काल भैरव जयंती क्या है
काल भैरव जयंती, जिसे कालाष्टमी या भैरव अष्टमी भी कहते हैं, उस दिन का स्मरण है जब भगवान शिव ने काल भैरव - अपने उग्र, रक्षक और काल-नियंत्रक स्वरूप - में प्राकट्य किया। काल भैरव काशी (वाराणसी) के कोतवाल (प्रधान रक्षक) माने जाते हैं, जिनके आगे स्वयं काल (समय व मृत्यु) नतमस्तक है। श्याम वर्ण, त्रिशूल, डमरू व दंड धारण किए और श्वान को वाहन रूप में लिए, वे भय हरते, अधर्म को दंड देते और भक्तों की रक्षा करते हैं। यह दिन भैरव मंदिरों में अपार श्रद्धा से मनाया जाता और साहस, रक्षा व संकट-मुक्ति हेतु शक्तिशाली माना जाता है।
तिथि और 2026 में यह कब है
काल भैरव जयंती मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष की अष्टमी को आती है, मार्गशीर्ष (अगहन) मास के अँधेरे पक्ष में। ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार यह सामान्यतः नवंबर या दिसंबर में पड़ती है। चूँकि यह रात्रि-केंद्रित पर्व है, मुख्य पूजा के लिए रात्रि में व्याप्त अष्टमी तिथि (निशीथ काल) ही महत्वपूर्ण है। चूँकि चंद्र तिथियाँ हर वर्ष बदलती और दो सौर दिनों में फैल सकती हैं, अपने शहर की सही तिथि और रात्रि पूजा मुहूर्त वंदना पंचांग पर अवश्य देखें ताकि सही समय पर पूजा हो।
काल भैरव जयंती का महत्व
काल भैरव शिव की उस भूमिका के स्वरूप हैं जो भय, अहंकार और नकारात्मकता का नाश करती है। इस दिन उनकी पूजा निर्भयता, शत्रुओं से रक्षा, बाधाओं का निवारण, और अनिष्ट प्रभावों व आकस्मिक विपत्तियों से राहत देती मानी जाती है। काल (समय) के स्वामी रूप में उनका आह्वान मृत्यु-भय पर विजय और अपने अहंकार के अनुशासन हेतु होता है, क्योंकि कथा कहती है वे अहं को विनम्र करने प्रकट हुए। काशी में कहा जाता है उनकी अनुमति बिना कोई जीव अंतिम मुक्ति नहीं पाता, इसीलिए तीर्थयात्री पहले कोतवाल का आशीर्वाद लेते हैं। यह दिन गहराई से साहस, न्याय और समर्पण का है।
काल भैरव के प्राकट्य की कथा

पुराणों की एक प्राचीन कथा कहती है कि एक बार ब्रह्मा, विष्णु और शिव में श्रेष्ठता का विवाद हुआ। अपने अहंकार में ब्रह्मा ने शिव के प्रति अनादरपूर्ण वचन कहा। शिव के क्रोध से एक प्रचंड, उग्र स्वरूप - काल भैरव - प्रकट हुआ, जिसने अहंकारी के गर्व को विनम्र किया। यह सिखाने हेतु कि अहं को काटना ही चाहिए, भैरव ने ब्रह्मा का वह पाँचवाँ सिर काट दिया जिसने अनुचित कहा था। फलस्वरूप कपाल (खोपड़ी) उनके हाथ से चिपक गया, और भैरव कपाली रूप में भटकते रहे, जब तक काशी पहुँचने पर पाप मिट गया और कपाल गिर गया। तब शिव ने उन्हें काशी का शाश्वत कोतवाल नियुक्त किया, जो पवित्र नगरी की सदा रक्षा करता है।
काल भैरव रात्रि पूजा विधि
काल भैरव की पूजा रात्रि में, श्रेष्ठतः निशीथ काल में होती है: 1. दिनभर व्रत रखें और उनकी रक्षा हेतु संकल्प लें। 2. सूर्यास्त के बाद उनकी मूर्ति या चित्र के समक्ष सरसों या तिल के तेल का दीपक जलाएँ, धूप व काले तिल अर्पित करें। 3. भैरव से जुड़ी वस्तुएँ - इमरती या जलेबी, उड़द के पकवान, और लाल या गहरे पुष्प अर्पित करें; कुछ लोग स्थानीय मंदिर परंपरा अनुसार ही थोड़ी मदिरा चढ़ाते हैं। 4. उनके पावन वाहन काले श्वान को भोजन कराएँ, जो इस दिन का सर्वाधिक प्रिय कर्म माना जाता है। 5. भैरव मंत्र जपें, काल भैरव अष्टकम् का पाठ करें, आरती करें, और यथासंभव जागरण में प्रार्थनारत रहें। स्त्रियाँ व बच्चे पूजा सरल व भावमय रखें।
मंत्र और लाभ
इस दिन के शक्तिशाली जप: 1. "ॐ कालभैरवाय नमः" - मूल भैरव मंत्र। 2. "ॐ ह्रीं भैरवाय नमः" - रक्षा हेतु बीज-युक्त रूप। 3. आदि शंकराचार्य रचित काल भैरव अष्टकम्, जो "देवराज सेव्यमान पावनांघ्रि पंकजम्" से आरंभ होता है। भक्त मानते हैं सच्ची उपासना निर्भयता, शत्रुओं व दुर्घटनाओं से रक्षा, बाधा-निवारण, ऋण व मुकदमों से मुक्ति, और अहंकार का निरंतर अनुशासन लाती है। यह नकारात्मक ऊर्जाओं से जुड़ी समस्याओं को भी सरल करती कही जाती है। सर्वोपरि, काल भैरव सिखाते हैं कि अहं त्याग सत्य की राह चलना भक्त को काशी के रक्षक की शाश्वत छत्रछाया में रखता है।
काल भैरव जयंती पर क्या करें और क्या न करें

करें: सच्चे मन व शांत चित्त से पूजा करें, काले श्वान को भोजन कराएँ, तिल-तेल का दीपक जलाएँ, जरूरतमंदों को दान दें, भैरव मंदिर जाएँ, और वाणी व आचरण में संयम रखें। न करें: भैरव पूजा को अहंकार, उपहास या भय से न करें; किसी पशु, विशेषकर कुत्तों को हानि न पहुँचाएँ; योग्य गुरु के मार्गदर्शन बिना उग्र या तांत्रिक अनुष्ठान न करें। दिनभर ब्रह्मचर्य, सत्य व विनम्रता बनाए रखें। चूँकि कुछ भैरव परंपराओं में विशेष अनुष्ठान होते हैं, गृहस्थ अपनी पूजा सरल व भावमय रखें - जटिल विधियों के बजाय मंत्र, अष्टकम्, श्वान को भोजन और प्रार्थना पर ध्यान दें।
लोग सबसे ज़्यादा क्या पूछते हैं
काल भैरव जयंती क्या है?+
काल भैरव जयंती, या कालाष्टमी, मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी को शिव के उग्र रक्षक स्वरूप और काशी के कोतवाल काल भैरव के प्राकट्य का दिन है।
2026 में काल भैरव जयंती कब है?+
यह मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी को, सामान्यतः नवंबर या दिसंबर में आती है। चूँकि यह रात्रि पर्व है, सही तिथि और रात्रि मुहूर्त वंदना पंचांग पर देखें।
इस दिन काले कुत्ते की पूजा क्यों होती है?+
श्वान काल भैरव का वाहन है। इस दिन काले कुत्ते को भोजन कराना व सम्मान देना उनके प्रति भक्ति का सर्वाधिक प्रिय कर्म माना जाता है।
काल भैरव पूजा कैसे करें?+
रात्रि में तिल-तेल का दीपक जलाकर पूजा करें, काले तिल, जलेबी या इमरती व गहरे पुष्प अर्पित करें, काले श्वान को भोजन कराएँ, भैरव मंत्र जपें और काल भैरव अष्टकम् पढ़ें।
काल भैरव जयंती पर कौन-सा मंत्र जपें?+
"ॐ कालभैरवाय नमः" और "ॐ ह्रीं भैरवाय नमः" का जप करें, तथा आदि शंकराचार्य रचित काल भैरव अष्टकम् का पाठ करें।
काल भैरव पूजा के क्या लाभ हैं?+
भक्त मानते हैं यह निर्भयता, शत्रुओं व दुर्घटनाओं से रक्षा, बाधा-निवारण, ऋण व मुकदमों से मुक्ति और अहंकार के अनुशासन का लाभ देती है।
About the author
Acharya Vinaya Kapoor · M.A. Sanskrit, Mantra & Stotra Studies
Acharya Vinaya holds an M.A. in Sanskrit from Banaras Hindu University and writes the mantra and stotra commentary on Vandnaa. Her focus is on accurate pronunciation, traditional context, and helping modern readers connect with classical texts.
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