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ॐ (ओम) प्रतीक - अर्थ, महत्व और जप के लाभ
Spiritual Wisdom

ॐ (ओम) प्रतीक - अर्थ, महत्व और जप के लाभ

9 मिनट पढ़ेंप्रकाशित जून 3, 2026
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By Pandit Ravindra Sharma · Vedic Rituals & Bhakti, 22+ years

Reviewed by Acharya Vinaya Kapoor · M.A. Sanskrit, Mantra & Stotra Studies

ॐ (ओम) क्या है

ॐ, जिसे अउम लिखा जाता है, हिंदू, बौद्ध और जैन परंपराओं में सबसे पवित्र ध्वनि और प्रतीक है। इसे प्रणव कहा जाता है - वह आदि स्पंदन जिससे समस्त ब्रह्मांड उत्पन्न माना जाता है। शास्त्र ॐ को परम सत्य ब्रह्म के नाद रूप और हर अन्य मंत्र के बीज के रूप में वर्णित करते हैं। ॐ का उच्चारण करना ध्वनि, सृष्टि और चेतना के मूल स्रोत को स्पर्श करना है।

तीन ध्वनियाँ - अ, उ और म

ॐ तीन ध्वनियों से बना है जो एक में मिल जाती हैं:

- सृष्टि की ध्वनि, जाग्रत अवस्था और भगवान ब्रह्मा से जुड़ी। - पालन की ध्वनि, स्वप्न अवस्था और भगवान विष्णु से जुड़ी। - संहार की ध्वनि, सुषुप्ति और भगवान शिव से जुड़ी।

तीन ध्वनियों के बाद आने वाला मौन तुरीय को दर्शाता है - चेतना की चौथी, शुद्ध अवस्था जो अन्य तीन से परे है। इस प्रकार ॐ सृष्टि, पालन, संहार और मौन परम तत्व - सबको एक ही अक्षर में धारण करता है।

लिखित प्रतीक और उसके भाग

परिचित लिखित ॐ अर्थ से परिपूर्ण है। इसका बड़ा निचला वक्र जाग्रत अवस्था, ऊपरी वक्र सुषुप्ति अवस्था और मध्य वक्र स्वप्न अवस्था को दर्शाता है। ऊपर का अर्धचंद्र (चंद्रबिंदु) माया या भ्रम का प्रतीक है, और शीर्ष पर स्थित बिंदु परम तत्व, तुरीय है - भ्रम से परे का लक्ष्य। संपूर्ण आकृति एक ही सुंदर रूप में अंकित चेतना का मानचित्र है।

शास्त्र और उपासना में महत्व

शास्त्र और उपासना में महत्व

माण्डूक्य उपनिषद पूर्णतः ॐ को समर्पित है, और भगवद् गीता कहती है कि जो ॐ का उच्चारण करते हुए देह त्यागता है वह परम गति को प्राप्त होता है। लगभग हर वैदिक मंत्र, प्रार्थना और अनुष्ठान भाव को शुद्ध करने और दिव्यता का आह्वान करने हेतु ॐ से आरंभ होता है। यह गायत्री मंत्र और अधिकांश बीज मंत्रों के आरंभ में रखा जाता है, और शुभ आरंभ के चिह्न रूप में घर के मंदिर, मंदिर द्वार और पवित्र ग्रंथों के आरंभ में अंकित किया जाता है।

ॐ का जप कैसे करें

1. स्वच्छ व शांत स्थान में, सीधी रीढ़ के साथ, आदर्श रूप से पूर्व की ओर मुख करके आराम से बैठें। 2. आँखें बंद करें और मन को स्थिर करने हेतु कुछ धीमी, गहरी साँसें लें। 3. पूरी साँस भरें, फिर साँस छोड़ते हुए अउम का जप करें - अ को पेट से उठने दें, उ को छाती तक ले जाएँ और म को होंठों पर गुंजायमान करें। 4. स्पंदन को पूरे शरीर में फैलते अनुभव करें, फिर ध्वनि के बाद के मौन में विश्राम करें। 5. इसे 11, 21 या 108 बार दोहराएँ; रुद्राक्ष माला गिनती रखने में सहायक है। प्रातःकाल और ध्यान के समय सर्वाधिक लाभकारी होते हैं।

ॐ जप के लाभ

ॐ का जप तंत्रिका तंत्र को शांत करता, साँस को धीमा करता और तनाव घटाता माना जाता है, जिससे मन स्वच्छ व एकाग्र रहता है। स्थिर गुंजायमान स्पंदन शरीर व मन में सामंजस्य लाता, ध्यान में एकाग्रता गहराता और भीतरी शांति का भाव उत्पन्न करता कहा जाता है। आध्यात्मिक स्तर पर नियमित ॐ साधना हृदय को शुद्ध करती, अहंकार को विलीन करती और साधक को ब्रह्म से एकत्व के अनुभव की ओर ले जाती मानी जाती है।

करें और न करें

करें और न करें

करें: स्वच्छ शरीर व मन से, शांत स्थान में जप करें, ध्वनि को धीरे-धीरे खींचें और बाद के मौन में विश्राम करें। न करें: अक्षर को जल्दबाज़ी में न बोलें, विचलित होकर लापरवाही से जप न करें, या प्रतीक का अनादर न करें। ॐ प्रतीक को फर्श, पादुका या किसी अशुद्ध वस्तु पर न रखें, क्योंकि यह पवित्र है और श्रद्धा से रखा जाना चाहिए।

त्वरित उत्तर

ॐ (ओम) का अर्थ क्या है?+

ॐ आदि नाद, प्रणव है, जिससे सृष्टि उत्पन्न मानी जाती है। इसके तीन अक्षर अ-उ-म सृष्टि, पालन और संहार को दर्शाते हैं, और उनके बाद का मौन परम सत्य, ब्रह्म को।

तीन अक्षर अ, उ और म किसका प्रतीक हैं?+

अ सृष्टि व जाग्रत अवस्था (ब्रह्मा), उ पालन व स्वप्न अवस्था (विष्णु), और म संहार व सुषुप्ति (शिव) है। उनके बाद का मौन तुरीय है - चौथी, शुद्ध अवस्था।

ॐ जप के क्या लाभ हैं?+

ॐ जप मन को शांत करता, साँस धीमी करता, तनाव घटाता और एकाग्रता गहराता है। इसका स्थिर स्पंदन भीतरी शांति लाता और समय के साथ आध्यात्मिक विकास व एकत्व के भाव में सहायक होता है।

ॐ का जप कितनी बार करना चाहिए?+

कोई कठोर नियम नहीं, पर 11, 21 या 108 बार सामान्य है। रुद्राक्ष माला गिनती रखने में सहायक है। कुछ ही ध्यानपूर्ण, धीरे खींचे गए जप भी लाभकारी हैं।

क्या कोई भी ॐ का जप कर सकता है?+

हाँ। ॐ का जप किसी भी आयु या पृष्ठभूमि का कोई भी कर सकता है। यह सभी साधकों का है और केवल सच्चाई, शांत मन और पवित्र नाद के प्रति श्रद्धापूर्ण भाव चाहता है।

अधिकांश मंत्रों के आरंभ में ॐ क्यों आता है?+

ॐ सभी मंत्रों का बीज और ब्रह्म का नाद रूप है। किसी मंत्र या प्रार्थना को ॐ से आरंभ करना भाव को शुद्ध करता, मन को एकाग्र करता और शुभ आरंभ हेतु दिव्यता का आह्वान करता है।

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About the author

Pandit Ravindra Sharma · Vedic Rituals & Bhakti, 22+ years

Pandit Ravindra is the Vandnaa editorial team's resident specialist on aarti, chalisa, and daily devotion. He has performed home and temple pujas across Varanasi and Delhi for over two decades and contributes the bhakti-focused articles on this site.

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