घर की पूजा को सरल और नियमित बनाएँ - प्रातः-संध्या नित्य विधि, वार अनुसार देव पूजा, मासिक तिथियाँ और पूरी सामग्री सूची, एक ही स्थान पर।
पूजा में भाव सर्वोपरि है। यह चेकलिस्ट सामान्य गृहस्थ परंपरा पर आधारित है - अपने कुल, क्षेत्र और गुरु की परंपरा को प्राथमिकता दें। तिथि और मुहूर्त अपने शहर के पंचांग से मिलाएँ।
ब्रह्म मुहूर्त से सूर्योदय तक श्रेष्ठ - लगभग प्रातः 4:00 से 7:00 बजे। छोटी रखें, पर नियमित।
सूर्यास्त के बाद के 48 मिनट में। प्रातः विधि से सरल - दीपक सबसे महत्वपूर्ण है।
प्रत्येक वार एक देव को समर्पित है। नित्य पूजा के साथ उस दिन का यह एक कार्य जोड़ दें।
शिवलिंग पर जल, दूध और बेल पत्र से जलाभिषेक; 'ॐ नमः शिवाय' 108 बार; शिव पर तुलसी और हल्दी न चढ़ाएँ।
चमेली तेल में सिंदूर, बूँदी का लड्डू और लाल पुष्प अर्पित करें; हनुमान चालीसा पढ़ें; कई लोग नमक रहित व्रत रखते हैं।
21 दूर्वा, मोदक या हरा मूँग अर्पित करें; 'ॐ गं गणपतये नमः' जपें; नया कार्य आरंभ करने का शुभ दिन।
पीले पुष्प, चने की दाल और गुड़ अर्पित करें; केले के पौधे में जल दें; 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' जपें; बाल धोना वर्जित।
संध्या में घी का दीपक, खीर या सफेद मिठाई और कमल/लाल पुष्प; श्री सूक्तम या 'ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं' का जप।
शनि को सरसों तेल और काला तिल, संध्या में पीपल के नीचे दीपक, कौवे या कुत्तों को भोजन; शनि मंत्र 108 बार।
उदय होते सूर्य को अर्घ्य (रोली और लाल पुष्प युक्त जल), गायत्री या आदित्य हृदय का पाठ; सांध्य भोजन में नमक न लें।
ये शुक्ल और कृष्ण दोनों पक्षों में आती हैं। तिथियाँ हर मास बदलती हैं - पंचांग देखें।
मास में एक बार करें - पूर्णिमा, अमावस्या से पूर्व या हिंदू मास के प्रथम दिन।
दीपक जलाएँ, जल और पुष्प अर्पित करें, इष्ट मंत्र 11 बार जपें और संक्षिप्त आरती करें। शास्त्र लंबाई से अधिक नियम को महत्व देते हैं - कभी-कभार की लंबी पूजा से प्रतिदिन की छोटी पूजा श्रेष्ठ है।
बैठते समय मुख पूर्व या उत्तर दिशा में रखें; देव उत्तर-पूर्व (ईशान) कोण में पश्चिम या पूर्व मुखी हों। जप के समय दक्षिण मुख वर्जित है, केवल पितृ कार्य में मान्य।
पारंपरिक रूप से मूर्ति स्पर्श और मंदिर प्रवेश से विश्राम लिया जाता है, पर मानसिक जप, नाम स्मरण और पाठ पर कोई रोक नहीं - भक्ति कभी अशुद्ध नहीं होती। परिवार की परंपरा का पालन करें।
इसे पाप न मानें। जब स्मरण हो, दीपक जलाकर क्षमा प्रार्थना करें और अगले दिन से पुनः आरंभ करें। व्रत छूटने पर उसी तिथि के अगले अवसर पर पूर्ण कर सकते हैं।
हाँ। सूर्योदय, चंद्रोदय और तिथि समाप्ति स्थान के अनुसार बदलते हैं, इसलिए एकादशी, प्रदोष और पारण का समय दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और विदेशी शहरों में भिन्न होता है। अपने शहर का पंचांग देखें।