तारा तारिणी कौन हैं
ओडिशा के गंजाम जिले में पुरुषोत्तमपुर के निकट रुशिकुल्या नदी के तट पर स्थित जुड़वां कुमारी पहाड़ियों पर, पूर्वी भारत के सबसे प्रिय देवी मंदिरों में से एक विराजमान है। यहां दो पाषाण प्रतिमाएं हैं, जिन्हें साथ में तारा और तारिणी के रूप में पूजा जाता है, एक ही देवी के जुड़वां स्वरूप।
भक्त इस स्थान को पूर्वी तट के सबसे प्राचीन शक्ति पीठों में गिनते हैं, और ओडिशा, आंध्र प्रदेश तथा पड़ोसी राज्यों से तीर्थयात्री यहां जुड़वां देवियों का आशीर्वाद पाने आते हैं। नदी को निहारती यह पहाड़ी अपने आप में एक पवित्रता का अनुभव कराती है, जो चढ़ाई आरंभ करते ही भक्त को छू जाती है।
जुड़वां शिखरों की कथा
परंपरा के अनुसार, तारा तारिणी को शक्ति पीठों में गिना जाता है, वे पवित्र स्थल जो भगवान शिव द्वारा सती माता के शरीर को लेकर किए गए शोकाकुल भ्रमण से जुड़े हैं। स्थानीय मान्यता है कि देवी का स्तन भाग यहीं गिरा था, जिससे यह जुड़वां पहाड़ी पवित्र भूमि बनी।
सदियों से यह स्थान शाक्त उपासना का केंद्र बना, जिसमें जुड़वां शिखरों को स्वयं माता के जीवंत स्वरूप के रूप में देखा जाता है। कई भक्त इस मंदिर को क्षेत्र की प्राचीन तांत्रिक परंपराओं से भी जोड़ते हैं, हालांकि आज यहां सामान्य तीर्थयात्री और परिवार सरल, सच्ची भक्ति भाव से ही दर्शन करने आते हैं।
महत्व और भक्तों की प्रार्थनाएं
भक्त तारा तारिणी के दर्शन साहस, सुरक्षा और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना से करते हैं। रुशिकुल्या घाटी के मछुआरे और किसान लंबे समय से जुड़वां देवियों को अपने घर और जीविका की रक्षक माता के रूप में मानते आए हैं।
परंपरा के अनुसार, यहां देवी सच्ची प्रार्थना अवश्य सुनती हैं, और कई भक्त किसी यात्रा या महत्वपूर्ण कार्य से पहले सरल मन्नत मांगते हैं और बाद में धन्यवाद अर्पित करने लौटते हैं। दो देवियों की संयुक्त उपस्थिति भक्तों को शक्ति और करुणा दोनों का दोहरा आशीर्वाद प्रतीत होती है।
दर्शन गाइड: समय और उत्सव

मंदिर में सामान्यतः प्रातः और सायं आरती का क्रम रहता है, तथा दिनभर दर्शन खुले रहते हैं। भक्तों को सलाह दी जाती है कि प्रमुख उत्सवों के दौरान समय में बदलाव के लिए स्थानीय जानकारी अवश्य लें।
रोपवे सेवा वृद्ध भक्तों और बच्चों को पहाड़ी शिखर तक आराम से पहुंचाती है, हालांकि कई तीर्थयात्री आज भी पारंपरिक चढ़ाई को स्वयं में एक भक्ति कार्य मानते हुए पैदल जाना पसंद करते हैं।
- ओड़िया चैत्र माह में आयोजित चैत्र मेला मंदिर का सबसे भव्य उत्सव है, जिसमें भारी संख्या में भक्त जुटते हैं
- देवी पूजा हेतु शुभ माने जाने वाले मंगलवार और शुक्रवार को भी भक्तों की निरंतर आवाजाही रहती है
- यहां नवरात्रि भी ओडिशा के अधिकांश शक्ति मंदिरों की भांति विशेष श्रद्धा से मनाई जाती है
तारा तारिणी कैसे पहुंचें
तारा तारिणी मंदिर ओडिशा के गंजाम जिले में पुरुषोत्तमपुर के निकट, बरहमपुर (ब्रह्मपुर) शहर के पास स्थित है। बरहमपुर रेलवे स्टेशन प्रमुख शहरों से भली-भांति जुड़ा है और तीर्थयात्रियों के लिए सबसे सुविधाजनक आधार है।
निकटतम हवाई अड्डा भुवनेश्वर में है, जहां से टैक्सी और बसें बरहमपुर तथा मंदिर तक आगे जाती हैं। बरहमपुर से पहाड़ी की तलहटी तक स्थानीय परिवहन और साझा वाहन सहज उपलब्ध हैं।
जप हेतु मंत्र और भक्त के लिए संदेश
तारा तारिणी में भक्त प्रायः 'ॐ तारायै नमः, ॐ तारिण्यै नमः' का जप करते हैं, जिसका अर्थ है 'उस माता को नमन जो अपने भक्तों को हर कठिनाई से पार ले जाती हैं'।
देवी का यह जुड़वां स्वरूप भक्तों को स्मरण कराता है कि सच्चे हृदय से चढ़ने वालों के लिए माता की करुणा दोगुनी होकर बरसती है। चाहे कोई पहाड़ी शिखर तक स्वयं पहुंचे या दूर से ही माता का स्मरण करे, तारा तारिणी में पूजा श्रद्धा और प्रेम का कार्य है, न कि कोई लेन-देन।
भक्तों के सामान्य प्रश्न
क्या तारा तारिणी को शक्ति पीठ माना जाता है?+
हां, परंपरा के अनुसार भक्त तारा तारिणी को शक्ति पीठों में से एक मानते हैं, जो देवी सती की कथा से जुड़े स्थल हैं। यह विशेष रूप से भारत के पूर्वी तट पर श्रद्धेय है।
इस मंदिर में दो देवियां क्यों हैं?+
मंदिर जुड़वां पहाड़ियों पर स्थित है, और परंपरा के अनुसार देवी यहां दो स्वरूपों में एक साथ प्रकट होती हैं, तारा और तारिणी, जिन्हें दो नामों वाली एक ही देवी के रूप में पूजा जाता है।
तारा तारिणी मंदिर जाने का सबसे अच्छा समय क्या है?+
मंदिर वर्षभर दर्शन के लिए खुला रहता है, परंतु चैत्र मेला सबसे शुभ और जीवंत समय माना जाता है, जब क्षेत्रभर से भक्त बड़ी संख्या में एकत्रित होते हैं।
About the author
Pandit Ravindra Sharma · Vedic Rituals & Bhakti, 22+ years
Pandit Ravindra is the Vandnaa editorial team's resident specialist on aarti, chalisa, and daily devotion. He has performed home and temple pujas across Varanasi and Delhi for over two decades and contributes the bhakti-focused articles on this site.
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