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पुरुष सूक्तम - बोल, अर्थ और लाभ
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पुरुष सूक्तम - बोल, अर्थ और लाभ

10 मिनट पढ़ेंप्रकाशित जून 3, 2026
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By Acharya Vinaya Kapoor · M.A. Sanskrit, Mantra & Stotra Studies

Reviewed by Anjali Mehta · Editor, M.A. Religious Studies

पुरुष सूक्तम क्या है

पुरुष सूक्तम ऋग्वेद (मण्डल 10, सूक्त 90) के सर्वाधिक पूज्य स्तोत्रों में से एक है, जो अन्य वेदों में भी पाया जाता है। यह पुरुष - विराट पुरुष या परम पुरुष - का स्तोत्र है, जिन्हें वैष्णव परंपरा में विष्णु-नारायण माना जाता है। यह सूक्त वर्णन करता है कि किस प्रकार सारा ब्रह्मांड, तत्त्व, देवता, सूर्य व चंद्र, और समाज भी इस अनंत पुरुष के एक महान विराट यज्ञ (यज्ञ) से उत्पन्न होते हैं।

वैदिक उपासना में महत्व

पुरुष सूक्तम वैदिक व मंदिर उपासना में केंद्रीय स्थान रखता है। इसका पाठ अभिषेक, होम, मूर्ति प्रतिष्ठा और विष्णु पूजा में किया जाता है, और इसे दिव्य का पूर्ण वर्णन माना जाता है - जो परे भी है और समस्त सृष्टि में उपस्थित भी। यह सिखाता है कि वही परम पुरुष सब में व्याप्त है - दृश्य जगत पुरुष का केवल एक अंश है, जिनका बड़ा भाग परे रहता है। यह नारायण उपासना के सर्वाधिक महत्वपूर्ण सूक्तों में से एक है।

प्रारंभिक छंद - लिप्यंतरण और देवनागरी

प्रसिद्ध प्रारंभिक छंद पुरुष के अनंत रूप का वर्णन करता है:

सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्। स भूमिं विश्वतो वृत्वा अत्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम्॥

इसका अर्थ है: 'विराट पुरुष के सहस्र शीश, सहस्र नेत्र और सहस्र चरण हैं। पृथ्वी को चारों ओर से व्याप्त कर वे उससे दस अंगुल आगे विस्तृत हैं' - यह दर्शाता है कि दिव्य समस्त सृष्टि को भरता है फिर भी उससे परे है।

विराट यज्ञ का अर्थ

विराट यज्ञ का अर्थ

पुरुष सूक्तम का हृदय विराट यज्ञ है: पुरुष के यज्ञ से वेद, पशु, ग्रह, तत्त्व और मानव समाज के चार विभाग उत्पन्न होते हैं। गहरा अर्थ यह है कि समस्त सृष्टि पवित्र है, एक दिव्य पुरुष से उत्पन्न, और इसलिए श्रद्धा के योग्य है। यह सूक्त एकता प्रकट करता है - घास के तिनके से लेकर सूर्य तक सब एक ही दिव्य स्रोत, उस पुरुष को साझा करते हैं जो नारायण हैं।

कैसे और कब पाठ करें

1. स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहनें और विष्णु या नारायण के चित्र के सामने पूर्व की ओर मुख कर बैठें। 2. घी का दीपक जलाएँ और तुलसी, पीले पुष्प व थोड़ा जल अर्पित करें। 3. यदि ज्ञात हो तो सही वैदिक उच्चारण व स्वर (आरोह-अवरोह) के साथ छंद पढ़ें; अन्यथा धीरे व श्रद्धा से पढ़ें। 4. इसे प्रायः अभिषेक में जपा जाता है, प्रत्येक छंद के साथ एक अर्पण करते हुए। 5. विष्णु आरती व प्रणाम से समापन करें। एकादशी, गुरुवार और विष्णु पर्व इसके पाठ हेतु विशेष शुभ हैं।

पुरुष सूक्तम के लाभ

पुरुष सूक्तम का पाठ महान आध्यात्मिक पुण्य, नारायण की कृपा, घर में शांति व सामंजस्य, और मन व वातावरण की शुद्धि लाता माना जाता है। यह बाधाएँ दूर करता, समृद्धि व उत्तम स्वास्थ्य आकर्षित करता, और अनुष्ठानों व होमों को पूर्णता का आशीर्वाद देता कहा जाता है। सबसे बढ़कर, यह इस समझ को गहरा करता है कि वही दिव्य उपस्थिति समस्त जीवन में व्याप्त है, जिससे श्रद्धा व आंतरिक शांति बढ़ती है।

सही पाठ के सुझाव

सही पाठ के सुझाव

एक वैदिक स्तोत्र होने के कारण पुरुष सूक्तम को किसी गुरु या प्रामाणिक रिकॉर्डिंग से सही स्वर के साथ सीखना सर्वोत्तम है, क्योंकि वेदों में आरोह-अवरोह अर्थ रखता है। यदि स्वर न साध सकें, तो समझ के साथ स्पष्ट व श्रद्धापूर्वक पाठ भी लाभ देता है। स्वच्छता व एकाग्र मन बनाए रखें, और कभी जल्दबाजी न करें; सूक्त की शक्ति समय के साथ ध्यानपूर्वक, सच्ची पुनरावृत्ति में है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पुरुष सूक्तम क्या है?+

पुरुष सूक्तम ऋग्वेद का एक स्तोत्र है जो विराट पुरुष को समर्पित है, जिन्हें विष्णु-नारायण माना जाता है, और जो वर्णन करता है कि सारा ब्रह्मांड उनके महान विराट यज्ञ से उत्पन्न होता है।

'सहस्रशीर्षा पुरुषः' का क्या अर्थ है?+

इसका अर्थ है विराट पुरुष के सहस्र शीश, नेत्र और चरण हैं। यह दर्शाता है कि दिव्य समस्त सृष्टि को चारों ओर से व्याप्त करता है, फिर भी उससे अनंत रूप में परे विस्तृत है।

पुरुष सूक्तम कहाँ मिलता है?+

यह ऋग्वेद (मण्डल 10, सूक्त 90) में आता है और अन्य वेदों में भी पाया जाता है। यह वैदिक व विष्णु मंदिर उपासना में प्रयुक्त सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्तोत्रों में से एक है।

पुरुष सूक्तम कब पढ़ा जाता है?+

इसका पाठ अभिषेक, होम, मूर्ति प्रतिष्ठा और विष्णु पूजा में किया जाता है, और यह एकादशी, गुरुवार व विष्णु पर्वों पर विशेष शुभ है।

इसके पाठ के क्या लाभ हैं?+

यह आध्यात्मिक पुण्य, नारायण की कृपा, घर में शांति व सामंजस्य, मन व वातावरण की शुद्धि, समृद्धि, उत्तम स्वास्थ्य और अनुष्ठानों को पूर्णता लाता माना जाता है।

क्या इसे पढ़ने के लिए वैदिक स्वर जानना आवश्यक है?+

किसी गुरु से सही स्वर सीखना आदर्श है, क्योंकि वेदों में आरोह-अवरोह मायने रखता है। पर यदि न सीख सकें, तो समझ के साथ स्पष्ट व श्रद्धापूर्वक पाठ भी लाभ देता है।

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About the author

Acharya Vinaya Kapoor · M.A. Sanskrit, Mantra & Stotra Studies

Acharya Vinaya holds an M.A. in Sanskrit from Banaras Hindu University and writes the mantra and stotra commentary on Vandnaa. Her focus is on accurate pronunciation, traditional context, and helping modern readers connect with classical texts.

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