कनकधारा स्तोत्रम् क्या है
कनकधारा स्तोत्रम् देवी लक्ष्मी - धन व कृपा की दात्री - को समर्पित प्रसिद्ध संस्कृत स्तोत्र है। नाम का अर्थ है 'सोने की धारा' (कनक = सोना, धारा = प्रवाह), जो उस चमत्कार का स्मरण कराता है जिससे इसकी रचना कही जाती है। आदि शंकराचार्य द्वारा रचित, इसके लगभग इक्कीस छंद लक्ष्मी की विष्णु-पत्नी रूप में सबसे करुणामय स्वरूप में स्तुति करते हैं, और भक्त पर उनकी दयादृष्टि आकर्षित करते हैं।
स्वर्ण वर्षा की कथा
बालक रूप में आदि शंकराचार्य एक बार भिक्षा माँगते हुए एक अत्यंत निर्धन स्त्री के घर पहुँचे। देने को कुछ न होने पर उसने विनम्रता से उन्हें एक सूखा आँवला अर्पित किया, जो उसके पास एकमात्र भोजन था। उसकी निःस्वार्थ उदारता से द्रवित होकर शंकराचार्य ने स्वतः ही देवी लक्ष्मी की यह स्तुति गाई, उस पर कृपा की याचना करते हुए। प्रसन्न होकर लक्ष्मी ने उस स्त्री के घर स्वर्ण आँवलों की वर्षा की, उसे निर्धनता से उबारा - और स्तोत्र का नाम कनकधारा, सोने की धारा, पड़ा।
प्रतिनिधि प्रारंभिक छंद
स्तोत्र लक्ष्मी की कृपा के विष्णु पर पड़ते सुंदर चित्र से आरंभ होता है:
अंगं हरेः पुलक-भूषणम्-आश्रयन्ती, भृंगांगनेव मुकुलाभरणं तमालम्। अंगीकृत-अखिल-विभूतिर्-अपांग-लीला, मांगल्यदास्तु मम मंगल-देवतायाः॥
अर्थ: लक्ष्मी की चंचल कटाक्ष-लीला, जो विष्णु के शरीर पर भ्रमरी के पुष्पित तमाल पर बैठने सी टिकी है और समस्त ऐश्वर्य धारण करती है, मुझे मंगल प्रदान करे। प्रत्येक छंद उनकी सुंदरता चित्रित करता और उनकी दयादृष्टि की प्रार्थना करता है।
स्तोत्र किसकी स्तुति करता है

कनकधारा का प्रत्येक छंद लक्ष्मी की *दयामयी कटाक्ष-दृष्टि (अपांग या कटाक्ष) पर प्रेम से ठहरता है, क्योंकि यही दृष्टि सौभाग्य लाती है। शंकराचार्य उन्हें अनेक नामों से पुकारते हैं - कमला, पद्मा, रमा, हरि-वल्लभा* - और उन्हें उनकी असीम करुणा का स्मरण कराते हैं, अयोग्य पर भी कृपादृष्टि की याचना करते हुए। स्तोत्र भाषा की महान सुंदरता को गहन समर्पण से मिलाता है, केवल धन नहीं बल्कि उनकी प्रेममयी कृपा माँगते हुए।
कब और कैसे पाठ करें
1. स्नान कर लक्ष्मी (या लक्ष्मी-नारायण) के चित्र के सामने पूर्व या उत्तर की ओर मुख कर बैठें। 2. घी का दीपक जलाएँ, लाल या कमल पुष्प, कुमकुम व मिठाई अर्पित करें। 3. स्तोत्र शांति से पढ़ें, आदर्शतः पूजा के बाद प्रातः। शुक्रवार, दीपावली, अक्षय तृतीया व लक्ष्मी पूजा के दिन विशेष शुभ हैं। अनेक भक्त इसे एक निश्चित अवधि (जैसे 41 दिन) तक स्थिर श्रद्धा से प्रतिदिन पढ़ते हैं, लक्ष्मी मंत्र ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः और समृद्धि व संतोष दोनों की प्रार्थना से समापन करते हुए।
कनकधारा स्तोत्रम् के लाभ
कनकधारा स्तोत्रम् निर्धनता दूर करने और धन, समृद्धि व प्रचुरता आकर्षित करने के सबसे विश्वसनीय स्तोत्रों में है। यह आर्थिक बाधाएँ व ऋण दूर करता, व्यवसाय व करियर में स्थिरता व वृद्धि लाता, और घर में लक्ष्मी की स्थायी कृपा आमंत्रित करता माना जाता है। भौतिक लाभ से परे, भक्त कहते हैं यह अंतर्संतोष लाता, चिंता दूर करता, और कृतज्ञता जगाता है - वही सच्चा धन जो लक्ष्मी को बनाए रखता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
कनकधारा स्तोत्रम् क्या है?+
यह आदि शंकराचार्य द्वारा रचित देवी लक्ष्मी का संस्कृत स्तोत्र है। 'कनकधारा' का अर्थ है 'सोने की धारा', जो उस स्वर्ण वर्षा का स्मरण कराता है जो यह एक निर्धन स्त्री के लिए लाई कही जाती है।
कनकधारा स्तोत्रम् के पीछे की कथा क्या है?+
एक निर्धन स्त्री ने बालक आदि शंकराचार्य को भिक्षा में एकमात्र आँवला दिया, जो उसके पास सब कुछ था। द्रवित होकर उन्होंने लक्ष्मी की यह स्तुति गाई, जिन्होंने उसके घर स्वर्ण आँवलों की वर्षा कर निर्धनता समाप्त की।
प्रारंभिक छंद किसका वर्णन करता है?+
'अंगं हरेः पुलक भूषणम्' से आरंभ छंद लक्ष्मी की चंचल कटाक्ष-दृष्टि की प्रार्थना करता है, जो भ्रमरी के तमाल पर बैठने सी विष्णु पर टिकी है, कि वह भक्त को मंगल व कृपा प्रदान करे।
कनकधारा स्तोत्रम् के क्या लाभ हैं?+
इसे निर्धनता दूर करने व धन-समृद्धि आकर्षित करने, ऋण व आर्थिक बाधाएँ दूर करने, करियर में वृद्धि लाने, और लक्ष्मी की स्थायी कृपा व अंतर्संतोष आमंत्रित करने हेतु पढ़ा जाता है।
कनकधारा स्तोत्रम् कब पढ़ना चाहिए?+
पूजा के बाद प्रातः आदर्श है, विशेषकर शुक्रवार, दीपावली, अक्षय तृतीया व लक्ष्मी पूजा के दिन। अनेक भक्त इसे 41 दिन जैसी निश्चित अवधि तक स्थिर श्रद्धा से प्रतिदिन पढ़ते हैं।
क्या कनकधारा स्तोत्रम् केवल धन लाता है?+
नहीं। धन के अतिरिक्त, भक्त कहते हैं यह अंतर्संतोष लाता, चिंता दूर करता और कृतज्ञता जगाता है। यही कृतज्ञ, संतुलित मन सच्चा धन है जो लक्ष्मी की कृपा बनाए रखता है।
About the author
Acharya Vinaya Kapoor · M.A. Sanskrit, Mantra & Stotra Studies
Acharya Vinaya holds an M.A. in Sanskrit from Banaras Hindu University and writes the mantra and stotra commentary on Vandnaa. Her focus is on accurate pronunciation, traditional context, and helping modern readers connect with classical texts.
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