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सूर्य आरती - ॐ जय सूर्य भगवान के बोल, अर्थ, विधि और लाभ
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सूर्य आरती - ॐ जय सूर्य भगवान के बोल, अर्थ, विधि और लाभ

9 मिनट पढ़ेंप्रकाशित जून 10, 2026
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By Acharya Vinaya Kapoor · M.A. Sanskrit, Mantra & Stotra Studies

Reviewed by Anjali Mehta · Editor, M.A. Religious Studies

सूर्य देव की आरती - प्रकाश का प्रातः गीत

सूर्य देव सभी देवताओं में अद्वितीय हैं क्योंकि वे प्रत्यक्ष देवता हैं - वे भगवान जिन्हें हम हर सुबह अपनी आँखों से देख सकते हैं। वेद उन्हें जगत की आत्मा (सूर्य आत्मा जगतः), प्रकाश, स्वास्थ्य और स्वयं काल का दाता कहते हैं। गायत्री मंत्र से लेकर आदित्य हृदय स्तोत्र तक, जो भगवान राम को युद्ध से पहले प्राप्त हुआ था, सूर्य उपासना सनातन धर्म के हृदय में बसी है।

"ॐ जय सूर्य भगवान" के रूप में गाई जाने वाली सूर्य आरती इस प्राचीन श्रद्धा को एक सरल प्रातः गीत में समेट लेती है। इसे परंपरागत रूप से उगते सूर्य को अर्घ्य (जल) अर्पित करने के बाद गाया जाता है, जब पहली किरणें धरती को छूती हैं। अधिकांश आरतियों के विपरीत जो संध्या दीप से जुड़ी हैं, सूर्य आरती भोर की है - यह कृतज्ञता के साथ दिन का स्वागत करती है, बल और स्पष्टता माँगती है, और भक्त को याद दिलाती है कि हर सूर्योदय जीवन का एक नया उपहार है।

संपूर्ण सूर्य आरती - ॐ जय सूर्य भगवान

ॐ जय सूर्य भगवान, जय हो दिनकर भगवान। जगत के नेत्र स्वरूपा, तुम हो त्रिगुण स्वरूपा। धरत सब ही तव ध्यान, ॐ जय सूर्य भगवान॥

सारथी अरुण हैं प्रभु तुम, श्वेत कमलधारी। तुम चार भुजाधारी। अश्व हैं सात तुम्हारे, कोटि किरण पसारे। तुम हो देव महान, ॐ जय सूर्य भगवान॥

ऊषाकाल में जब तुम, उदयाचल आते। सब तब दर्शन पाते। फैलाते उजियारा, जागता तब जग सारा। करे सब तब गुणगान, ॐ जय सूर्य भगवान॥

संध्या में भुवनेश्वर, अस्ताचल जाते। गोधन तब घर आते। गोधूलि बेला में, हर घर हर आंगन में। हो तव महिमा गान, ॐ जय सूर्य भगवान॥

देव-दनुज नर-नारी, ऋषि-मुनिवर भजते। आदित्य हृदय जपते। स्तोत्र ये मंगलकारी, इसकी है रचना न्यारी। दे नव जीवनदान, ॐ जय सूर्य भगवान॥

तुम हो त्रिकाल रचयिता, तुम जग के आधार। महिमा तव अपरम्पार। प्राणों का सिंचन करके, भक्तों को अपने देते। बल, बुद्धि और ज्ञान, ॐ जय सूर्य भगवान॥

भूचर जलचर खेचर, सबके हो प्राण तुम्हीं। सब जीवों के प्राण तुम्हीं। वेद-पुराण बखाने, धर्म सभी तुम्हें माने। तुम ही सर्वशक्तिमान, ॐ जय सूर्य भगवान॥

पूजन करतीं दिशाएं, पूजे दश दिक्पाल। तुम भुवनों के प्रतिपाल। ऋतुएं तुम्हारी दासी, तुम शाश्वत अविनाशी। शुभकारी अंशुमान, ॐ जय सूर्य भगवान॥

सूर्य आरती का अर्थ - पद-दर-पद

पद 1 (जगत के नेत्र स्वरूपा): दिन के रचयिता (दिनकर) सूर्य भगवान की जय हो। वे ब्रह्मांड के नेत्र हैं - उनके प्रकाश से ही सब प्राणी देखते हैं - और वे त्रिगुण स्वरूप हैं। सारी सृष्टि उनका ध्यान करती है।

पद 2 (सारथी अरुण हैं): उनके सारथी अरुण हैं, उषा के देवता। वे अपनी चार भुजाओं में श्वेत कमल धारण करते हैं, और उनके रथ को सात अश्व खींचते हैं, जो सप्ताह के सात दिनों और प्रकाश के सात रंगों के प्रतीक माने जाते हैं।

पद 3 (ऊषाकाल में): भोर में वे उदयाचल पर उदित होते हैं और सारा जगत जागकर उनके दर्शन पाता है और गुणगान करता है।

पद 4 (संध्या में): संध्या में वे अस्ताचल जाते हैं; गोधूलि की पावन बेला में गौएं घर लौटती हैं और हर आंगन में उनकी महिमा गाई जाती है।

पद 5 (आदित्य हृदय जपते): देवता, ऋषि और मनुष्य सभी आदित्य हृदय स्तोत्र से उनकी उपासना करते हैं, जो नया जीवन और साहस देता है।

पद 6-8: वे काल के रचयिता हैं, बल, बुद्धि और ज्ञान के दाता हैं, थल, जल और आकाश के हर प्राणी के प्राण हैं। दिशाएं, दिक्पाल और ऋतुएं सब उनकी सेवा करती हैं - वे शाश्वत, अविनाशी, कल्याणकारी सूर्य हैं।

जय कश्यप नन्दन - छोटी सूर्य आरती

जय कश्यप नन्दन - छोटी सूर्य आरती

कई परिवार और मंदिर एक पुरानी, छोटी आरती भी गाते हैं जो "जय कश्यप नन्दन, ॐ जय अदिति नन्दन" से आरंभ होती है - ऋषि कश्यप और माता अदिति के पुत्र की जय। इसके प्रारंभिक पद हैं:

जय कश्यप-नन्दन, ॐ जय अदिति नन्दन। त्रिभुवन-तिमिर-निकन्दन, भक्त-हृदय-चन्दन॥

सप्त-अश्वरथ राजित, एक चक्रधारी। दुःखहारी, सुखकारी, मानस-मल-हारी॥

सूर्यदेव करुणाकर, अब करुणा कीजै। हर अज्ञान-मोह सब, तत्त्वज्ञान दीजै॥

यह आरती सूर्य को तीनों लोकों के अंधकार का नाशक और भक्त के हृदय पर चंदन जैसी शीतलता कहती है, और एक सुंदर प्रार्थना से समाप्त होती है: हमारा अज्ञान और मोह हर लो, और तत्त्वज्ञान दो। दोनों में से कोई भी आरती गाई जा सकती है - संस्करण से अधिक कृतज्ञता का भाव महत्वपूर्ण है।

प्रातः अर्घ्य और आरती विधि - चरण-दर-चरण

1. सूर्योदय से पहले या सूर्योदय पर उठें, स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र पहनें। तांबे के लोटे में जल भरें; उसमें थोड़ी रोली, लाल फूल और संभव हो तो कुछ दाने चावल या तिल डालें।

2. पूर्व दिशा की ओर, उगते सूर्य की ओर मुख करें। खड़े होकर लोटे को छाती या मस्तक की ऊंचाई तक उठाएं और जल को धीरे-धीरे पतली धारा में अर्पित करें। जल चढ़ाते समय "ॐ सूर्याय नमः" या गायत्री मंत्र का जप करें। यही अर्घ्य है।

3. थाली में रोली, चावल और फूलों के साथ घी का दीपक जलाएं। पूर्व की ओर मुख करके आरती करें, थाली को धीमी गति से दक्षिणावर्त (घड़ी की दिशा में) घुमाएं - परंपरा से चरणों में चार, नाभि पर दो, मुख पर एक और संपूर्ण स्वरूप पर सात बार, या श्रद्धा से सात पूर्ण परिक्रमाएं।

4. सूर्य आरती गाएं, फिर हाथ जोड़कर प्रणाम करें और संभव हो तो कुछ सूर्य नमस्कार करें - यह शारीरिक उपासना है।

कब गाएं - रविवार, रथ सप्तमी और छठ

सूर्य आरती हर सुबह अर्घ्य के बाद गाई जा सकती है, परंतु कुछ दिनों का विशेष महत्व है। रविवार सूर्य देव का अपना दिन है - रविवार व्रत रखने वाले भक्त अर्घ्य देते हैं, आरती गाते हैं, एक समय सात्विक भोजन करते हैं और अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार नमक या तेल से परहेज करते हैं।

माघ शुक्ल सप्तमी को रथ सप्तमी मनाई जाती है - इसे सूर्य जयंती कहा जाता है, जिस दिन सूर्य का रथ पूर्ण वैभव से उत्तरायण की ओर बढ़ता माना जाता है। इस सुबह का अर्घ्य और आरती विशेष फलदायी मानी जाती है।

छठ पूजा में, जो मुख्यतः बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश में मनाई जाती है, भक्त जल में खड़े होकर डूबते और उगते सूर्य दोनों को अर्घ्य देते हैं - यह भारत में सूर्य भक्ति की सबसे भावपूर्ण अभिव्यक्ति है। आरती स्वाभाविक रूप से इन अर्घ्यों के साथ जुड़ती है। वैसे किसी भी दिन सूर्योदय पर इसे गाने के लिए किसी अवसर की आवश्यकता नहीं।

सूर्य आरती और नित्य सूर्य उपासना के लाभ

सूर्य आरती और नित्य सूर्य उपासना के लाभ

परंपरा के अनुसार नियमित सूर्य उपासना आरोग्य (स्वास्थ्य), तेज और आत्मबल प्रदान करती है। शास्त्र कहते हैं "आरोग्यं भास्कराद् इच्छेत्" - स्वास्थ्य सूर्य से माँगो। भक्तों की मान्यता है कि सच्ची सूर्य भक्ति नेत्र-ज्योति, जीवन-शक्ति, आत्मविश्वास और नेतृत्व को बढ़ाती है तथा विद्या और करियर में सफलता देती है - इसीलिए विद्यार्थी परीक्षा से पहले अर्घ्य देने की परंपरा निभाते हैं।

व्यावहारिक लाभ भी उतने ही वास्तविक हैं। सूर्य से पहले उठना, प्रातः के प्रकाश में खड़े होना, पूर्ण ध्यान से जल अर्पित करना और स्वर से गाना - यह क्रम चुपचाप अनुशासन गढ़ता है, शरीर की घड़ी को नियमित करता है और दिन की शुरुआत फोन की स्क्रीन के बजाय कृतज्ञता से कराता है। प्रतिदिन दोहराए गए आरती के पद सकारात्मकता का आधार बन जाते हैं।

सबसे बढ़कर, सूर्य आरती गायत्री मंत्र के भाव को ही पोषित करती है: वह दिव्य प्रकाश मेरी बुद्धि को प्रकाशित करे। सूर्य प्रतिदिन बिना भेदभाव सबको देते हैं - और जो भक्त हर भोर उनका अभिवादन करता है, वह धीरे-धीरे वैसे ही जीना सीख जाता है।

लोग सबसे ज़्यादा क्या पूछते हैं

सूर्य आरती का सबसे उत्तम समय क्या है?+

सबसे उत्तम समय सूर्योदय पर या उसके तुरंत बाद है, उगते सूर्य को अर्घ्य देने के ठीक बाद। सूर्योदय के पहले घंटे का प्रकाश सबसे सात्विक माना जाता है। यदि सूर्योदय छूट जाए तो दोपहर से पहले पूर्ण श्रद्धा से आरती गाई जा सकती है।

क्या बिना अर्घ्य दिए सूर्य आरती गा सकते हैं?+

हाँ। अर्घ्य और आरती मिलकर संपूर्ण प्रातः उपासना बनती है, परंतु भक्ति कभी शर्तों से बंधी नहीं होती। यदि आप जल अर्पित नहीं कर सकते - यात्रा में हों, खुली पूर्व दिशा न मिले या स्वास्थ्य कारण हो - तो प्रातः सूर्य या सूर्य चित्र की ओर मुख करके कृतज्ञ हृदय से गाएं।

सूर्य आरती में किस दिशा की ओर मुख करना चाहिए?+

प्रातः अर्घ्य और आरती के लिए पूर्व दिशा, उगते सूर्य की ओर मुख करें। दीपक को धीमी गति से दक्षिणावर्त घुमाया जाता है। संध्या उपासना की परंपरा वाले पश्चिम में डूबते सूर्य की ओर मुख करते हैं, जैसा छठ पूजा के अर्घ्य में होता है।

रविवार सूर्य देव के लिए विशेष क्यों है?+

रविवार का नाम रवि अर्थात सूर्य पर है और यह दिन परंपरा से उनकी उपासना को समर्पित है। भक्त रविवार व्रत रखते हैं, अर्घ्य देते हैं, आरती गाते हैं और एक समय सात्विक भोजन करते हैं। नियमित सूर्य उपासना आरंभ करने के लिए यह सबसे शुभ दिन माना जाता है।

ॐ जय सूर्य भगवान और जय कश्यप नन्दन में क्या अंतर है?+

दोनों सूर्य देव की आरतियाँ हैं। ॐ जय सूर्य भगवान लंबा और अधिक प्रचलित रूप है, जो सूर्य की दैनिक यात्रा और वरदानों का वर्णन करता है। जय कश्यप नन्दन पुरानी, छोटी आरती है जो सूर्य को कश्यप और अदिति का पुत्र कहकर तत्त्वज्ञान की प्रार्थना से समाप्त होती है। कोई भी गाई जा सकती है।

प्रतिदिन सूर्य को अर्घ्य देने के क्या लाभ हैं?+

परंपरा प्रतिदिन के अर्घ्य को आरोग्य, तेज, नेत्र-ज्योति, आत्मविश्वास तथा विद्या और कार्य में सफलता से जोड़ती है। व्यावहारिक रूप से यह जल्दी उठने का अनुशासन बनाता है, प्रातः प्रकाश में कुछ शांत क्षण देता है और दिन की शुरुआत कृतज्ञता से कराता है - नियमित अभ्यास के कुछ ही सप्ताहों में ये लाभ अनुभव होते हैं।

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About the author

Acharya Vinaya Kapoor · M.A. Sanskrit, Mantra & Stotra Studies

Acharya Vinaya holds an M.A. in Sanskrit from Banaras Hindu University and writes the mantra and stotra commentary on Vandnaa. Her focus is on accurate pronunciation, traditional context, and helping modern readers connect with classical texts.

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