पूर्णमदः पूर्णमिदम् मंत्र क्या है?
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदम् वैदिक परंपरा के सबसे प्रिय शांति मंत्रों में से एक है। यह ईशावास्य उपनिषद का मंगलाचरण या शांति पाठ है, जो शुक्ल यजुर्वेद से जुड़ा है। परंपरा में गुरु और शिष्य उपनिषद का अध्ययन शुरू करने से पहले इसे साथ बोलते थे, ताकि विद्या शांति से आगे बढ़े।
इसे पूर्णता का मंत्र कहा जाता है, क्योंकि इसमें पूर्णम् शब्द बार-बार आता है, जिसका अर्थ है संपूर्ण या अखंड। केवल दो पंक्तियों में यह वेदांत का सार कह देता है: अदृश्य ब्रह्म पूर्ण है, दिखने वाला जगत पूर्ण है, जगत ब्रह्म से ही प्रकट होता है, फिर भी ब्रह्म कभी कम नहीं होता। जिन्हें जीवन में हमेशा कुछ कमी महसूस होती है, उनके लिए यह मंत्र एक कोमल और गहरा उत्तर है।
संपूर्ण मंत्र - देवनागरी, उच्चारण और सरल अर्थ
यहाँ संपूर्ण शांति मंत्र दिया गया है।
देवनागरी:
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
सरल अर्थ: वह (ब्रह्म) पूर्ण है। यह (दृश्य जगत) पूर्ण है। पूर्ण से ही पूर्ण प्रकट होता है। पूर्ण में से पूर्ण निकाल लेने पर भी पूर्ण ही शेष रहता है। ॐ शांति, शांति, शांति।
इस श्लोक में किसी देवता का नाम नहीं है। यह केवल पूर्णम् यानी पूर्णता की बात करता है, इसीलिए हर भक्ति-परंपरा के लोग इसे प्रार्थना, अध्ययन और ध्यान के आरंभ में समान श्रद्धा से बोलते हैं।
मंत्र का शब्दशः अर्थ
इस मंत्र का हर शब्द गहरा अर्थ रखता है, फिर भी शब्द बहुत सरल हैं।
1. *पूर्णम् - पूर्ण, संपूर्ण, जिसमें कोई कमी नहीं। 2. अदः - वह, यानी इंद्रियों से परे अदृश्य सत्ता, ब्रह्म। 3. इदम् - यह, यानी हमारे सामने दिखता हुआ जगत। 4. पूर्णात् - पूर्ण से, उस संपूर्ण स्रोत से। 5. उदच्यते - प्रकट होता है, उत्पन्न होता है। 6. पूर्णस्य - पूर्ण का। 7. आदाय - लेकर, निकालकर। 8. एव - ही, केवल। 9. अवशिष्यते* - शेष रहता है, बचा रहता है।
सब मिलाकर: वह पूर्ण है, यह पूर्ण है; पूर्ण से पूर्ण प्रकट होता है; पूर्ण में से पूर्ण लेने पर भी पूर्ण ही शेष रहता है। यह दोहराव जानबूझकर है - यह एक ही सत्य को हर दिशा से हृदय में बैठा देता है: पूर्णता कभी घटती नहीं।
पूर्णता का दर्शन - सरल भाषा में

पूर्ण में से पूर्णता निकालने पर भी कुछ पूर्ण कैसे रह सकता है? साधारण वस्तुओं में यह असंभव है। घड़े से पानी निकालो तो पानी कम हो जाता है। पर मंत्र वस्तुओं की बात नहीं कर रहा - यह अनंत की बात कर रहा है।
एक आधुनिक उदाहरण गणित से लें: अनंत में से अनंत घटाने पर भी अनंत ही बचता है। ब्रह्म कोई बड़ी मात्रा नहीं है जिसे बाँटा जा सके; वह स्वयं असीम सत्ता है। जब ब्रह्म से जगत प्रकट होता है, तो ब्रह्म घटता नहीं, जैसे आपके मन से उठा सपना आपके मन को कम नहीं करता।
दूसरी सीख और भी व्यक्तिगत है। यदि यह जगत भी पूर्ण है, तो आप भी उस पूर्णता में सम्मिलित हैं। अधूरेपन की बेचैनी, कि बस एक और उपलब्धि मिल जाए तो जीवन पूरा हो जाएगा, एक भूल पर टिकी है। उपनिषद कहता है कि पूर्णता कमाई नहीं जाती - वह आपका स्वभाव है, बस पहचानने की देर है।
यह शांति मंत्र कब और कैसे बोलें
इस मंत्र के लिए कोई कठोर नियम या विधि अनिवार्य नहीं है - विधि से अधिक श्रद्धा का महत्व है। फिर भी ये पारंपरिक सुझाव सहायक हैं:
1. अध्ययन या प्रार्थना से पहले - शास्त्र पढ़ने, पूजा या ध्यान शुरू करने से पहले एक बार बोलें, ताकि साधना निर्विघ्न रहे। 2. प्रातः पाठ - सुबह उठकर इसका पाठ पूरे दिन के लिए संतोष का भाव बना देता है। 3. धीरे और स्पष्ट - हर शब्द धीरे बोलें; जब-जब पूर्णम् आए, उसे मन में उतरने दें। 4. श्लोक के बाद रुकें - ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः के बाद कुछ साँसें मौन बैठें, अर्थ को महसूस करें। 5. परिवार के साथ बोलें - शब्द छोटे और लयबद्ध हैं, इसलिए बच्चों के लिए सीखना आसान है।
अधिकतर लोग इसे एक या तीन बार बोलते हैं। माला या निश्चित संख्या की आवश्यकता नहीं - यह चिंतन का मंत्र है, जप का विधान नहीं।
पूर्णमदः पूर्णमिदम् जप के लाभ
जो भक्त नियमित रूप से इस मंत्र का पाठ करते हैं, वे शांत पर स्थायी परिवर्तन अनुभव करते हैं:
1. अभाव-बुद्धि से मुक्ति - भीतर की लगातार आवाज़ कि कुछ कम है, धीरे-धीरे शांत होती है, क्योंकि मंत्र मन को हर ओर पूर्णता देखना सिखाता है। 2. संतोष - जो नहीं है उसकी चिंता की जगह, जो है उसके लिए कृतज्ञता आती है। 3. कार्य से पहले स्थिरता - काम या पढ़ाई से पहले बोलने पर खोने का डर हटता है और प्रयास हल्का व स्पष्ट होता है। 4. दुख में सांत्वना - शोक के समय मंत्र याद दिलाता है कि जो सारभूत है, वह कभी घटता नहीं। 5. वेदांत का द्वार - उपनिषदों की गहनतम शिक्षा में प्रवेश का यह सबसे सरल मार्ग है।
ये लाभ चिंतन के आध्यात्मिक और भावनात्मक फल हैं, कोई चमत्कारिक दावे नहीं। मंत्र वैसे काम करता है जैसे धूप कली पर - धीरे-धीरे, प्रतिदिन, भीतर से।
पूर्णता को जीना - दैनिक जीवन में

मंत्र की असली परीक्षा पाठ में नहीं, जीवन में है। ये छोटे अभ्यास आज़माएँ:
1. सुबह फोन देखने से पहले एक बार मंत्र बोलें और स्वयं से कहें: मैं इस दिन की शुरुआत पहले से ही पूर्ण होकर कर रहा हूँ। 2. किसी की सफलता पर ईर्ष्या उठे तो पूर्णस्य पूर्णमादाय याद करें - उनकी पूर्णता आपकी पूर्णता से कुछ नहीं घटाती। 3. देते समय - समय, सहायता या दान - याद रखें कि पूर्णता से देने पर आप खाली नहीं होते। 4. रात में, क्या गलत हुआ गिनने की जगह, तीन बातें खोजें जिनमें दिन जैसा था वैसा ही पूर्ण था।
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पाठकों के प्रश्न
पूर्णमदः पूर्णमिदम् किस उपनिषद से है?+
यह ईशावास्य उपनिषद का शांति मंत्र (मंगलाचरण) है, जो शुक्ल यजुर्वेद से जुड़ा है। इसी वेद के अन्य उपनिषदों, जैसे बृहदारण्यक उपनिषद, के साथ भी इसका पाठ होता है।
पूर्णमदः पूर्णमिदम् का एक पंक्ति में अर्थ क्या है?+
वह (ब्रह्म) पूर्ण है, यह (जगत) पूर्ण है; पूर्ण से पूर्ण प्रकट होता है, और पूर्ण में से पूर्ण निकालने पर भी पूर्ण ही शेष रहता है।
क्या बिना गुरु के नए साधक यह मंत्र बोल सकते हैं?+
हाँ। यह एक सार्वभौमिक शांति मंत्र है जिसके लिए दीक्षा आवश्यक नहीं। कोई भी श्रद्धापूर्वक इसे बोल सकता है। गुरु अर्थ को गहरा करने में सहायक हैं, पर पाठ के लिए अनिवार्य नहीं।
पूर्णमदः पूर्णमिदम् का पाठ कब करना सबसे अच्छा है?+
परंपरागत रूप से इसे शास्त्र अध्ययन, प्रार्थना या ध्यान से पहले बोला जाता है। स्नान के बाद प्रातःकाल उत्तम माना जाता है, पर दिन के किसी भी स्वच्छ, शांत समय में इसका पाठ किया जा सकता है।
मंत्र के अंत में तीन बार शांति क्यों बोली जाती है?+
तीन बार शांति बोलना तीन प्रकार के विघ्नों से शांति की प्रार्थना है: आधिदैविक (दैवी और प्राकृतिक शक्तियाँ), आधिभौतिक (अन्य प्राणी) और आध्यात्मिक (अपना शरीर और मन)।
क्या पूर्णमदः पूर्णमिदम् किसी एक देवता से जुड़ा है?+
नहीं। मंत्र में किसी देवता का नाम नहीं है; यह स्वयं ब्रह्म की पूर्णता की बात करता है। इसीलिए हर भक्ति परंपरा में, चाहे आराध्य कोई भी हों, इसका पाठ किया जाता है।
About the author
Acharya Vinaya Kapoor · M.A. Sanskrit, Mantra & Stotra Studies
Acharya Vinaya holds an M.A. in Sanskrit from Banaras Hindu University and writes the mantra and stotra commentary on Vandnaa. Her focus is on accurate pronunciation, traditional context, and helping modern readers connect with classical texts.
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