शक्तिपीठ क्या हैं
शक्तिपीठ दिव्य माता के सबसे पावन तीर्थ हैं, जो भारत, नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका और पाकिस्तान में फैले हैं। ये उन स्थानों को चिह्नित करते हैं जहाँ भगवान शिव की प्रथम पत्नी सती के शरीर के अंग पृथ्वी पर गिरे माने जाते हैं। यद्यपि अनेक सूचियाँ हैं, 51 शक्तिपीठों की परंपरा सर्वाधिक पूजनीय है। प्रत्येक पीठ देवी की शक्ति (शक्ति) के जीवंत आसन रूप में पूजा जाता है।
सती और अंगों के गिरने की कथा
जब राजा दक्ष ने महान यज्ञ किया और भगवान शिव का अपमान किया, तब उनकी पुत्री सती अपने पति का अपमान सह न सकीं और यज्ञ की अग्नि में देह त्याग दी। शोकाकुल शिव उनका शरीर लिए दुख के तांडव में समस्त सृष्टि में घूमे। उन्हें शोक से मुक्त करने और संतुलन बहाल करने हेतु भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को काटा, और अंग पृथ्वी के विभिन्न स्थानों पर गिरे। जहाँ-जहाँ अंग गिरा वह स्थान शक्तिपीठ बन गया।
शक्तिपीठों का महत्व
प्रत्येक पीठ पर देवी एक विशिष्ट रूप में, उनके रक्षक भैरव (शिव का एक रूप) सहित पूजी जाती हैं। ये पीठ शिव और शक्ति के मिलन तथा इस विश्वास का प्रतिनिधित्व करते हैं कि दिव्य माता की शक्ति समस्त भूमि में व्याप्त है। शक्तिपीठों की तीर्थयात्रा उनकी कृपा, रक्षा और आंतरिक शक्ति के जागरण का मार्ग मानी जाती है। भक्त मानते हैं कि सच्चे दर्शन शोक, भय और बाधाओं को दूर करते हैं।
कुछ सबसे पूजनीय पीठ

सबसे प्रसिद्ध शक्तिपीठों में हैं:
- कामाख्या (असम) - जहाँ योनि की पूजा होती है, तंत्र का महान केंद्र।
- कालीघाट (कोलकाता) - जहाँ पैर की अंगुलियाँ पूजी जाती हैं, माँ काली का धाम।
- वैष्णो देवी (जम्मू) - त्रिकूट पर्वत की प्रिय गुफा तीर्थ।
- विंध्यवासिनी (मिर्जापुर) - विंध्य पर्वत की देवी।
- ज्वाला जी (हिमाचल) - जहाँ देवी रूप में शाश्वत ज्वालाएँ जलती हैं।
- तारा तारिणी, नैना देवी, हिंगलाज और इस क्षेत्र भर में अनेक अन्य।
प्रत्येक का अपना देवी रूप, कथा और परंपरा है।
शक्तिपीठ में जप का मंत्र
किसी भी पीठ पर भक्त सार्वभौमिक देवी मंत्र जपते हैं:
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे
माता की सरल पुकार भी समान रूप से प्रिय है:
जय माता दी और ॐ दुं दुर्गायै नमः
नतमस्तक होकर दुर्गा चालीसा या दुर्गा सप्तशती के छंद पढ़ना और लाल पुष्प, चुनरी व सिंदूर अर्पित करना देवी का आशीर्वाद पाने के पारंपरिक उपाय हैं।
शक्तिपीठ तीर्थयात्रा के सुझाव
पीठ अनेक क्षेत्रों में फैले हैं, इसलिए क्षेत्रवार योजना बनाएँ - जैसे पूर्वी पीठ (कामाख्या, कालीघाट) साथ, या उत्तरी पीठ (वैष्णो देवी, ज्वाला जी, नैना देवी) एक यात्रा में। नवरात्रि सबसे शुभ समय है, यद्यपि तब भीड़ बहुत अधिक रहती है। मर्यादित वस्त्र, चुनरी व प्रसाद जैसे अर्पण साथ रखें, और प्रत्येक तीर्थ की स्थानीय परंपराओं का सम्मान करें। वैष्णो देवी जैसे पर्वतीय तीर्थों हेतु चढ़ाई की तैयारी और आवश्यक वस्तुएँ साथ रखें।
जाने से पूर्व जानने योग्य बातें

अलग-अलग पीठों के अलग नियम हैं - कुछ, जैसे कामाख्या, तांत्रिक परंपराओं और विशेष समयों का पालन करते हैं। मर्यादित वस्त्र पहनें, गर्भगृह से पूर्व जूते उतारें, और स्थानीय पुजारियों के मार्गदर्शन का पालन करें। नवरात्रि में आवास की अग्रिम बुकिंग बुद्धिमानी है, क्योंकि नगर शीघ्र भर जाते हैं। प्रत्येक तीर्थ को, चाहे कितना भी छोटा हो, समान श्रद्धा से देखें, क्योंकि हर पीठ उसी दिव्य माता का जीवंत आसन है।
भक्तों के सामान्य प्रश्न
51 शक्तिपीठ क्या हैं?+
ये देवी के सबसे पावन तीर्थ हैं, जो उन स्थानों को चिह्नित करते हैं जहाँ सती के शरीर के अंग गिरे माने जाते हैं। 51 पीठों की परंपरा कई सूचियों में सर्वाधिक पूजनीय है।
शक्तिपीठ कैसे अस्तित्व में आए?+
सती के देह त्याग के बाद शोकाकुल शिव उसे सृष्टि भर में लिए घूमे। विष्णु ने सुदर्शन चक्र से शरीर काटा, और अंग विभिन्न स्थानों पर गिरे, प्रत्येक एक शक्तिपीठ बना।
सबसे प्रसिद्ध शक्तिपीठ कौन से हैं?+
सबसे पूजनीय में असम का कामाख्या, कोलकाता का कालीघाट, जम्मू की वैष्णो देवी, मिर्जापुर की विंध्यवासिनी और हिमाचल का ज्वाला जी हैं, प्रत्येक का अपना देवी रूप व कथा।
पीठों में कामाख्या में क्या विशेष है?+
असम के कामाख्या में देवी की योनि की पूजा होती है, और यह तंत्र का महान केंद्र है। यह विशिष्ट परंपराओं व विशेष समयों का पालन करता है, देशभर से भक्तों को आकर्षित करता है।
शक्तिपीठ में कौन सा मंत्र जपा जाता है?+
भक्त 'ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे' और 'ॐ दुं दुर्गायै नमः' जपते और 'जय माता दी' का उद्घोष करते हैं। लाल अर्पण के साथ दुर्गा चालीसा पढ़ना भी पारंपरिक है।
शक्तिपीठ यात्रा का सर्वोत्तम समय कब है?+
नवरात्रि सबसे शुभ समय है, यद्यपि भीड़ बहुत अधिक रहती है। पीठों की क्षेत्रवार योजना बनाएँ, आवास अग्रिम बुक करें, और वैष्णो देवी जैसे पर्वतीय तीर्थों हेतु चढ़ाई की तैयारी करें।
About the author
Pandit Ravindra Sharma · Vedic Rituals & Bhakti, 22+ years
Pandit Ravindra is the Vandnaa editorial team's resident specialist on aarti, chalisa, and daily devotion. He has performed home and temple pujas across Varanasi and Delhi for over two decades and contributes the bhakti-focused articles on this site.
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