पहाड़ी और मान्यता
अंजनाद्रि कर्नाटक के कोप्पल ज़िले में, हम्पी के सामने तुंगभद्रा के उत्तरी तट पर बसे आनेगुंदी की पहाड़ी है। शिखर पर छोटा श्वेत मंदिर है, जहां लगभग पांच सौ सत्तर पत्थर की सीढ़ियां चढ़कर पहुंचा जाता है।
पहाड़ी का नाम हनुमान की माता अंजना से है, और यहां के भक्त मानते हैं कि हनुमान का जन्म यहीं हुआ। कर्नाटक की परंपरा स्पष्ट है - अंजना ने इसी क्षेत्र में तप किया, वरदान पाया, और इसी पहाड़ी पर पुत्र को जन्म दिया, उसी भूमि के मध्य जिसे रामायण किष्किंधा कहती है।
आसपास का भूगोल ही भक्तों के लिए इस मान्यता को बल देता है:
- रामायण की किष्किंधा, वानर राज्य, आनेगुंदी और हम्पी से पहचानी जाती है
- पास ही ऋष्यमूक पर्वत है, जहां सुग्रीव ने वालि से बचकर आश्रय लिया था
- निकट ही पंपा सरोवर है, जो शबरी और पार्वती के तप से जुड़ा है
- पूरे परिदृश्य से तुंगभद्रा बहती है, जिसे प्राचीन ग्रंथों में पंपा कहा गया है
चढ़ाई करने वाले भक्तों के लिए यह परिवेश ही अधिकांश काम कर देता है। आप किसी कथा से जुड़ा मंदिर नहीं देख रहे होते। आप उसी भूदृश्य के बीच खड़े होते हैं जिसका वर्णन रामायण करती है, चारों ओर पहाड़ियां, नदी और शिलाखंडों के मैदान।
अंजना की कथा
हनुमान जन्म की कथा कई पुराणों में भिन्न रूपों में मिलती है, और अंजनाद्रि पर जो रूप दोहराया जाता है वह इस प्रकार है।
अंजना अप्सरा थीं, जो शाप के कारण पृथ्वी पर जन्मीं। उनका विवाह केसरी से हुआ और दंपती संतानहीन रहे। अंजना ने दीर्घ और कठोर तप किया, शिव से पुत्र की प्रार्थना करते हुए।
उसी समय अयोध्या के राजा दशरथ पुत्रकामेष्टि यज्ञ कर रहे थे, और उससे प्राप्त पवित्र पायस उनकी रानियों में बंटा। कथा के अनुसार उसका एक अंश पक्षी उठा ले गया और वहीं गिरा जहां अंजना तप कर रही थीं। वायु ने उसे उन तक पहुंचाया और उन्होंने उसे प्रसाद रूप में स्वीकार किया।
हनुमान का जन्म उसी से हुआ, इसीलिए परंपरा में उनके तीन संबंध हैं:
- अंजना के पुत्र, इसलिए आंजनेय
- केसरी के पुत्र, इसलिए केसरी नंदन
- वायु के पुत्र, इसलिए पवनपुत्र और मारुतिनंदन
- शैव परंपरा में उन्हें शिव का अंश माना जाता है, जो उनके जन्म को अंजना की शिव आराधना से जोड़ता है
दशरथ के यज्ञ से जुड़ाव भक्तों के लिए महत्वपूर्ण है। इसका अर्थ है कि हनुमान का जन्म और राम का जन्म एक ही कर्म से आए, और परंपरा इसी से समझाती है कि उनका जीवन आरंभ से ही राम से क्यों बंधा है।
चढ़ाई और शिखर पर क्या है
अंजनाद्रि की यात्रा का मुख्य अनुभव यही चढ़ाई है।
- आधार से पहाड़ी तक लगभग पांच सौ सत्तर सीढ़ियां हैं, जो चट्टान पर काटकर बनाई गई हैं
- अधिकतर लोगों को चढ़ने में तीस से पैंतालीस मिनट लगते हैं, गर्मी में अधिक
- मार्ग में छाया कम है और दोपहर में चट्टान से गर्मी उठती है
- रास्ते में बंदर बड़ी संख्या में रहते हैं और खुले में रखा भोजन छीन लिया जाता है
- शिखर पर छोटा श्वेत मंदिर है, जहां शिला पर उकेरे हनुमान पूजित हैं, और साथ ही राम का स्थान भी बताया जाता है
मंदिर जितना ही लोगों को दृश्य भी खींचता है। शिखर से तुंगभद्रा, आनेगुंदी के खेत, हम्पी का शिलाखंड परिदृश्य और नदी पार के अवशेष एक साथ दिखते हैं, और यहां से सूर्योदय क्षेत्र के सर्वाधिक प्रसिद्ध दृश्यों में है।
व्यावहारिक बातें:
- सूर्योदय के समय या सूर्यास्त से पहले के घंटों में जाएं। ग्रीष्म में दोपहर की चढ़ाई वास्तव में कठिन है।
- जल साथ रखें, पर भोजन बंद रखें क्योंकि बंदर हैं
- मंदिर के पास जूते उतारने पड़ते हैं और दोपहर में चट्टान गर्म रहती है
- सीढ़ियां कहीं-कहीं असमान हैं, इसलिए घुटनों की समस्या हो तो पहले आकलन कर लें
भक्त शिखर पर प्रायः हनुमान चालीसा का पाठ करते हैं, और हनुमान जयंती तथा शनिवार को शिखर पर साथ गाते समूहों की भीड़ रहती है।
अन्य दावे, ईमानदारी से

हम्पी के पास का अंजनाद्रि अकेला स्थान नहीं है जो स्वयं को हनुमान की जन्मभूमि बताता है, और इसे स्पष्ट कह देना बेहतर है ताकि भक्त को बाद में आश्चर्य न हो।
प्रमुख दावे हैं:
- आनेगुंदी, कर्नाटक का अंजनाद्रि - यहां वर्णित किष्किंधा पहचान
- महाराष्ट्र में नासिक के पास अंजनेरी - अंजना से जुड़ी पहाड़ी, जहां प्राचीन मंदिर परिसर है
- तिरुमला, आंध्र प्रदेश का अंजनाद्रि - तिरुमला पहाड़ियों के संदर्भ में प्रस्तुत दावा
- गोकर्ण, कर्नाटक तथा अन्य तटीय दावे
- झारखंड में गुमला के पास अंजन धाम - जहां स्थानीय परंपरा अंजना की गुफा मानती है
हर स्थान के अपने ग्रंथ संदर्भ, स्थानीय परंपराएं और भक्त हैं, और इनके बीच बहस कभी-कभी तीखी भी रही है।
यात्रा की योजना बना रहे भक्त के लिए कहने योग्य बातें:
- रामायण स्वयं किसी आधुनिक मानचित्र बिंदु को निश्चित नहीं करती, और भिन्न पुराण भिन्न पाठ की गुंजाइश देते हैं
- हर स्थल की स्थानीय परंपराएं वास्तव में प्राचीन हैं, आधुनिक रचना नहीं
- हनुमान भक्ति कभी इस प्रश्न के निपटारे पर निर्भर नहीं रही, और जो हनुमान चालीसा अधिकतर भक्त प्रतिदिन पढ़ते हैं उसमें जन्मस्थान का उल्लेख ही नहीं है
अधिकतर भक्त जो व्यावहारिक दृष्टि रखते हैं वह सीधी है - जिस स्थान तक पहुंच सकें वहां जाएं, वहीं सच्चे मन से उपासना करें, और भूगोल का प्रश्न उन पर छोड़ दें जो उस पर बहस करना चाहते हैं।
अंजनाद्रि के आसपास किष्किंधा परिपथ
अंजनाद्रि को अकेले नहीं, आनेगुंदी और हम्पी के चारों ओर फैले रामायण परिदृश्य के अंग के रूप में देखना सबसे उपयुक्त है।
- पंपा सरोवर - वह झील जो शबरी से जुड़ी है, जिन्होंने यहीं राम की प्रतीक्षा की, और पार्वती के तप से भी। अंजनाद्रि से थोड़ी दूरी पर।
- ऋष्यमूक पर्वत - जहां सुग्रीव ने वालि से बचकर आश्रय लिया और जहां राम-लक्ष्मण की हनुमान से भेंट हुई
- आनेगुंदी - पुरानी बस्ती, जिसे हम्पी से भी प्राचीन माना जाता है, जहां रंगनाथ मंदिर है और पास ही नदी के द्वीप पर नव बृंदावन
- नदी पार हम्पी - विजयनगर की राजधानी, जहां विरूपाक्ष मंदिर में आज भी नित्य पूजा होती है और विट्ठल परिसर में पाषाण रथ है
- यंत्रोद्धारक हनुमान मंदिर, हम्पी - संत व्यासराज से जुड़ा, जहां प्रसिद्ध हनुमान यंत्र प्रतिमा है
- आनेगुंदी की ओर चिंतामणि और सुग्रीव की गुफा
हम्पी और आनेगुंदी के बीच की पार यात्रा भी अनुभव का अंग है, जो ऋतु तथा वर्तमान व्यवस्था के अनुसार ऊपर की ओर बने पुल से या स्थानीय नाव से होती है।
जिस भक्त की रुचि स्थापत्य नहीं, रामायण में है उसके लिए आनेगुंदी की ओर अधिक अर्थपूर्ण है। हम्पी वह है जो विजयनगर ने बनाया। आनेगुंदी वह है जहां किष्किंधा के प्रसंग रखे जाते हैं, और वहां का भूदृश्य कहीं कम बदला है।
अंजनाद्रि पर और घर पर उपासना
पहाड़ी की उपासना सरल है, क्योंकि सब कुछ ऊपर ले जाना पड़ता है।
- नारियल, पुष्प, सिंदूर और दीप सामान्य अर्पण हैं
- जहां व्यवस्था हो वहां भक्त वड़ा माला और मिठाई अर्पित करते हैं
- शिखर पर हनुमान चालीसा का पाठ होता है, प्रायः पूरे समूह एक साथ
- शनिवार और मंगलवार व्यस्त दिन हैं, और हनुमान जयंती सबसे बड़ा अवसर
- अनेक भक्त यह चढ़ाई मन्नत के रूप में करते हैं, विशेषकर कठिन समय में बल, संतान के आरोग्य और परीक्षा से पहले
हनुमान उपासना की जो व्यापक विधि भक्त घर पर निभाते हैं वह यहां भी लागू है:
- प्रतिदिन हनुमान चालीसा, या मंगल तथा शनिवार को निश्चित संख्या में पाठ
- कठिनाई में किया जाने वाला सुंदरकांड पाठ, प्रायः साप्ताहिक या पाक्षिक अभ्यास के रूप में
- बजरंग बाण और हनुमान अष्टक, जिन्हें अधिक गहन अभ्यास वाले भक्त पढ़ते हैं
- मंगलवार को स्थानीय हनुमान मंदिर में तेल और सिंदूर का अर्पण
अंजनाद्रि के बारे में भक्त विशेष रूप से यह कहते हैं कि चढ़ाई पाठ को बदल देती है। घर पर चालीसा पढ़ना एक बात है। किष्किंधा के बीच, पांच सौ सत्तर सीढ़ियों के बाद, नीचे बहती तुंगभद्रा के सामने पहाड़ी के शिखर पर पढ़ना वह है जिसका वर्णन लोग लौटकर करते हैं।
त्वरित उत्तर
अंजनाद्रि पहाड़ी कहां है?+
कर्नाटक के कोप्पल ज़िले में, हम्पी के सामने तुंगभद्रा के उत्तरी तट पर बसे आनेगुंदी में। शिखर पर छोटा श्वेत मंदिर है, जहां लगभग पांच सौ सत्तर सीढ़ियां चढ़कर पहुंचा जाता है।
अंजनाद्रि को हनुमान की जन्मभूमि क्यों माना जाता है?+
पहाड़ी का नाम हनुमान की माता अंजना से है, और कर्नाटक की परंपरा मानती है कि उन्होंने यहीं तप किया और इसी पहाड़ी पर पुत्र को जन्म दिया, उसी क्षेत्र में जिसे रामायण किष्किंधा कहती है, जहां पास ही ऋष्यमूक और पंपा सरोवर हैं।
क्या हनुमान की अन्य जन्मस्थलियां भी बताई जाती हैं?+
हां। नासिक के पास अंजनेरी, तिरुमला का अंजनाद्रि, गोकर्ण और झारखंड में गुमला के पास अंजन धाम, सबकी अपनी परंपराएं हैं। रामायण किसी आधुनिक मानचित्र बिंदु को निश्चित नहीं करती, और भक्त प्रायः उसी स्थान पर उपासना करते हैं जहां वे पहुंच सकें।
अंजनाद्रि की चढ़ाई कितनी कठिन है?+
लगभग पांच सौ सत्तर सीढ़ियां, जिनमें अधिकतर लोगों को तीस से पैंतालीस मिनट लगते हैं। छाया कम है और चट्टान बहुत गर्म हो जाती है, इसलिए सूर्योदय या दोपहर बाद का समय उपयुक्त है। मार्ग के बंदर खुले में रखा कोई भी भोजन छीन लेते हैं।
किष्किंधा से क्या संबंध है?+
आनेगुंदी और हम्पी क्षेत्र को रामायण के वानर राज्य किष्किंधा से पहचाना जाता है। ऋष्यमूक पर्वत, जहां सुग्रीव ने वालि से बचकर आश्रय लिया, और शबरी से जुड़ा पंपा सरोवर, दोनों पास ही हैं।
अंजनाद्रि के साथ और क्या देखा जा सकता है?+
पंपा सरोवर, ऋष्यमूक पर्वत, रंगनाथ मंदिर सहित आनेगुंदी की पुरानी बस्ती, और नदी पार हम्पी के विरूपाक्ष तथा विट्ठल मंदिर एवं यंत्रोद्धारक हनुमान मंदिर।
About the author
Pandit Mahesh Trivedi · Festival Traditions & Panchang
Pandit Mahesh leads the festival-date and Panchang content on Vandnaa. He cross-references multiple regional panchangs (Drik, Vaishnava, Bengali, Marathi) for every festival date published on the site.
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