वैकुंठ चतुर्दशी क्या है?
वैकुंठ चतुर्दशी कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को, कार्तिक पूर्णिमा के ठीक पहले आती है। यह एक दुर्लभ और सुंदर पर्व है क्योंकि यह एक ही दिन भगवान विष्णु और भगवान शिव की आराधना को जोड़ता है और वैष्णव तथा शैव दोनों महान परंपराओं के बीच की कल्पित प्रतिद्वंद्विता को मिटा देता है। वैकुंठ नाम विष्णु के परम धाम को इंगित करता है, और भक्तों की मान्यता है कि इस दिन हरि और हर की संयुक्त आराधना उस धाम का मार्ग खोलती है। यह उत्सव पवित्र नगरों काशी (वाराणसी) और ऋषिकेश में विशेष रूप से भव्य होता है।
तिथि और 2026 में कब है
वैकुंठ चतुर्दशी कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी को मनाई जाती है, जो ग्रेगोरियन कैलेंडर में प्रायः नवंबर में, कार्तिक पूर्णिमा से एक दिन पहले और देवउठनी एकादशी के कुछ दिन बाद पड़ती है। इसकी एक विशेषता यह है कि पूजा के प्रमुख अंश *मध्यरात्रि (निशीथ काल) में किए जाते हैं, जब विष्णु की पूजा होती है, जबकि शिव की आराधना अन्य निर्धारित समयों पर की जाती है। चूँकि चतुर्दशी तिथि, मध्यरात्रि पूजा का समय और सभी मुहूर्त आपके स्थान के सूर्योदय व चंद्र-पंचांग पर निर्भर हैं, अनुष्ठान की योजना से पूर्व अपने नगर के लिए सही तिथि और पूजा मुहूर्त वंदना पंचांग पर अवश्य देखें*।
महत्व: विष्णु और शिव का मिलन
वैकुंठ चतुर्दशी का मूल महत्व हरि और हर का दुर्लभ सद्भाव है। अधिकांश पर्वों में किसी एक देवता पर केंद्र होता है, पर यहाँ विष्णु और शिव की संयुक्त पूजा होती है, जो भक्तों को स्मरण कराती है कि ईश्वर अंततः एक है और अनेक प्रिय रूपों में प्रकट होता है। शिव की नगरी काशी में यह दिन विश्वनाथ जैसे मंदिरों में भव्यता से मनाया जाता है, जहाँ शिव की अपनी पवित्र नगरी में विष्णु की पूजा परस्पर श्रद्धा के प्रतीक रूप में अर्पित की जाती है। इस दिन का अनुष्ठान पापों से मुक्ति और, इसके नाम के अनुरूप, वैकुंठ प्राप्ति की कृपा देता है। भक्तों के लिए यह एकता, विनम्रता और सांप्रदायिक भेद मिटाने की तेजस्वी शिक्षा है।
विष्णु-शिव सद्भाव की कथा

एक प्रिय कथा इस दिन की व्याख्या करती है। कहा जाता है कि भगवान विष्णु काशी आए और एक सहस्र कमल पुष्पों से भगवान शिव की पूजा करने लगे। उनकी भक्ति परखने के लिए शिव ने एक पुष्प छिपा दिया। एक कमल कम पाकर दृढ़ निष्ठ विष्णु - जो कमलनयन, अर्थात कमल जैसे नेत्रों वाले, कहलाते हैं - ने उसके स्थान पर अपना एक नेत्र अर्पित करने का संकल्प किया। इस परम भक्ति से अत्यंत प्रसन्न होकर शिव प्रकट हुए, पुष्प और नेत्र दोनों लौटा दिए और विष्णु को सुदर्शन चक्र प्रदान किया। उस प्रेममय आदान-प्रदान में दोनों महान प्रभुओं ने एक-दूसरे का सम्मान किया और इस दिन को अपनी संयुक्त पूजा हेतु स्थापित किया। कथा सिखाती है कि सच्ची भक्ति प्रतिद्वंद्विता से परे है और दिव्य में श्रेष्ठतम भी परस्पर प्रेम में एक-दूसरे को नमन करते हैं।
चरणबद्ध पूजा विधि
इस विधि से दोनों प्रभुओं की पूजा करें: 1. प्रातः स्नान करें; काशी या ऋषिकेश में पवित्र नदी स्नान अत्यंत शुभ माना जाता है। 2. दिन में भगवान शिव की पूजा बिल्व पत्र, जल, दूध और उनके मंत्रों के जप से करें। 3. इस पर्व के हृदय - भगवान विष्णु की विशेष *मध्यरात्रि (निशीथ काल) पूजा की तैयारी करें। 4. मध्यरात्रि में विष्णु को तुलसी, कमल या अन्य पुष्प, घी के दीप, धूप और नैवेद्य अर्पित करें। 5. दीपदान करें, क्योंकि इस दिन दीप अर्पण अत्यंत पुण्यदायी है। 6. विष्णु सहस्रनाम* और शिव स्तोत्रों का पाठ कर दोनों को समान प्रेम से पूजें। 7. रात्रि भजन और स्मरण में बिताएँ। 8. हरि और हर दोनों की आरती से समापन कर प्रसाद वितरित करें।
जप के लिए मंत्र
चूँकि यह दिन दो महान प्रभुओं को जोड़ता है, दोनों के मंत्रों का जप करें: 1. विष्णु के लिए ॐ नमो भगवते वासुदेवाय और ॐ नमो नारायणाय। 2. शिव के लिए ॐ नमः शिवाय, परम पंचाक्षर मंत्र। 3. उनकी एकता के सम्मान में ॐ हरिहर-स्वरूपाय नमः का जप कर संयुक्त हरि-हर रूप को नमन करें। आप विष्णु सहस्रनाम और शिव के लिए महामृत्युंजय मंत्र का भी पाठ कर सकते हैं। दिनभर और मध्यरात्रि जागरण में जप करते समय इस लय में पर्व का भाव बसने दें: कि ईश्वर एक है, किसी नाम या संप्रदाय से परे, और हमारे अखंड प्रेम का अधिकारी है।
अनुष्ठान के लाभ

वैकुंठ चतुर्दशी भक्तों को संचित पापों से मुक्त करती है और, अपने नाम के अनुरूप, उन्हें विष्णु के धाम वैकुंठ की ओर मार्ग का आशीर्वाद देती है। हरि और हर दोनों की पूजा प्राप्त कृपा को बढ़ाती मानी जाती है, क्योंकि कोई परंपरा बाहर नहीं रहती। रात्रि का भव्य दीपदान भीतरी और बाहरी अंधकार मिटाने का पुण्य देता है। शास्त्रीय फलों से परे, यह दिन धार्मिक सद्भाव और विनम्रता की गहन शिक्षा देता है जो आज अत्यंत प्रासंगिक है: वही भक्ति विष्णु और शिव दोनों की ओर समान रूप से बह सकती है। घर पर या काशी अथवा ऋषिकेश की यात्रा में मनाने पर यह हृदय में पूर्णता और एकता का दुर्लभ भाव छोड़ जाता है।
पाठकों के प्रश्न
इस दिन विष्णु और शिव की पूजा एक साथ क्यों होती है?+
वैकुंठ चतुर्दशी हरि और हर के सद्भाव का उत्सव है। एक कथा बताती है कि विष्णु ने शिव की पूजा की और उनसे आशीर्वाद पाया, जिससे यह दिन स्थापित हुआ जब दोनों महान प्रभु एक साथ पूजे जाते हैं और सांप्रदायिक भेद मिटता है।
वैकुंठ चतुर्दशी 2026 कब है?+
यह कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी को, प्रायः नवंबर में कार्तिक पूर्णिमा से एक दिन पहले मनाई जाती है। समय और मध्यरात्रि पूजा का काल स्थान पर निर्भर है, इसलिए सही तिथि वंदना पंचांग पर देखें।
वैकुंठ चतुर्दशी के पीछे क्या कथा है?+
विष्णु काशी आकर एक सहस्र कमलों से शिव की पूजा करने लगे। जब शिव ने परीक्षा हेतु एक छिपा दिया, तो कमलनयन विष्णु ने उसके स्थान पर अपना नेत्र अर्पित कर दिया। प्रसन्न होकर शिव ने उसे लौटाया और सुदर्शन चक्र दिया।
इस दिन मध्यरात्रि पूजा क्यों महत्वपूर्ण है?+
वैकुंठ चतुर्दशी पर भगवान विष्णु की पूजा मध्यरात्रि के निशीथ काल में होती है, जो सर्वाधिक शुभ समय माना जाता है। शिव की आराधना दिन के अन्य निर्धारित समयों पर की जाती है।
वैकुंठ चतुर्दशी सबसे भव्य रूप में कहाँ मनाई जाती है?+
यह पवित्र नगरों काशी (वाराणसी) और ऋषिकेश में विशेष भव्यता से मनाई जाती है, जहाँ मंदिर विष्णु और शिव दोनों की पूजा करते हैं और भक्त दीपों की पंक्तियाँ अर्पित कर दीपदान करते हैं।
क्या मैं वैकुंठ चतुर्दशी घर पर मना सकता हूँ?+
हाँ। घर पर आप प्रातः स्नान कर दिन में शिव और मध्यरात्रि में विष्णु की पूजा कर सकते हैं, दीप अर्पित करें, विष्णु सहस्रनाम और शिव मंत्रों का पाठ करें, और दोनों प्रभुओं की आरती तथा प्रसाद से समापन करें।
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Pandit Mahesh Trivedi · Festival Traditions & Panchang
Pandit Mahesh leads the festival-date and Panchang content on Vandnaa. He cross-references multiple regional panchangs (Drik, Vaishnava, Bengali, Marathi) for every festival date published on the site.
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