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भूमिया देव और दादा खेड़ा: हरियाणा के हर गांव का पहला पूज्य देवता
Hindu Traditions

भूमिया देव और दादा खेड़ा: हरियाणा के हर गांव का पहला पूज्य देवता

8 मिनट पढ़ेंप्रकाशित अगस्त 18, 2026
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By Anjali Mehta · Editor, M.A. Religious Studies

Reviewed by Dr. Suresh Iyer · Vastu Shastra & Jyotish, 18+ years

भूमिया देव कौन हैं

भूमिया देव, जिन्हें हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और राजस्थान के कुछ भागों में खेड़ा दादा, दादा नगर खेड़ा या केवल भूमिया कहा जाता है, गांव की भूमि और उसे सबसे पहले बसाने वाले पूर्वज के देवता हैं।

भूमि अर्थात धरती और खेड़ा अर्थात वह ऊंचा टीला जिस पर मूल बस्ती बसी थी। क्षेत्र के हर पुराने गांव में ऐसा टीला है और उस पर एक छोटा चबूतरा, जहां संस्थापक को व्यक्ति के रूप में नहीं, देवता के रूप में पूजा जाता है।

उनकी भूमिका बहुत स्पष्ट है:

  • वे भक्ति भाव में भूमि के स्वामी हैं, इसलिए हर नए आरंभ से पहले गांव उनकी अनुमति लेता है
  • वे वंश के रक्षक हैं, जन्म, विवाह और गृह निर्माण पर पूजे जाते हैं
  • वे गांव के साक्षी हैं, विवाद निपटाने या वचन देने के समय स्मरण किए जाते हैं

भूमिया देव पौराणिक देवमंडल का अंग नहीं हैं और उनसे कोई युद्ध कथा नहीं जुड़ी। वे उपासना की उस पुरानी परत से हैं जहां पूर्वज, भूमि और देवता एक ही निरंतर उपस्थिति माने जाते हैं।

खेड़ा: स्थान कैसा दिखता है

खेड़ा प्रायः गांव की सबसे सादी और सबसे पुरानी संरचना होती है।

सामान्य खेड़े में चूने से पुता चबूतरा होता है, कभी छोटी छतरी सहित, जो बस्ती के टीले पर या उसके पास बना होता है। भीतर प्रायः एक पत्थर, दीपक रखने का ताखा और पीढ़ियों से लगे सिंदूर तथा घी के निशान भर होते हैं। चारों ओर मन्नत पूरी होने पर छोड़े गए मिट्टी के दीये, लोहे के त्रिशूल और छोटी घंटियां रहती हैं।

स्थान से जुड़ी कई परंपराएं हैं:

  • टीले पर खुदाई या निर्माण नहीं किया जाता, चाहे गांव कितना भी फैल जाए
  • अमावस्या और पर्व के दिन दीप जलाया जाता है, प्रायः वही परिवार जिसने यह सेवा ली हो
  • नवविवाहित और नवजात सबसे पहले यहीं लाए जाते हैं, रिश्तेदारी में जाने से पहले
  • खेड़े से कुछ वापस नहीं लाया जाता, पुष्प भी नहीं

अनेक खेड़ों के पास दादा भैया, सती माता या भैया जी का छोटा स्थान भी होता है, जो किसी गोत्र या परिवार विशेष के पूर्वज हैं। जिन गांवों में कई संस्थापक परिवार रहे, वहां कई खेड़े मिलते हैं, हर एक की देखरेख उसी वंश के पास।

अवसर: परिवार खेड़े पर कब जाता है

हरियाणा के घरों में खेड़ा जाना वैकल्पिक नहीं है, और क्रम तय है।

  • विवाह - काम आरंभ होने से पहले भूमिया देव को न्योता दिया जाता है, और वधू गांव में पहली बार आने पर खेड़े पर लाई जाती है। कई परिवारों में बारात निकलने से पहले वर प्रणाम करता है।
  • संतान जन्म - परंपरागत दिनों के बाद माता और नवजात दर्शन करते हैं, चूरमा या हलवा बंटता है
  • गृह प्रवेश - नए घर में पहली रात से पहले खेड़े पर दीप
  • नया ट्रैक्टर, वाहन या दुकान - पहली चाल या पहला दिन खेड़े पर प्रणाम से आरंभ
  • अमावस्या और दीपावली - दीप और प्रसाद, जो भी गांव में हो
  • सकुशल वापसी पर - नौकरी, लंबी बीमारी या मुकदमे के बाद

मूल भाव समझने योग्य है - खेड़ा वह स्थान है जहां परिवार का गांव से रिश्ता फिर से जुड़ता है। दो पीढ़ियों से गुरुग्राम, दिल्ली या विदेश में रह रहे परिवार भी इन अवसरों पर लौटते हैं, और बुज़ुर्ग नगर का नाम बाद में, खेड़े का नाम पहले लेते हैं।

भूमिया देव को क्या अर्पित होता है

भूमिया देव को क्या अर्पित होता है

अर्पण खेत-रसोई का भोजन है, घर पर बना और तुरंत बांटा जाने वाला।

  • चूरमा - मोटी रोटी को गुड़ और घी के साथ मसलकर, क्षेत्र का सबसे विशिष्ट अर्पण
  • हलवा और पूरी, विशेषकर विवाह और संतान जन्म पर
  • बतासा, गुड़ और बूरा
  • दूध, घी और जल, चबूतरे पर अर्पित
  • जहां पूर्वज माता का स्थान साथ हो वहां लाल धागा, चूड़ियां या छोटी चुनरी
  • संध्या को जलाए जाने वाले देसी घी या सरसों तेल के दीप

चूंकि भूमिया देव पूर्वज देवता हैं, प्रसाद रखा नहीं जाता, गांव में बांटा जाता है और पहले बच्चों को दिया जाता है। परिवार प्रायः सवा किलो या सवासेर का अर्पण करते हैं, जिसे मन्नत के लिए शुभ माना जाता है।

आज हरियाणा के अधिकतर गांवों में इस उपासना में पशु अर्पण नहीं होता। परंपरा अन्न, गुड़, घी और दूध पर स्थिर हो चुकी है, और अनेक परिवार आग्रह रखते हैं कि प्रसाद बाज़ार से नहीं, घर पर बने।

हरियाणा की व्यापक भक्ति में भूमिया देव

हरियाणा की भक्ति की तीन स्पष्ट परतें हैं और भूमिया देव उसकी नींव पर हैं।

  • भूमि की परत - खेड़े पर भूमिया देव, सती माता और दादा भैया के स्थान, तथा गांव का पीपल या जाल का पेड़
  • क्षेत्रीय देवी परत - गुरुग्राम की शीतला माता, जिनके चैत्र मेले में लाखों आते हैं, पंचकूला की मनसा देवी, कुरुक्षेत्र की भद्रकाली, और विवाह के बाद पूजी जाने वाली कुलदेवी
  • व्यापक हिंदू परत - गीता भूमि कुरुक्षेत्र, ब्रह्म सरोवर, ज्योतिसर और गीता जयंती महोत्सव, तथा स्थानेश्वर महादेव जैसे शिवालय

गांव का परिवार तीनों को बिना किसी विरोधाभास के निभाता है। खेड़ा भूमि संभालता है, देवी रक्षा और आरोग्य, और कुरुक्षेत्र धर्म का व्यापक अर्थ। कोई कहे कि दर्शन जा रहे हैं, तो अगला प्रश्न बस यही होता है कि तीनों में से कौन सा।

गांव से दूर रहकर परंपरा कैसे निभाएं

परिवार नगरों में बसते जा रहे हैं, इसलिए प्रश्न व्यावहारिक है - जब खेड़े तक पहुंचना संभव न हो तो क्या करें।

अधिकतर परिवार इनमें से कोई एक मार्ग अपनाते हैं:

  • वार्षिक यात्रा तय करें। दीपावली, होली या परिवार के विवाह के मौसम में खेड़ा दर्शन और वर्ष भर की मन्नतें एक साथ पूरी की जाती हैं।
  • उसी दिन घर पर अर्पण करें। घर में बना चूरमा या हलवा, गांव की दिशा में जलाया दीप और खेड़े का नाम लेकर स्मरण व्यापक रूप से स्वीकार्य है।
  • अर्पण भिजवाएं। परिवार प्रायः गांव के संबंधियों से सवा किलो का अर्पण करा देते हैं, जिसे परंपरा मान्य मानती है।
  • नाम जीवित रखें। बच्चों को गोत्र और कुलदेवी के साथ खेड़े का नाम भी बताया जाए। एक पीढ़ी में सबसे पहले यही छूटता है।

क्षेत्र के बुज़ुर्ग एक बात पर स्पष्ट हैं - खेड़े को बड़ा मंदिर बनाना या निजी भूमि में घेर लेना नहीं चाहिए। उसका अर्थ उसके खुले, सादे और सामूहिक स्वरूप में है। एक चबूतरा, एक जलता दीप और एक परिवार जो उसका नाम जानता है, यही पूरी परंपरा है।

भक्तों के सामान्य प्रश्न

भूमिया देव कौन हैं?+

भूमिया देव, जिन्हें खेड़ा दादा या दादा नगर खेड़ा भी कहा जाता है, गांव की भूमि और उसे बसाने वाले पूर्वज के देवता हैं। उनकी पूजा खेड़े यानी पुरानी बस्ती के टीले पर बने चबूतरे पर होती है, जो हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और राजस्थान के भागों में मिलती है।

नवविवाहित और नवजात खेड़े पर क्यों जाते हैं?+

खेड़ा देवता को गांव का स्वामी और साक्षी माना जाता है, इसलिए परिवार के नए सदस्य को पहले वहीं लाया जाता है। वधू गांव में प्रवेश पर और नवजात परंपरागत दिनों के बाद खेड़े पर दर्शन करते हैं।

भूमिया देव के स्थान पर क्या चढ़ाया जाता है?+

गेहूं, गुड़ और घी का चूरमा मुख्य अर्पण है, साथ में हलवा, पूरी, बतासा, दूध और घी का दीप। प्रसाद घर नहीं लाया जाता, गांव में बांटा जाता है और पहले बच्चों को दिया जाता है।

क्या भूमिया देव और कुलदेवता एक ही हैं?+

दोनों जुड़े हैं पर एक नहीं। भूमिया देव गांव की भूमि के देवता हैं और वहां रहने वाले सब उनकी पूजा करते हैं, जबकि कुलदेवता या कुलदेवी किसी वंश विशेष के होते हैं और परिवार के साथ हर जगह जाते हैं।

क्या नगरों में रहने वाले परिवार खेड़ा परंपरा निभा सकते हैं?+

हां। अधिकतर परिवार दीपावली, होली या विवाह के समय वार्षिक यात्रा तय करते हैं, यात्रा संभव न हो तो उसी दिन घर पर चूरमा अर्पित करते हैं, या गांव के संबंधियों से अर्पण करा देते हैं।

क्या भूमिया देव को पशु बलि दी जाती है?+

आज हरियाणा के अधिकतर गांवों में नहीं। अर्पण अन्न, गुड़, घी, दूध और घर में बने चूरमा या हलवे पर स्थिर है, और अनेक परिवार आग्रह करते हैं कि प्रसाद घर पर ही बने।

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About the author

Anjali Mehta · Editor, M.A. Religious Studies

Anjali is the managing editor for Vandnaa and oversees the festival and vrat coverage. She holds an M.A. in Religious Studies and reviews every published article for accuracy, accessibility, and tradition-fidelity.

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