विश्वकर्मा कौन हैं और उनकी चालीसा क्या है
विश्वकर्मा को हिंदू परंपरा में देवताओं का दिव्य शिल्पकार और अभियंता माना जाता है, वह दिव्य कारीगर जिनके कौशल ने सृष्टि की संरचनाओं को आकार दिया। ऋग्वेद में विश्वकर्मा को सृष्टि के रचयिता के रूप में वर्णित किया गया है, और परंपरा उन्हें द्वारका, इंद्र के स्वर्गलोक तथा देवताओं के अस्त्र-शस्त्र व विमानों के निर्माण का श्रेय देती है।
हर शिल्पकार, अभियंता, मिस्त्री और कारीगर विश्वकर्मा को अपना मार्गदर्शक देवता मानता है। विश्वकर्मा पूजा, जो पूर्वी और उत्तर-पूर्वी भारत में सितंबर मध्य (कन्या संक्रांति) के आसपास व्यापक रूप से मनाई जाती है, वह दिन है जब औज़ार, मशीनें और कार्यशालाएं साफ, सजाई और विधिवत पूजी जाती हैं।
विश्वकर्मा चालीसा उन्हीं को समर्पित एक भक्ति स्तुति है, जो कार्य में सटीकता, सुरक्षा और दैवीय आशीर्वाद आमंत्रित करने हेतु गाई जाती है। यह स्मरण कराती है कि सच्ची कारीगरी विनम्रता से आरंभ होती है, अहंकार से नहीं।
विश्वकर्मा चालीसा - प्रमुख छंद हिंदी में
क्षेत्रीय और शिल्प देवताओं जैसे विश्वकर्मा की चालीसा प्रायः अलग-अलग समुदायों में एक से अधिक रूपों में प्रचलित है। यहां पारंपरिक दोहा-चौपाई शैली में आरंभिक व प्रमुख छंद प्रस्तुत हैं:
दोहा: जय जय जय विश्वकर्मा प्रभु, सृष्टि के शिल्पकार। जगत रचयिता बुद्धि दो, करूं तुम्हें नमस्कार॥
चौपाई: जय विश्वकर्मा जगत रचैया। सब देवन के तुम शिल्पैया॥ ब्रह्मा विष्णु शिव के कारज। तुमहीं रचौ यंत्र अरु अस्त्र॥ दिव्य विमान वज्र तुम बनायो। इंद्रपुरी को स्वर्ग सजायो॥ द्वारका नगरी रची तुम्हारी। कृष्ण बसे तेहि पुरी प्यारी॥ शिल्प कला के तुम आधारा। कारीगर सब करत पुकारा॥ जहां यंत्र और औज़ार की पूजा। तहां तुम्हारी कृपा न दूजा॥
दोहा: विश्वकर्मा चालीसा पढ़े, मन क्रम वचन लगाय। शिल्प कर्म में सिद्धि मिले, सुख समृद्धि पाय॥
अर्थ एवं भक्ति महत्व
आरंभिक दोहे में विश्वकर्मा को 'सृष्टि के शिल्पकार' कहा गया है, और उनसे उतनी ही बुद्धि मांगी गई है जितना उनका कौशल। यही चालीसा का सार है: यह केवल भौतिक सफलता नहीं मांगती, बल्कि जिम्मेदारी से रचने-गढ़ने का विवेक मांगती है।
द्वारका, इंद्रपुरी और दिव्य विमानों का वर्णन इंजीनियरिंग इतिहास नहीं बल्कि भक्ति-भाव की छवि है - यह इस विश्वास को व्यक्त करता है कि सृजन का कोई भी कार्य, चाहे कितना भी छोटा हो, दैवीय बुद्धि से अलग नहीं है। जब कोई मिस्त्री इंजन ठीक करता है या अभियंता पुल डिज़ाइन करता है, परंपरा मानती है कि वही सृजनात्मक शक्ति विनम्रता से समर्पित कुशल हाथों में प्रवाहित होती है।
अंतिम दोहा सच्चे मन से पाठ करने वाले को शिल्प-कर्म में सिद्धि का वचन देता है - यह स्मरण कि अनुशासन और भक्ति ही परंपरा में अच्छे कार्य का सच्चा मार्ग माने गए हैं, शॉर्टकट नहीं।
विश्वकर्मा चालीसा पाठ के लाभ

परंपरा के अनुसार, सच्चे मन से विश्वकर्मा चालीसा पढ़ने वाले भक्त मानते हैं कि इससे मिलता है:
- तकनीकी या रचनात्मक कार्य में अधिक सटीकता व कम त्रुटियां
- औज़ार, मशीन व कार्यस्थल की दुर्घटनाओं से रक्षा
- नए व्यवसाय, कार्यशाला या फैक्ट्री के शुभारंभ पर आशीर्वाद
- इंजीनियरिंग, वास्तुकला व डिज़ाइन के विद्यार्थियों को स्पष्टता व सहयोग
- कारीगरों व शिल्पियों को स्थिर पहचान व आय
- किसी भी व्यावहारिक कौशल को सीखने में धैर्य व अनुशासन
ये सभी आस्था और भक्ति के विषय माने जाते हैं, गारंटी नहीं - चालीसा कार्य को कृतज्ञता व विनम्रता में स्थिर करने का माध्यम है, कौशल या परिश्रम का विकल्प नहीं।
पाठ करने की विधि व उचित समय
सबसे महत्वपूर्ण दिन विश्वकर्मा पूजा है, जो सितंबर मध्य (कन्या संक्रांति) के आसपास मनाई जाती है, जब औज़ार व मशीनों को साफ कर विश्वकर्मा की तस्वीर या मूर्ति के समक्ष सजाया जाता है और फूल, अक्षत व जलते दीये के साथ पूजा कर चालीसा का पाठ किया जाता है।
इस दिन के अतिरिक्त, कई कारीगर किसी भी नए कार्य, परियोजना या व्यवसाय की शुरुआत से पहले इसका पाठ करते हैं। एक सरल अभ्यास: कार्यस्थल साफ करें, अपने औज़ार पास रखें, दीया जलाएं, एक फूल अर्पित करें, और कार्य आरंभ करने से पहले ध्यानपूर्वक चालीसा का पाठ करें।
सभी भक्ति अभ्यासों की तरह, पूजा आस्था और प्रेम का कार्य है, कोई सौदा नहीं - चालीसा आशीर्वाद व सजगता आमंत्रित करने के लिए अर्पित की जाती है, वास्तविक कार्य के लिए अपना ईमानदार परिश्रम फिर भी आवश्यक है।
भक्तों के सामान्य प्रश्न
विश्वकर्मा पूजा कब मनाई जाती है?+
विश्वकर्मा पूजा सबसे व्यापक रूप से सितंबर मध्य में, कन्या संक्रांति के दिन मनाई जाती है, विशेषकर पूर्वी व उत्तर-पूर्वी भारत में, जब कारीगर, अभियंता व फैक्ट्री कर्मी अपने औज़ार व मशीनों को साफ कर पूजते हैं।
क्या विश्वकर्मा चालीसा केवल कारीगर ही नहीं, कोई भी पढ़ सकता है?+
हां। जिसका भी कार्य निर्माण, डिज़ाइन, मरम्मत या किसी भी प्रकार के सृजन से जुड़ा है, चाहे वह विद्यार्थी हो या व्यवसायी, वह अपने प्रयासों में स्पष्टता व परिश्रम आमंत्रित करने हेतु श्रद्धा से इसका पाठ कर सकता है।
परंपरा के अनुसार विश्वकर्मा ने क्या-क्या रचा माना जाता है?+
परंपरा व कथाओं के अनुसार विश्वकर्मा ने द्वारका नगरी, इंद्र के स्वर्गलोक तथा देवताओं के दिव्य अस्त्र-शस्त्र व विमान रचे माने जाते हैं। इन्हें भक्ति-परंपरा के रूप में माना जाता है, सत्यापित इतिहास के रूप में नहीं।
About the author
Acharya Vinaya Kapoor · M.A. Sanskrit, Mantra & Stotra Studies
Acharya Vinaya holds an M.A. in Sanskrit from Banaras Hindu University and writes the mantra and stotra commentary on Vandnaa. Her focus is on accurate pronunciation, traditional context, and helping modern readers connect with classical texts.
Meet the Vandnaa editorial team →


