चंपा षष्ठी क्या है
चंपा षष्ठी भगवान कार्तिकेय (जिन्हें सुब्रह्मण्य, स्कंद या मुरुगन भी कहते हैं) और महाराष्ट्र व कर्नाटक में पूजे जाने वाले भगवान शिव के अति प्रिय स्वरूप खंडोबा को समर्पित जीवंत पर्व है। यह दिन योद्धा-देव खंडोबा के मणि और मल्ल राक्षसों के संहारक रूप का उत्सव मनाता है, और चंपा षष्ठी या खंडोबा षष्ठी नामक छह-दिवसीय पर्व का समापन करता है। यह उत्सव महाराष्ट्र के प्रसिद्ध जेजुरी मंदिर और कर्नाटक के कुक्के सुब्रह्मण्य तीर्थ में विशेष भव्यता से मनाया जाता है, जहाँ भक्त हल्दी, चंपा पुष्प और हर्षमय पूजा से देव का सम्मान करने उमड़ते हैं।
तिथि और 2026 में यह कब है
चंपा षष्ठी मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष की षष्ठी (अगहन मास) को आती है, जो प्रतिपदा से आरंभ छह-दिवसीय पर्व का चरमोत्कर्ष है। ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार यह सामान्यतः नवंबर या दिसंबर में पड़ती है। चूँकि चंद्र तिथियाँ हर वर्ष बदलती और आपके क्षेत्र में भिन्न सौर दिन पर आरंभ हो सकती हैं, अपने शहर की सही तिथि और पूजा मुहूर्त वंदना पंचांग पर देखें। कई घरों में घटस्थापना पहले दिन और मुख्य पूजा व उद्यापन षष्ठी को होता है, इसलिए स्थानीय समय जाँचना पूरे छह-दिवसीय व्रत की योजना में सहायक है।
चंपा षष्ठी का महत्व
यह पर्व खंडोबा और देवसेना के दिव्य सेनापति कार्तिकेय के वीरतापूर्ण कर्मों के माध्यम से बुराई पर अच्छाई की विजय मनाता है। उनकी उपासना साहस, रक्षा, बाधा-निवारण, कठिनाइयों पर सफलता और पारिवारिक मनोकामनाओं की पूर्ति देती मानी जाती है। महाराष्ट्र व कर्नाटक के कई परिवारों के लिए खंडोबा कुलदेवता हैं, और चंपा षष्ठी उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट कर बंधन नवीनीकृत करने का सबसे महत्वपूर्ण दिन है। छह-दिवसीय व्रत प्रायः वे रखते हैं जिन्होंने मन्नत मानी हो, और षष्ठी को परिवार सहित इसका पारण स्वास्थ्य, समृद्धि व समरसता के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है।
खंडोबा और राक्षसों की कथा

कथा के अनुसार दो उग्र राक्षस मणि और मल्ल शक्तिशाली वरदान पाकर अहंकारी हो गए और ऋषियों व पृथ्वी के लोगों पर अत्याचार करने लगे। उनका अत्याचार सहन न कर पाने पर देवताओं व ऋषियों ने भगवान शिव से प्रार्थना की, जो घोड़े पर सवार और महान खड्ग धारण किए तेजस्वी योद्धा खंडोबा (जिन्हें मार्तंड भैरव या मल्हारी भी कहते हैं) रूप में प्रकट हुए। छह दिनों के घोर युद्ध के बाद खंडोबा ने राक्षसों को परास्त किया। पश्चातापी मल्ल ने प्रार्थना की कि उसका नाम देव के नाम से जुड़े, इसीलिए वे मल्हारी (मल्ल + हरि) रूप में पूजे जाते हैं। पर्व के छह दिन इसी युद्ध का स्मरण हैं, और षष्ठी अंतिम विजय का दिन है।
चंपा षष्ठी पूजा विधि
यह पर्व प्रायः छह-दिवसीय व्रत है जो षष्ठी को पूर्ण होता है: 1. पहले दिन संकल्प लें और जहाँ परंपरा हो वहाँ पवित्र कलश से घटस्थापना करें। 2. प्रतिदिन खंडोबा या कार्तिकेय की प्रतिमा का *हल्दी (भंडार), चंपा पुष्प, बेल पत्र और भोग से पूजन करें। 3. चंपा षष्ठी को प्रातः स्नान कर मंदिर सजाएँ और उदारता से हल्दी अर्पित करें, क्योंकि खंडोबा पर प्रेमपूर्वक भंडारा बरसाया जाता है। 4. दीपक जलाएँ, कथा व देव-मंत्रों का पाठ करें, और आरती करें। 5. नैवेद्य जैसे भरीत-रोडगा* (महाराष्ट्र में बैंगन व बाजरे की भाखरी) अर्पित करें, फिर परिवार सहित व्रत का पारण करें। पूजा हर्षमय व कृतज्ञता से करें, कुलदेव का सम्मान करते हुए।
मंत्र और लाभ
चंपा षष्ठी पर इनका पाठ करें: 1. "ॐ शरवणभवाय नमः" - शक्तिशाली कार्तिकेय मंत्र। 2. "ॐ श्री सुब्रह्मण्याय नमः" - सुब्रह्मण्य को नमन। 3. "येळकोट, खंडे रायाचा येळकोट, जय मल्हार" - महाराष्ट्र का हर्षमय खंडोबा जयघोष। भक्त मानते हैं सच्ची उपासना *साहस, बाधाओं पर विजय, परिवार की रक्षा, अच्छा स्वास्थ्य और अपने कुलदेवता के विशेष आशीर्वाद* लाती है। संतान-इच्छुक दंपति और बल व सफलता चाहने वाले विशेष रूप से कार्तिकेय व खंडोबा से प्रार्थना करते हैं। भौतिक आशीर्वाद से परे, यह पर्व देव के गुणों - वीरता, धर्म, कर्तव्य-भक्ति और अहं व लोभ रूपी आंतरिक राक्षसों पर विजय के संकल्प - की प्रेरणा देता है।
क्षेत्रीय रीति-रिवाज और परंपराएँ

क्षेत्रीय परंपराएँ चंपा षष्ठी को रंग देती हैं। महाराष्ट्र में भक्त खंडोबा के पहाड़ी तीर्थ जेजुरी में उमड़ते हैं, जहाँ "येळकोट येळकोट जय मल्हार" के जयघोष संग हल्दी (भंडारा) बरसने से वातावरण सुनहरा हो जाता है। चंपा पुष्प, जिनके नाम पर पर्व है, हल्दी व प्याज सहित अर्पित होते हैं। कई परिवार सेवा रूप में भक्तों को भोजन कराने हेतु सामुदायिक भंडारा आयोजित करते हैं। कर्नाटक में सुब्रह्मण्य षष्ठी (चंपा षष्ठी) पर भीड़ कुक्के सुब्रह्मण्य पहुँचती है, जहाँ सर्प-पूजा कार्तिकेय से जुड़ी है। लोकगीत, दीपोत्सव और शोभायात्राएँ इस दिन को चिह्नित करती हैं, भक्ति को इन क्षेत्रों की सामुदायिक उष्मा से जोड़ती हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
चंपा षष्ठी क्या है?+
चंपा षष्ठी भगवान कार्तिकेय (सुब्रह्मण्य) और शिव के स्वरूप खंडोबा का पर्व है, जो मार्गशीर्ष शुक्ल षष्ठी को महाराष्ट्र व कर्नाटक में भव्यता से मनाया जाता है।
2026 में चंपा षष्ठी कब है?+
यह मार्गशीर्ष शुक्ल षष्ठी को, सामान्यतः नवंबर या दिसंबर में आती है और छह-दिवसीय व्रत का समापन करती है। सही तिथि व मुहूर्त वंदना पंचांग पर देखें।
खंडोबा कौन हैं?+
खंडोबा (मल्हारी, मार्तंड भैरव) भगवान शिव का योद्धा स्वरूप हैं, जो महाराष्ट्र व कर्नाटक में पूजे जाते और मणि-मल्ल राक्षसों के संहार के लिए प्रसिद्ध हैं।
चंपा षष्ठी पूजा कैसे करें?+
प्रायः षष्ठी को पूर्ण होने वाला छह-दिवसीय व्रत: संकल्प लें, खंडोबा या कार्तिकेय का प्रतिदिन हल्दी, चंपा पुष्प व भोग से पूजन करें, मंत्र पढ़ें, आरती करें और परिवार सहित पारण करें।
चंपा षष्ठी पर कौन-सा मंत्र जपें?+
"ॐ शरवणभवाय नमः" और "ॐ श्री सुब्रह्मण्याय नमः" का जप करें, तथा महाराष्ट्र में हर्षमय खंडोबा जयघोष "येळकोट येळकोट जय मल्हार"।
चंपा षष्ठी पर भंडारा क्या है?+
भंडारा का अर्थ है जेजुरी में खंडोबा पर बरसाई जाने वाली हल्दी, और इस पर्व पर सेवा रूप में भक्तों को भोजन कराने हेतु आयोजित सामुदायिक भोज, दोनों।
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Pandit Mahesh Trivedi · Festival Traditions & Panchang
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