हिंगलाज माता कौन हैं
हिंगलाज माता, जिन्हें भक्त प्रेम से नानी कहकर पुकारते हैं, हिंदू परंपरा के सबसे पूजनीय शक्तिपीठों में से एक हैं। उनका मंदिर बलूचिस्तान की हिंगोल घाटी के दुर्गम क्षेत्र में स्थित है, जो आज हिंगोल नेशनल पार्क के भीतर आता है।
विस्तृत मूर्तियों वाले मंदिरों के विपरीत, यहाँ देवी की पूजा एक छोटी गुफा के भीतर स्थित प्राकृतिक शिला के रूप में होती है, जिसे देवी का स्वयंभू स्वरूप माना जाता है। जो श्रद्धालु यह लंबी मरुस्थलीय यात्रा तय करते हैं, वे इस स्थान को अत्यंत सजीव, शक्तिशाली और हृदयस्पर्शी बताते हैं, जहाँ भक्ति अपने सबसे शुद्ध रूप में अनुभव होती है।
मंदिर से जुड़ी कथा
शक्तिपीठ परंपरा के अनुसार, जब सती ने अपने पिता दक्ष के यज्ञ में अपने प्राण त्याग दिए, तो शोक-संतप्त भगवान शिव उनके शरीर को लेकर संपूर्ण सृष्टि में विचरण करने लगे। शिव के दुःख को शांत करने और सृष्टि का संतुलन बनाए रखने हेतु भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के टुकड़े कर दिए, जो भारतीय उपमहाद्वीप के 51 स्थानों पर गिरे और प्रत्येक स्थान एक शक्तिपीठ बन गया।
मान्यता है कि हिंगलाज में सती का ब्रह्मरंध्र (मस्तक का ऊपरी भाग) गिरा था, जिसके कारण यह शक्तिपीठ देवी के सर्वोच्च और अत्यंत पवित्र अंश से जुड़ा माना जाता है। यहाँ प्रमुख देवी को कोटवी या भैरवी के रूप में तथा उनके साथ भैरव को भीमलोचन के रूप में पूजा जाता है।
महत्व और भक्तों की कामनाएँ
भक्तों की मान्यता है कि हिंगलाज के दर्शन मन को शुद्ध करते हैं और असीम साहस तथा आंतरिक शक्ति प्रदान करते हैं, क्योंकि यह मंदिर देवी के मस्तक से जुड़ा हुआ है। श्रद्धालु यहाँ कठिनाइयों से मुक्ति, परिवार की रक्षा और जीवन की कठिन यात्राओं का सामना करने के संकल्प की कामना लेकर आते हैं।
परंपरा के अनुसार:
- भक्त कठिनाइयों को सहने की शक्ति के लिए प्रार्थना करते हैं
- कई श्रद्धालु संकट के समय लिए गए संकल्पों को पूरा करने आते हैं
- यह मंदिर शुद्धिकरण और श्रद्धा के नवीनीकरण से जुड़ा माना जाता है
हर शक्तिपीठ की तरह यहाँ की पूजा भी एक व्यापार नहीं, बल्कि श्रद्धा और प्रेम का कार्य है।
दर्शन मार्गदर्शिका और नानी की हज यात्रा

यहाँ दर्शन का सबसे महत्वपूर्ण समय वार्षिक हिंगलाज यात्रा है, जिसे नानी की हज भी कहा जाता है, जो सामान्यतः वसंत ऋतु में आयोजित होती है, जब हजारों श्रद्धालु एक साथ काफिले के रूप में मरुस्थलीय मार्ग से यात्रा करते हैं। सिंध और बलूचिस्तान के हिंदू परिवारों द्वारा पीढ़ियों से निभाई जा रही यह सामूहिक यात्रा स्वयं में भक्ति का एक अभिन्न हिस्सा मानी जाती है।
मार्ग में श्रद्धालु अन्य संबंधित पवित्र स्थलों पर भी रुकते हैं, जिसमें एक मिट्टी का ज्वालामुखी शामिल है जिसे गणेश जी का प्रतीक माना जाता है, इसके पश्चात वे मुख्य मंदिर पहुँचते हैं। यात्रा के दौरान भजन, साथ भोजन और सामूहिक रूप से किए गए सरल अनुष्ठानों का माहौल रहता है।
श्रद्धालु हिंगलाज कैसे पहुँचते हैं
हिंगलाज मंदिर बलूचिस्तान के हिंगोल नेशनल पार्क में मकरान तटीय क्षेत्र के भीतर स्थित है। यात्रा के लिए आधार के रूप में उपयोग किया जाने वाला निकटतम प्रमुख नगर कराची है, जहाँ से श्रद्धालुओं के काफिले परंपरागत रूप से मरुस्थल की बहु-दिवसीय यात्रा पर निकलते हैं।
इस क्षेत्र की दुर्गमता को देखते हुए, अधिकांश श्रद्धालु व्यक्तिगत रूप से नहीं बल्कि आयोजित यात्रा समूह के हिस्से के रूप में यात्रा करते हैं, उन्हीं मार्गों से जिनका उपयोग पीढ़ियों से होता आ रहा है। भारत की सीमाओं के बाहर स्थित अन्य शक्तिपीठों की भाँति, इस मंदिर को भी विशुद्ध रूप से प्राचीन भक्ति और विरासत के स्थान के रूप में देखा जाता है।
जप हेतु मंत्र और समापन विचार
हिंगलाज में भक्त प्रायः यह सरल मंत्र जपते हैं: "ॐ हिंगलाज देव्यै नमः" (देवी हिंगलाज को नमन)
यह संक्षिप्त मंत्र कठिन यात्रा से पहले और उसके दौरान देवी का आशीर्वाद पाने हेतु जपा जाता है।
बलूचिस्तान से दूर बैठे श्रद्धालुओं के लिए हिंगलाज माता कठिनाइयों के बीच भी अडिग श्रद्धा का प्रतीक बनी हुई हैं। उन्हें स्मरण करना यह याद रखना है कि भक्ति अक्सर हमें दिव्यता तक पहुँचने से पहले मरुस्थल से होकर गुजरने को कहती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
हिंगलाज माता को नानी मंदिर क्यों कहा जाता है?+
भक्त हिंगलाज माता को प्रेमपूर्वक 'नानी' कहते हैं, जो इस क्षेत्र विशेषकर सिंध के हिंदू परिवारों की देवी के प्रति पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही आत्मीय श्रद्धा को दर्शाता है।
परंपरा के अनुसार हिंगलाज में सती के शरीर का कौन-सा भाग गिरा था?+
शक्तिपीठ परंपरा के अनुसार सती का ब्रह्मरंध्र यानी मस्तक का ऊपरी भाग हिंगलाज में गिरा था, जिससे यह 51 शक्तिपीठों में अत्यंत पवित्र माना जाता है।
हिंगलाज यात्रा मुख्यतः कब आयोजित होती है?+
मुख्य तीर्थयात्रा, जिसे हिंगलाज यात्रा या नानी की हज कहा जाता है, परंपरागत रूप से वसंत ऋतु में आयोजित होती है, जब भक्तों के बड़े समूह मिलकर मरुस्थल पार करते हुए मंदिर पहुँचते हैं।
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Pandit Mahesh Trivedi · Festival Traditions & Panchang
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