कोल्लूर: कोडचाद्रि की तलहटी में विराजी देवी
कर्नाटक के उडुपी जिले में स्थित कोल्लूर, मूकाम्बिका मंदिर का घर है, जो घने वनों से आच्छादित कोडचाद्रि पर्वत की तलहटी में सौपर्णिका नदी के तट पर बसा है। यहाँ की अधिष्ठात्री देवी मूकाम्बिका को उस स्वरूप में पूजा जाता है जिसमें भक्तों की समझ के अनुसार शक्ति और शिव दोनों एक ही ज्योतिर्लिंग में समाहित हैं।
यह मंदिर कर्नाटक, केरल और उससे आगे तक के तीर्थयात्रियों को आकर्षित करता है, जिनमें से अनेक मूकाम्बिका को दक्षिण भारत के सबसे शक्तिशाली देवी मंदिरों में गिनते हैं।
मूकाम्बिका की कथा
परंपरा के अनुसार एक असुर को लगभग अजेय होने का वरदान मिला था, इस शर्त पर कि वह वाणीहीन रहेगा, और इसी मूकत्व के कारण उसे मूकासुर कहा गया। जब उसका अत्याचार असहनीय हो गया, तो देवी ने इसी स्थान पर उसका सामना कर उसे पराजित किया, और तभी से वे मूकाम्बिका, अर्थात मूकासुर का अंत करने वाली देवी कहलाईं।
भक्तों में गहरी श्रद्धा से प्रचलित एक और परंपरा यह है कि आदि शंकराचार्य ने इसी क्षेत्र में यात्रा के दौरान यहाँ पूजित पवित्र ज्योतिर्लिंग की प्रतिष्ठा स्वयं की थी, इसमें उन्हें शक्ति और शिव का वही मिलन दिखा जो यह तीर्थ आज भी दर्शाता है।
मूकाम्बिका इतनी व्यापक रूप से पूजनीय क्यों हैं
कोल्लूर मूकाम्बिका विशेष रूप से विद्यारंभ संस्कार के लिए जानी जाती है, जो बालक के औपचारिक शिक्षा में पहले कदम का प्रतीक है, जब बच्चे का हाथ पकड़कर चावल की थाली में अक्षर लिखवाए जाते हैं, देवी से ज्ञान-मार्ग पर आशीर्वाद माँगते हुए। असंख्य परिवार विशेष रूप से इसी संस्कार के लिए कोल्लूर आते हैं।
- भक्त मूकाम्बिका से ज्ञान, रक्षा और जीवन तथा शिक्षा की बाधाओं के निवारण के लिए प्रार्थना करते हैं
- सौपर्णिका नदी, जिसके विषय में माना जाता है कि इसमें कोडचाद्रि वन की जड़ी-बूटियों के औषधीय गुण घुले हैं, तीर्थयात्रियों के लिए स्वयं में पवित्र मानी जाती है
- मंदिर में शक्ति और शिव उपासना का यह मिश्रण इसे दोनों परंपराओं के भक्तों के लिए एक विशिष्ट और संपूर्ण तीर्थ बनाता है
दर्शन गाइड: समय और विद्यारंभ संस्कार

मंदिर में प्रातःकाल से रात्रि तक अनुष्ठानों का पूरा क्रम चलता है, और दिन भर में कई दर्शन सत्र होते हैं। विद्यारंभ कराने की इच्छा रखने वाले परिवारों को सलाह दी जाती है कि वे पहुँचने पर मंदिर कार्यालय से जानकारी लें, क्योंकि यह संस्कार निर्धारित समय पर होता है और प्रायः लंबी कतारें देखी जाती हैं, विशेष रूप से विजयादशमी के आसपास, जो इस संस्कार के लिए विशेष शुभ दिन माना जाता है।
नवरात्रि मंदिर का सबसे महत्वपूर्ण पर्व-काल है, जब कोल्लूर में देवी की पूजा के लिए विशेष रूप से बड़ी संख्या में तीर्थयात्री पहुँचते हैं।
कोल्लूर कैसे पहुँचें
कोल्लूर तक पहुँचने का सबसे सुविधाजनक मार्ग कोंकण रेलवे है, जहाँ ब्यंदूर मूकाम्बिका रोड और कुंदापुर निकटतम स्टेशनों में गिने जाते हैं, इसके बाद सड़क मार्ग से मंदिर तक पहुँचा जाता है। मंगलुरु अंतरराष्ट्रीय विमानतल निकटतम विमानतल है, और कोल्लूर सड़क मार्ग से उडुपी तथा तटीय कर्नाटक के अन्य नगरों से भी जुड़ा है, जिससे इसे व्यापक तीर्थ यात्रा के साथ जोड़ना सरल हो जाता है।
एक सरल प्रार्थना और सीख
कोल्लूर में भक्त प्रायः ॐ मूकाम्बिकायै नमः का जाप करते हैं, जो देवी से ज्ञान और रक्षा का आशीर्वाद माँगने वाला एक सरल प्रणाम है।
मूकाम्बिका की कथा, मौन पर विजय और ज्ञान के आवाहन की कथा, हमें स्मरण कराती है कि सच्ची शक्ति प्रायः भक्ति द्वारा अपनी वाणी पाने में ही निहित होती है। चाहे पहली पाठशाला हो या जीवनभर की प्रार्थना, यहाँ की यात्रा श्रद्धा का अर्पण है, कोई सौदा नहीं।
पाठकों के प्रश्न
कोल्लूर मूकाम्बिका में विद्यारंभ का क्या महत्व है?+
विद्यारंभ बालक के औपचारिक शिक्षा में पहले कदम का संस्कार है, जो मंदिर में बच्चे का हाथ पकड़कर अक्षर लिखवाते हुए किया जाता है, इससे उसकी शिक्षा पर मूकाम्बिका का आशीर्वाद माँगा जाता है।
मूकाम्बिका को शक्ति और शिव दोनों रूप में क्यों पूजा जाता है?+
परंपरा के अनुसार कोल्लूर का ज्योतिर्लिंग शक्ति और शिव के मिलन को दर्शाता है, और मान्यता है कि इसकी प्रतिष्ठा आदि शंकराचार्य ने इस क्षेत्र की यात्रा के दौरान की थी।
कोल्लूर मूकाम्बिका मंदिर कैसे पहुँचें?+
निकटतम रेलवे स्टेशन कोंकण रेलवे पर स्थित ब्यंदूर मूकाम्बिका रोड और कुंदापुर हैं, जहाँ से थोड़ी दूरी सड़क मार्ग से तय की जाती है, जबकि मंगलुरु अंतरराष्ट्रीय विमानतल निकटतम विमानतल है।
About the author
Pandit Ravindra Sharma · Vedic Rituals & Bhakti, 22+ years
Pandit Ravindra is the Vandnaa editorial team's resident specialist on aarti, chalisa, and daily devotion. He has performed home and temple pujas across Varanasi and Delhi for over two decades and contributes the bhakti-focused articles on this site.
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