति की प्रार्थना से करती हैं, गाय के बछड़े-प्रेम और माँ के संतान-प्रेम में समानता देखते हुए। यह प्रकृति और उन पशुओं के प्रति कृतज्ञता भी प्रकट करता है जिनका दूध व श्रम गाँव व परिवार को पालता है, और अहिंसा व करुणा के मूल्यों को सुदृढ़ करता है।

गोवत्स द्वादशी व्रत कथा

गोवत्स द्वादशी व्रत कथा

एक प्रिय कथा एक राजा की है जिसके पास नंदिनी नामक गाय और उसका बछड़ा था। एक बार अतिथि आने पर भोजन कम पड़ा तो रानी ने बछड़े को पकाने का आदेश दे, उसे अनाज के ढेर के नीचे छिपवा दिया। नियत समय पर गाय अपने बछड़े को खोजने लगी, और दिव्य कृपा से बछड़ा अनाज में से जीवित प्रकट हो गया। अपनी गंभीर भूल समझकर रानी ने गहरा पश्चाताप किया और संकल्प लिया कि वह हर वर्ष इस दिन गाय व बछड़े की पूजा करेगी और गेहूँ व दूध के पदार्थ त्यागेगी। इसी संकल्प से गोवत्स द्वादशी का व्रत चला - यह कथा गाय के प्रति श्रद्धा और माँ-संतान को कष्ट देने के कर्म-भार की सीख देती है।

गाय और बछड़ा पूजा विधि

पूजा श्रद्धा व प्रेम से करें: 1. प्रातः स्नान कर गौ माता व बछड़े के सम्मान का संकल्प लें। 2. संध्या में बछड़े सहित गाय खोजें, उन्हें कोमलता से स्वच्छ कर तिलक, माला व रंगीन वस्त्र से सजाएँ। 3. रोली, अक्षत, पुष्प अर्पित करें, और मूँग, बाजरा या अंकुरित चना जैसी वस्तुएँ खिलाएँ (पर आज स्वयं गेहूँ व दूध के पदार्थ न लें)। 4. दीपक जलाएँ, गाय-बछड़े की आरती करें, और हाथ जोड़कर परिक्रमा करें। 5. व्रत कथा पढ़ें, संतान की कुशलता की प्रार्थना करें, अंत में हरा चारा अर्पित करें। व्रत रखने वाले एक समय भोजन करते हैं और गेहूँ, तले गेहूँ-पदार्थ व दूध-उत्पाद त्यागते हैं।

गोवत्स द्वादशी के मंत्र

गाय व बछड़े की पूजा करते हुए इनका जप करें: 1. "ॐ गोभ्यो नमः" - पावन गायों को नमन। 2. "ॐ सुरभ्यै नमः" - कामधेनु सुरभि को, दिव्य मनोकामना पूर्ण करने वाली गाय। 3. "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" - गौ-रक्षक कृष्ण का स्मरण। आप मधुर स्वर में गोपाल भजन भी गा सकते और गाय में निवास करने वाले देवताओं को सम्मान देती गौ प्रार्थना "सर्वदेवमयी गावः" का पाठ कर सकते हैं। गाय को खिलाते व परिक्रमा करते हुए श्रद्धा से जप इस कोमल व्रत के हृदय में बसी कृतज्ञता को गहरा करता है।

गोवत्स द्वादशी के लाभ

गोवत्स द्वादशी के लाभ

भक्त मानते हैं यह व्रत संतान की दीर्घायु, स्वास्थ्य और सफलता का आशीर्वाद लाता है, विशेषकर माताओं द्वारा रखे जाने पर। गाय का सम्मान समृद्धि, प्रचुरता और भगवान कृष्ण की कृपा आकर्षित करता और कृतघ्नता या पशु-हिंसा से जुड़ी बाधाएँ दूर करता कहा जाता है। व्यावहारिक रूप से यह दिन करुणा, कृतज्ञता और प्रकृति के प्रति सम्मान सिखाता है, यह स्मरण कराते हुए कि गाय बिना कुछ माँगे दूध, खाद व बल देती है। इस दिन गाय को खिलाना महान पुण्य का कर्म माना जाता है, जो पूरे परिवार को लाभ देता और हृदय को अहिंसा व समस्त जीवों की देखभाल से जोड़ता है।

लोग सबसे ज़्यादा क्या पूछते हैं

गोवत्स द्वादशी क्या है?+

गोवत्स द्वादशी, जिसे वसु बारस, बछ बारस या नंदिनी व्रत भी कहते हैं, धनतेरस से ठीक पहले कार्तिक कृष्ण द्वादशी को गाय व बछड़े की पूजा का पर्व है।

2026 में गोवत्स द्वादशी कब है?+

यह कार्तिक कृष्ण द्वादशी, धनतेरस से एक दिन पहले, सामान्यतः अक्टूबर या नवंबर में आती है। सही तिथि और मुहूर्त वंदना पंचांग पर देखें।

गोवत्स द्वादशी पर गेहूँ और दूध क्यों त्यागते हैं?+

गाय के सम्मान और व्रत कथा अनुसार, भक्त इस दिन गेहूँ, तले गेहूँ-पदार्थ व दूध-उत्पाद त्यागते हैं, प्रायः एक समय ही भोजन करते हैं।

इस दिन गाय की पूजा कैसे करें?+

बछड़े सहित गाय को स्वच्छ कर सजाएँ, तिलक लगाएँ, पुष्प व मूँग या बाजरा अर्पित करें, दीपक जलाकर आरती व परिक्रमा करें और व्रत कथा पढ़ें।

गोवत्स द्वादशी पर कौन-सा मंत्र जपें?+

"ॐ गोभ्यो नमः", कामधेनु के लिए "ॐ सुरभ्यै नमः", और गौ-रक्षक कृष्ण का स्मरण करते "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" का जप करें।

नंदिनी व्रत के क्या लाभ हैं?+

यह संतान को दीर्घायु व स्वास्थ्य का आशीर्वाद, समृद्धि व कृष्ण की कृपा देती और करुणा, कृतज्ञता तथा प्रकृति के प्रति सम्मान विकसित करती मानी जाती है।

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About the author

Pandit Mahesh Trivedi · Festival Traditions & Panchang

Pandit Mahesh leads the festival-date and Panchang content on Vandnaa. He cross-references multiple regional panchangs (Drik, Vaishnava, Bengali, Marathi) for every festival date published on the site.

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