देवउठनी एकादशी क्या है?
देवउठनी एकादशी, जिसे प्रबोधिनी एकादशी या देव उठनी एकादशी भी कहते हैं, कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को आती है। इसके नामों का अर्थ है देवों का जागना, क्योंकि यह वह आनंदमय दिन है जब भगवान विष्णु जागते हैं और आषाढ़ की देवशयनी एकादशी से आरंभ हुई उनकी चार माह की योग-निद्रा समाप्त होती है। उनके जागने के साथ पवित्र चातुर्मास काल समाप्त होता है और हिंदू वर्ष का सर्वाधिक शुभ समय - विवाह, गृहप्रवेश और बड़े संस्कारों का काल - पुनः आरंभ हो जाता है। इसी दिन प्रिय परंपरा तुलसी विवाह भी होता है, जिसमें पवित्र तुलसी का विवाह शालिग्राम रूप में भगवान विष्णु से किया जाता है।
तिथि और 2026 में कब है
देवउठनी एकादशी कार्तिक शुक्ल एकादशी को मनाई जाती है, जो ग्रेगोरियन कैलेंडर में प्रायः नवंबर में, दीपावली के लगभग दो सप्ताह बाद पड़ती है। तुलसी विवाह इसी दिन और अक्सर अगली द्वादशी को भी मनाया जाता है, इसलिए स्थानीय परंपरा के अनुसार परिवार दोनों में से किसी एक दिन विवाह अनुष्ठान करते हैं। चूँकि तिथि और पारण का समय आपके स्थान के सूर्योदय पर निर्भर है और क्षेत्र अनुसार भिन्न होता है, अपने नगर के लिए सही एकादशी तिथि, तुलसी विवाह का दिन और पारण मुहूर्त वंदना पंचांग पर अवश्य देखें।
महत्व: विष्णु का जागरण
यह एकादशी भक्ति-पंचांग के सबसे उत्साहवर्धक भावों में से एक रखती है: दिव्य जागरण। चातुर्मास के चार माह में भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग पर योग-निद्रा में विश्राम करते हैं। प्रबोधिनी एकादशी पर भक्त उन्हें प्रेम से उठने के लिए पुकारते हैं, जगाने के गीत गाते हैं और दीप, ध्वनि व पुष्प अर्पित करते हैं। उनका जागना संकेत देता है कि सृष्टि पुनः पूर्ण सक्रिय है और शुभ सांसारिक संस्कार पुनः आरंभ हो सकते हैं। आध्यात्मिक रूप से यह दिन भक्तों को अपनी आंतरिक भक्ति को किसी भी निद्रा से जगाने का निमंत्रण देता है। इस एकादशी का पुण्य अत्यंत विशाल माना जाता है, जो अनेक अन्य व्रतों के संयुक्त पुण्य से भी अधिक कहा गया है।
जगाने का अनुष्ठान

प्रबोधिनी एकादशी के प्रातः परिवार भगवान को जगाने का स्नेहमय अनुष्ठान करते हैं। विष्णु की मूर्ति या चित्र को स्वच्छ चौकी पर रखा जाता है और भक्त पारंपरिक पुकार उठो देव, बैठो देव गाते हैं। शंख बजाया जाता है, घंटियाँ बजती हैं और दीप घुमाए जाते हैं तथा पुष्प, फल और नैवेद्य अर्पित किए जाते हैं। अनेक घरों में भूमि पर सुंदर चौक बनाया जाता है, गन्ना सजाया जाता है और सिंघाड़ा व आँवला जैसे ऋतु-फल भगवान के समक्ष रखे जाते हैं। यह अनुष्ठान उसी स्नेह से किया जाता है जैसे कोई प्रिय परिजन को प्रेम से जगाता है, जो भगवान के पूर्ण जागरण की आनंदमय वापसी का प्रतीक है।
तुलसी विवाह संबंध और विधि
देवउठनी एकादशी तुलसी विवाह से अभिन्न है, जिसमें पवित्र तुलसी (देवी वृंदा या तुलसी रूप में पूजित) का विवाह शालिग्राम रूप में भगवान विष्णु से किया जाता है। इसे करना कन्यादान के समान पुण्यदायी माना जाता है। तुलसी विवाह की विधि: 1. तुलसी के गमले को सजी चौकी पर रखें और स्थान स्वच्छ करें। 2. तुलसी को लाल चुनरी, चूड़ियों और आभूषणों से वधू रूप में सजाएँ। 3. वर रूप में शालिग्राम या विष्णु मूर्ति को उनके पास स्थापित करें। 4. मंगलसूत्र बाँधें, मंगल फेरे कराएँ और गन्ना, पुष्प व नैवेद्य अर्पित करें। 5. विवाह गीत गाएँ और आरती तथा प्रसाद वितरण से समापन करें। यह आनंदमय अनुष्ठान विवाह ऋतु को औपचारिक रूप से पुनः आरंभ करता है।
जप के लिए मंत्र
भगवान को जगाते समय और तुलसी विवाह में इन मंत्रों का जप करें: 1. ॐ नमो भगवते वासुदेवाय - विष्णु का द्वादशाक्षर मंत्र। 2. ॐ नमो नारायणाय - भक्ति का नारायण मंत्र। 3. ॐ तुलस्यै नमः - पवित्र तुलसी को दिव्य वधू रूप में नमन। अनेक भक्त पारंपरिक जागरण श्लोक उत्तिष्ठ गोविन्द उत्तिष्ठ गरुडध्वज का भी पाठ करते हैं जिसमें भगवान से उठने की प्रार्थना है, साथ ही विष्णु सहस्रनाम भी पढ़ते हैं। जप करते समय कल्पना करें कि भगवान उस संसार पर नेत्र खोल रहे हैं जिसने चार माह उनकी कृपा की प्रतीक्षा की, और अपनी भक्ति को भी उनके साथ जागने दें।
व्रत और अनुष्ठान के लाभ

देवउठनी एकादशी का अनुष्ठान विशाल पुण्य, भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी का आशीर्वाद, तथा घर में सामंजस्य व समृद्धि देता है, विशेषकर तुलसी विवाह के पुण्य से। व्यावहारिक रूप से यह परिवारों को एक स्नेहमय, उत्सवमय अनुष्ठान के लिए एकत्र करता है जो संबंधों को दृढ़ करता है और शुभ विवाह ऋतु का आनंद से स्वागत करता है। जागरण का भाव एक कोमल आध्यात्मिक शिक्षा देता है: जैसे भगवान उठते हैं, वैसे ही हम भी किसी भी निष्क्रियता के बाद अपनी भक्ति, ऊर्जा और शुभ संकल्पों को जगा सकते हैं। दंपतियों के लिए तुलसी विवाह वैवाहिक सामंजस्य देता है, और सभी के लिए यह पवित्र तुलसी तथा जागृत भगवान की उपस्थिति से घर को पवित्र करता है।
त्वरित उत्तर
इसे देव उठनी एकादशी क्यों कहते हैं?+
इसका अर्थ है देवों का जागना। इस दिन भगवान विष्णु अपनी चार माह की योग-निद्रा से जागते हैं, जो देवशयनी एकादशी से आरंभ हुई थी, इसलिए भक्त प्रेम से उन्हें उठने के लिए पुकारते हैं और जागरण का उत्सव मनाते हैं।
देवउठनी एकादशी 2026 कब है?+
यह कार्तिक शुक्ल एकादशी को, प्रायः नवंबर में दीपावली के लगभग दो सप्ताह बाद मनाई जाती है। समय स्थान व सूर्योदय पर निर्भर है, इसलिए सही तिथि और तुलसी विवाह का दिन वंदना पंचांग पर देखें।
इस एकादशी के बाद विवाह क्यों आरंभ होते हैं?+
चातुर्मास में जब विष्णु शयन करते हैं, बड़े शुभ संस्कार रोक दिए जाते हैं। प्रबोधिनी एकादशी पर जब वे जागते हैं तो चातुर्मास समाप्त होता है और विवाह तथा अन्य संस्कारों की शुभ ऋतु पुनः आरंभ हो जाती है।
तुलसी विवाह क्या है और इस दिन क्यों होता है?+
तुलसी विवाह पवित्र तुलसी का शालिग्राम रूप में भगवान विष्णु से किया गया अनुष्ठानिक विवाह है। इस दिन किया जाने पर यह जागृत भगवान के विवाह का प्रतीक है, विवाह ऋतु को आरंभ करता है और कन्यादान समान पुण्य देता है।
जगाने का अनुष्ठान कैसे किया जाता है?+
विष्णु की मूर्ति स्वच्छ चौकी पर रखी जाती है; भक्त उठने की पुकार गाते हैं, शंख बजाते हैं, घंटियाँ बजाते हैं, दीप घुमाते हैं और पुष्प, गन्ना तथा ऋतु-फल अर्पित कर प्रातः भगवान को स्नेह से जगाते हैं।
क्या पूरा परिवार देवउठनी एकादशी मना सकता है?+
हाँ, यह आनंदमय पारिवारिक अनुष्ठान है। जो उपवास कर सकते हैं वे एकादशी व्रत रखते हैं, और सभी जागरण अनुष्ठान तथा तुलसी विवाह में सम्मिलित होकर घर में भजन, आरती और प्रसाद साझा करते हैं।
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Pandit Mahesh Trivedi · Festival Traditions & Panchang
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