यह परंपरा: भोजन और प्रार्थना में जमीन से जुड़ाव
अनेक हिंदू घरों में आज भी भोजन मेज-कुर्सी के बजाय जमीन पर आलती-पालथी मारकर, चटाई या लकड़ी की पीढ़ी पर बैठकर किया जाता है। पूजा में भी यही परंपरा दिखती है, जहाँ पूजा करने वाला व्यक्ति सोफे या कुर्सी के बजाय जमीन पर बिछे छोटे आसन पर बैठता है।
यह परंपरा पुरानी सोच नहीं बल्कि एक सोची-समझी आदत है। जो घर रोज़मर्रा में डाइनिंग टेबल का उपयोग करते हैं, वे भी त्योहारों, शादियों और खास पारिवारिक भोजन के समय जमीन पर बैठना पसंद करते हैं, और लगभग हर पूजा घर में, चाहे वह कितना भी छोटा हो, एक आसन ज़रूर रखा जाता है।
इसके पीछे की पारंपरिक सोच
हिंदू परंपरा में भोजन को सदा से पवित्र माना गया है। तैत्तिरीय उपनिषद में अन्न को स्वयं ब्रह्म का रूप बताया गया है। भोजन के समय जमीन के करीब, नीचे बैठना इस पवित्र उपहार को विनम्रता से ग्रहण करने का तरीका माना जाता है, न कि उसे सामान्य ढंग से लेना।
पूजा में भी नंगी जमीन के बजाय कपड़े या कुश के आसन पर बैठने का अपना पारंपरिक कारण है। माना जाता है कि आसन मंत्र जाप के समय साधक के ध्यान और ऊर्जा को स्थिर रखता है, ठीक वैसे ही जैसे लंबे समय तक स्थिर बैठने में कोई सहारा शरीर को टिकाए रखता है।
यह मुद्रा क्या दर्शाती है
साझा भोजन के समय जमीन पर बैठना सबको, चाहे उम्र या हैसियत कुछ भी हो, एक ही स्तर पर ला देता है, जिसे समानता और आपसी जुड़ाव का प्रतीक माना जाता है। यह शरीर को धरती माँ, भूमि देवी से भी जोड़ता है, जिन्हें हिंदू परंपरा में स्वयं पूजनीय माना गया है।
भोजन और पूजा दोनों में उपयोग होने वाली आलती-पालथी की स्थिर मुद्रा को पाचन के लिए अच्छा और प्रार्थना व ध्यान के लिए ज़रूरी शांत, सजग स्थिरता देने वाला भी माना जाता है।
आज यह परंपरा कैसे जीवित है

भारतीय घरों में डाइनिंग टेबल का प्रचलन बढ़ने के बावजूद, त्योहारों, शादियों की दावतों और सामूहिक भोजन में आज भी जमीन पर बैठना ही आम है। मंदिरों की रसोई में और सत्यनारायण पूजा या भंडारे जैसे अवसरों पर अक्सर पंक्ति में, यानी जमीन पर एक साथ कतार में बैठाकर भोजन कराया जाता है।
आधुनिक फ्लैटों के छोटे पूजा घरों में भी लगभग हमेशा एक छोटा आसन या चटाई रखी जाती है, जो दिखाता है कि यह परंपरा आकार में बदलते हुए भी बनी हुई है।
एक सरल, जड़ों से जोड़ने वाला भाव
चाहे त्योहार के भोजन के लिए बिछा दस्तरख्वान हो या घर का छोटा सा पूजा आसन, यह सरल मुद्रा एक बड़ा भाव लिए होती है, अन्न और ईश्वर के सामने विनम्र और जमीन से जुड़े रहना। यह एक छोटी सी रोज़ की आदत है जो चुपचाप एक साधारण पल को कृतज्ञता के भाव में बदल देती है।
भक्तों के सामान्य प्रश्न
पूजा के समय हिंदू कुर्सी का प्रयोग क्यों नहीं करते?+
जमीन पर आसन या चटाई पर बैठना परंपरागत रूप से मंत्र जाप के समय साधक को स्थिर और जमीन से जुड़ा रखने वाला माना जाता है, और यह देवता के सामने विनम्रता दर्शाता है। परंपरा के अनुसार यह सम्मान और एकाग्रता का विषय है, सबके लिए सख्त नियम नहीं।
क्या हर भोजन के लिए जमीन पर बैठना ज़रूरी है?+
नहीं, यह एक परंपरा है, कोई सख्त नियम नहीं। आज कई परिवार रोज़मर्रा में सुविधा के लिए मेज का उपयोग करते हैं, लेकिन त्योहारों, शादियों और खास अवसरों पर जमीन पर बैठना पसंद करते हैं।
पूजा का आसन किस चीज़ का बना होता है?+
पूजा का आसन आमतौर पर सूती कपड़े, ऊन या कुश घास का बना होता है, और अलग-अलग प्रकार की पूजा या जप के लिए परंपरागत रूप से अलग-अलग सामग्री को उपयुक्त माना जाता है।
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Pandit Mahesh Trivedi · Festival Traditions & Panchang
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