लंका दहन क्या है
लंका दहन का अर्थ है "लंका का जलना", यह रामायण की वह प्रसिद्ध घटना है जिसमें सीता माता की खोज के बाद पकड़े जाने पर रावण की सेना हनुमान जी की पूंछ में आग लगा देती है, और वे उसी अग्नि से नगर के कुछ भागों को जला देते हैं, फिर उसे समुद्र में शांत कर लेते हैं।
यह घटना अशोक वाटिका में सीता माता से भेंट के तुरंत बाद घटती है, और इसे उस क्षण के रूप में स्मरण किया जाता है जिसमें संयम, वीरता और रावण के दरबार को एक संदेश, यह सब एक ही नाटकीय क्रम में साथ आते हैं।
दहन की कथा
राम का संदेश सीता माता तक पहुंचाने और उनसे चूड़ामणि प्राप्त करने के बाद, कहा जाता है कि हनुमान जी ने जानबूझकर स्वयं को पकड़वाया, ताकि रावण के दरबार की शक्ति का आकलन कर सकें और एक संदेश दे सकें। हनुमान जी के इस साहस से क्रोधित होकर रावण ने दंड और अपमान स्वरूप उनकी पूंछ में आग लगाने का आदेश दिया।
हनुमान जी व्याकुल होने के बजाय, कहा जाता है कि उस बढ़ती अग्नि का लाभ उठाया। उन्होंने अपनी पूंछ को विस्तृत किया, छत से छत पर कूदते हुए नगर के अधिकांश भाग को जला दिया, और अंत में उस अग्नि को समुद्र में शांत किया। इसे राम सेवा में निर्भयता और रावण को उसकी शक्ति की स्पष्ट चुनौती के रूप में स्मरण किया जाता है।
महत्व और अर्थ
भक्त लंका दहन में नाटकीय दृश्य से परे गहरा अर्थ देखते हैं। इसे अक्सर इस सीख के रूप में पढ़ा जाता है कि अग्नि हनुमान जी को भस्म नहीं कर सकी, जो यह दर्शाता है कि भक्ति और धर्म विपत्ति से अप्रभावित रहकर भी प्रभाव छोड़ सकते हैं।
- धर्म की सेवा में निर्भयता का प्रतीक
- यह स्मरण कि धार्मिक शक्ति आक्रमण में भी संयमित रहती है
- निरपराध जनों को अनावश्यक क्षति पहुंचाए बिना दी गई चेतावनी
- भक्त कठिन परिस्थितियों में साहस के लिए इस घटना का स्मरण करते हैं
भक्त इस घटना का स्मरण कैसे करते हैं

हनुमान चालीसा में यह पराक्रम इस पंक्ति में वर्णित है, "लंका जारि असुर सँहारे", जिसका अर्थ है "आपने लंका जलाई और असुरों का नाश किया", जिसे भक्त हनुमान जी के साहस के प्रति श्रद्धा से गाते हैं। कई मंदिरों और रामलीला के लोक प्रदर्शनों में नवरात्रि और दशहरे के समय यह प्रसंग विशेष उत्साह से मंचित किया जाता है।
भक्त इस कथा का स्मरण विनाश के उत्सव के लिए नहीं, बल्कि इस विचार से शक्ति पाने के लिए करते हैं कि सच्चे भक्त को हानि पहुंचाने के लिए बनाई गई अग्नि स्वयं धर्म की सेवा का साधन बन गई।
एक सरल संदेश
लंका दहन भक्तों को यह स्मरण कराता है कि समर्पित हृदय पर आई विपत्ति, श्रद्धा के बल पर हानि के बजाय शक्ति का स्रोत बन सकती है। यह परिस्थितियां विपरीत लगने पर भी स्थिरता बनाए रखने की प्रेरणा देती है।
इस घटना का श्रद्धापूर्वक स्मरण, हनुमान जी के समस्त कार्यों के स्मरण की भांति, श्रद्धा और प्रेम का कार्य है, विनाश का अनुकरण करने का आह्वान नहीं।
भक्तों के सामान्य प्रश्न
हनुमान जी की पूंछ में आग क्यों लगाई गई?+
कथा के अनुसार, अशोक वाटिका में सीता माता से भेंट के बाद पकड़े जाने पर रावण ने दंड और अपमान स्वरूप हनुमान जी की पूंछ में आग लगाने का आदेश दिया।
अग्नि हनुमान जी को हानि क्यों नहीं पहुंचा सकी?+
भक्तों का विश्वास है कि हनुमान जी की भक्ति और अंतर्निहित शक्ति ने उन्हें हानि से बचाया, और परंपरा के अनुसार उन्हें कष्ट पहुंचाने के लिए बनाई गई अग्नि ही रावण के दरबार को कड़ा संदेश देने का साधन बन गई।
लंका दहन का स्मरण भक्ति परंपरा में कब किया जाता है?+
इस घटना का स्मरण हनुमान चालीसा की लंका जलाने वाली पंक्ति से किया जाता है, और नवरात्रि व दशहरे के समय रामलीला में यह प्रसंग अक्सर मंचित किया जाता है।
About the author
Anjali Mehta · Editor, M.A. Religious Studies
Anjali is the managing editor for Vandnaa and oversees the festival and vrat coverage. She holds an M.A. in Religious Studies and reviews every published article for accuracy, accessibility, and tradition-fidelity.
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