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संतोषी माता व्रत: 16 शुक्रवार उपवास - नियम, कथा, आरती और उद्यापन
Vrat & Festivals

संतोषी माता व्रत: 16 शुक्रवार उपवास - नियम, कथा, आरती और उद्यापन

9 मिनट पढ़ेंप्रकाशित फ़रवरी 12, 2026
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By Acharya Vinaya Kapoor · M.A. Sanskrit, Mantra & Stotra Studies

Reviewed by Dr. Suresh Iyer · Vastu Shastra & Jyotish, 18+ years

संतोषी माता कौन हैं? 'संतोष की देवी'

संतोषी माता संतोष की देवी हैं (संतोष = सुख-शांति, तृप्ति)। लोक परंपरा में वे भगवान गणेश की पुत्री और कार्तिकेय की भतीजी मानी जाती हैं। उनका विशिष्ट पूजन अपेक्षाकृत आधुनिक है - 1975 की फिल्म 'जय संतोषी माँ' ने इस व्रत को उत्तर और मध्य भारत के घर-घर तक पहुँचाया - पर व्रत स्वयं प्राचीन साप्ताहिक देवी-व्रत परंपरा पर आधारित है। उनका वरदान सरल पर दुर्लभ है: वे हृदय की बेचैनी हर लेती हैं। जहाँ संतोषी माता पूजी जाती हैं, सास-बहू के झगड़े, भाई-बहन का विवाद, पैसों की चिंता और 'और चाहिए' की भावना धीरे-धीरे मिट जाती है। वे उन परिवारों की देवी हैं जिनके पास सुख-सामग्री है पर शांति नहीं, और उन कन्याओं की देवी हैं जिनका विवाह छोटी-छोटी अड़चनों से रुका हुआ है।

16 शुक्रवार व्रत - सटीक नियम और दैनिक विधि

व्रत किसी भी शुभ शुक्रवार से प्रारंभ किया जा सकता है - मार्गशीर्ष, माघ या श्रावण मास के शुक्ल पक्ष का शुक्रवार सर्वोत्तम है। एक बार शुरू करने के बाद 16 लगातार शुक्रवार बिना नागा चलाना है। शुक्रवार से पूर्व पूजा-स्थान स्वच्छ करें, लाल वस्त्र पर संतोषी माता की प्रतिमा या चित्र रखें। शुक्रवार प्रातः सूर्योदय से पूर्व स्नान करें, स्वच्छ वस्त्र पहनें (काले और भूरे रंग से बचें), और संकल्प लें: 'मैं श्रद्धा से यह 16 शुक्रवार व्रत रखूँगी।'

सबसे महत्वपूर्ण और अनोखा नियम - शुक्रवार के दिन घर में कोई भी खट्टी वस्तु न आए। केवल व्रती नहीं, पूरा परिवार: न नींबू, न इमली, न दही, न अचार, न कच्चा टमाटर, न आमचूर, न कोकम। यदि घर का एक भी सदस्य खट्टा खा ले तो व्रत भंग माना जाता है। बहुत से परिवार शुक्रवार को सारी खट्टी चीज़ें रसोई से बाहर अलग रख देते हैं।

दिन भर में केवल एक बार भोजन करें - सामान्यतः खिचड़ी, घी-रोटी, या फल-दूध। पूजा शाम से पहले करें: घी का दीपक जलाएँ, गुड़ और भुने चने (गुड़-चना - संतोषी माता का विशेष प्रसाद) अर्पित करें, संतोषी माता व्रत कथा पढ़ें या सुनें, और आरती से समापन करें। गुड़-चना परिवार के सदस्यों में बाँटें और संभव हो तो एक छोटी कन्या को भी, जो देवी का प्रतीक है।

व्रत कथा - खट्टा क्यों वर्जित है

पारंपरिक कथा एक निर्धन स्त्री की है जिसका पति कमाने बाहर गया और वर्षों लौटा नहीं। सास और ननदें उसे सताती हैं। एक दिन वह कुछ स्त्रियों को देवी की पूजा करते देखती है और पूछती है - 'संतोषी माता, जो 16 शुक्रवार के व्रत से कोई भी सच्ची मनोकामना पूरी करती हैं।' वह व्रत आरंभ करती है। कुछ ही सप्ताह में पति का धन घर आता है; 16वें शुक्रवार को पति समृद्ध होकर लौटता है।

उद्यापन के लिए वह विधिवत भोज तैयार करती है - खीर-पूड़ी, गुड़-चना, पूरे घर में कोई खट्टी वस्तु नहीं। ईर्ष्यालु ननदें चुपके से अपने बच्चों को खट्टा आँवला खिला देती हैं। बच्चे के खट्टा खाते ही देवी का अपमान हो जाता है; उसी रात पति का सारा धन चला जाता है। वह माता से क्षमा माँगती है, पुनः व्रत करती है, उद्यापन सही ढंग से करती है - और सब लौट आता है। कथा दो बातें सिखाती है: (1) देवी निरंतर श्रद्धा का उत्तर देती हैं, और (2) खट्टा वर्जित है क्योंकि 'खट्टा' ईर्ष्या, शिकायत और असंतोष का प्रतीक है - संतोष का बिल्कुल विपरीत।

उद्यापन (समापन) - 16वें शुक्रवार की विधि

उद्यापन (समापन) - 16वें शुक्रवार की विधि

उद्यापन 16वें शुक्रवार को किया जाता है और इसे ठीक विधि से करना अनिवार्य है। 8 बालकों (देवी के बाल-रूप का प्रतीक) को भोजन पर बुलाएँ। भोजन में खीर (दूध-चावल की), शुद्ध घी की पूरी, चना सब्ज़ी, और गुड़-चना अवश्य हो। कहीं भी खट्टा न हो - रसोइए के हाथ, बच्चों की जेब, हर बर्तन जाँचें। बालकों को पहले परोसें, उनके चरण स्पर्श करें, और प्रत्येक को एक छोटा उपहार दें (₹11, ₹21, या फल-सिक्का)। फिर स्वयं उसी प्रसाद से व्रत खोलें।

एक महत्वपूर्ण बात: परंपरा से ये 8 बालक आपके अपने परिवार के नहीं होने चाहिए, और भोजन ऐसे परोसें मानो साक्षात अतिथि देवता हों। भोजन के बाद व्रत पूर्ण माना जाता है। यदि 16 सप्ताह में कोई शुक्रवार बीमारी, यात्रा या मासिक धर्म के कारण छूट जाए तो गिनती फिर से शुरू होती है - पर लापरवाही से छूटे तो व्रत भंग और पहले शुक्रवार से पुनः आरंभ करें। आधुनिक नरम नियम के अनुसार: यदि यात्रा से शुक्रवार संभव नहीं तो अगले शुक्रवार को व्रत करें, मन में देवी से क्षमा माँगते हुए गिनती जारी रखें।

भक्तों के सामान्य प्रश्न

जिस स्त्री का पति खट्टा खाता है, क्या वह यह व्रत रख सकती है?+

हाँ - नियम केवल शुक्रवार के दिन घर में खट्टा न आने का है। शुक्रवार को पूरे घर के लिए खट्टी-रहित भोजन बनाएँ और दही, अचार, नींबू को रसोई से बाहर रखें। आधुनिक परिवार पति के ऑफिस के लिए शुक्रवार को बिना खट्टी सामग्री वाला टिफिन बनाते हैं। नियम का भाव है - सप्ताह में एक शांत, बिना शिकायत वाला दिन देवी के लिए।

16 शुक्रवार में किसी शुक्रवार को मासिक धर्म हो तो क्या करें?+

उस शुक्रवार पूजा न करें (मूर्ति को स्पर्श न करें, आरती न करें) पर भोजन-नियम पालें - घर में खट्टा न आए, केवल सात्त्विक भोजन लें। वह शुक्रवार 16 में गिना जाएगा क्योंकि आपने अनुशासन रखा। अधिकांश पंडित मानते हैं मासिक धर्म स्त्री का दोष नहीं और देवी दंड नहीं देतीं - केवल जानबूझकर लापरवाही व्रत भंग करती है।

क्या अविवाहित कन्याएँ विवाह के लिए यह व्रत रख सकती हैं?+

हाँ - संतोषी माता का व्रत विशेष रूप से उन अविवाहित कन्याओं के लिए श्रेष्ठ है जिनका विवाह छोटी अड़चनों से रुका है। संकल्प स्पष्ट लें: 'हे माता, इन 16 सप्ताहों में योग्य और अनुकूल वर मिले।' अनेक परिवारों का अनुभव है कि सगाई 8वें से 14वें शुक्रवार के बीच होती है। ऐसे में उद्यापन विवाह से पूर्व कन्या के घर 8 बालकों के साथ करें।

संतोषी माता पूजा में कौन सा मंत्र जपें?+

सबसे सरल और प्रमुख मंत्र है 'ॐ श्री संतोषी महामायायै नमः' (108 बार)। अनुभवी साधक 'ॐ ह्रीं संतोषी महामायायै सर्वबाधा-विनाशिन्यै नमः' का जप करते हैं। कथा और आरती स्वयं प्रमुख मंत्र-तुल्य मानी जाती हैं। प्रत्येक शुक्रवार पूजा के अंत में और उद्यापन के दिन आरती अवश्य गाएँ।

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About the author

Acharya Vinaya Kapoor · M.A. Sanskrit, Mantra & Stotra Studies

Acharya Vinaya holds an M.A. in Sanskrit from Banaras Hindu University and writes the mantra and stotra commentary on Vandnaa. Her focus is on accurate pronunciation, traditional context, and helping modern readers connect with classical texts.

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