← सभी ब्लॉगRead in English8 मिनट पढ़ें
डमरू: शिव का डमरू, सृष्टि की ध्वनि और इसका महत्व
Mythology

डमरू: शिव का डमरू, सृष्टि की ध्वनि और इसका महत्व

8 मिनट पढ़ेंप्रकाशित जून 23, 2026
AM

By Anjali Mehta · Editor, M.A. Religious Studies

Reviewed by Pandit Ravindra Sharma · Vedic Rituals & Bhakti, 22+ years

डमरू क्या है?

डमरू वह छोटा, डमरू-आकार (बीच से पतला) का वाद्य है जिसे भगवान शिव अपने एक हाथ में धारण करते हैं, प्रायः ब्रह्मांडीय नृत्य (तांडव) के समय अपने ऊपरी दाहिने हाथ में। डमरू को घुमाने पर मनकों सहित दो गाँठदार डोरियाँ दोनों मुखों पर प्रहार करती हैं, जिससे इसकी विशिष्ट लयबद्ध ध्वनि निकलती है।

इसका आकार - एक ही बिंदु पर मिलते दो त्रिकोण - स्वयं अर्थ से भरा है। नाद ब्रह्म की परंपरा में, ब्रह्मांड ध्वनि से उत्पन्न होता है, और डमरू वह वाद्य है जिससे वह आदि ध्वनि जन्म लेती है। यह आकार में छोटा पर प्रतीक में विशाल है, सृष्टि की धड़कन का ही प्रतिनिधित्व करता है।

माहेश्वर सूत्र: ध्वनि से भाषा

परंपरा मानती है कि शिव के तांडव के अंत में उन्होंने अपना डमरू चौदह बार बजाया। इन चौदह ध्वनियों से माहेश्वर सूत्र (शिव सूत्र भी कहलाते हैं) प्रकट हुए - चौदह सूत्र जो संस्कृत भाषा की ध्वनियों को व्यवस्थित करते हैं।

कहा जाता है कि महान वैयाकरण पाणिनि ने ये चौदह सूत्र प्राप्त किए और उन्हीं पर अपनी अष्टाध्यायी रची, जो संस्कृत व्याकरण की नींव है। इस प्रकार शिव के डमरू की ध्वनि को इनका स्रोत माना जाता है:

  • वाणी की व्यवस्थित ध्वनियाँ
  • संस्कृत व्याकरण की संरचना
  • समस्त भाषा, विद्या और उससे प्रवाहित विज्ञान

इसीलिए शिव केवल संहारक नहीं, ज्ञान और कलाओं के उद्गम के रूप में भी पूजे जाते हैं। नृत्य और डमरू साथ मिलकर सिखाते हैं कि सृष्टि स्वयं एक दिव्य लय पर चलती है।

गहरा आध्यात्मिक अर्थ

डमरू का आकार और ध्वनि स्तर-दर-स्तर अर्थ रखते हैं:

  • सृष्टि और प्रलय: दोनों त्रिकोण एक बिंदु से फैलते हैं और फिर मिलते हैं। जब डमरू बजता है, ब्रह्मांड फैलता है; जब ध्वनि शांत होती है, वह लीन हो जाता है - सृष्टि और प्रलय की शाश्वत लय।
  • शिव और शक्ति का मिलन: डमरू के दो भाग पुरुष और प्रकृति तत्वों का मिलन माने जाते हैं, जिनके संयोग से संसार जन्म लेता है।
  • नाद ब्रह्म: डमरू की ध्वनि आदि स्पंदन ॐ (प्रणव) से जुड़ी है, जिससे समस्त अस्तित्व उपजा कहा जाता है।
  • काल और लय: इसकी ताल ब्रह्मांडीय काल की स्थिर धड़कन को अंकित करती है, याद दिलाती है कि सब कुछ एक माप में चलता और बदलता है।

डमरू सुनना, परंपरा में, यह स्मरण है कि सभी रूपों के पीछे एक ही दिव्य ध्वनि है जो ब्रह्मांड को संभाले हुए है।

पूजा में महत्व

पूजा में महत्व
  • महादेव का प्रतीक: त्रिशूल के साथ डमरू शिव के सबसे पहचाने जाने वाले चिह्नों में से एक है। किसी चित्र में इसे देखते ही नृत्य और ध्वनि के स्वामी का स्मरण हो जाता है।
  • आरती और भजन में: शिव पूजा के समय छोटे डमरू और घंटियाँ बजाई जाती हैं; इनकी लय वातावरण को शुद्ध करने और मन को एकाग्र करने वाली मानी जाती है।
  • शिव तांडव स्तोत्र के समय: भक्त प्रायः स्तोत्र में वर्णित डमरू की धिमिद्-धिमिद् ताल का स्मरण करते हैं, शिव के नृत्य की लय अनुभव करते हुए।
  • ध्यान में: डमरू को नाद ब्रह्म के रूप में चिंतन करते हुए कुछ साधक आंतरिक नाद और प्रणव ॐ पर ध्यान करते हैं।

घर के मंदिर में रखा छोटा डमरू यह स्मरण कराता है कि ईश्वर ध्वनि और लय में उपस्थित है, और वही ताल जो ब्रह्मांड को रचती है, हमारे भीतर भी धड़कती है।

त्वरित उत्तर

भगवान शिव डमरू क्यों धारण करते हैं?+

डमरू उस आदि ध्वनि का प्रतीक है जिससे ब्रह्मांड की रचना होती है। ब्रह्मांडीय नृत्य के स्वामी रूप में शिव सृष्टि की लय अंकित करने हेतु डमरू धारण करते हैं, और इसकी ध्वनि भाषा तथा नाद ब्रह्म का स्रोत मानी जाती है।

माहेश्वर सूत्र क्या हैं?+

माहेश्वर सूत्र, जिन्हें शिव सूत्र भी कहते हैं, चौदह सूत्र हैं जो शिव के तांडव के अंत में डमरू की चौदह ताल से प्रकट हुए माने जाते हैं। वे संस्कृत की ध्वनियों को व्यवस्थित करते हैं और पाणिनि के व्याकरण की नींव बनते हैं।

डमरू के बीच-से-पतले आकार का क्या अर्थ है?+

एक बिंदु पर मिलते दो त्रिकोण शिव और शक्ति के मिलन तथा सृष्टि व प्रलय के चक्र का प्रतिनिधित्व करते हैं। जैसे ब्रह्मांड फैलता और सिमटता है, वैसे ही डमरू के दो भाग फैलते और मिलते हैं।

क्या डमरू ॐ से जुड़ा है?+

हाँ, नाद ब्रह्म की परंपरा में डमरू की ध्वनि आदि स्पंदन ॐ (प्रणव) से जुड़ी है, जिससे समस्त अस्तित्व उपजा कहा जाता है। इसलिए डमरू पर ध्यान उस मूल-ध्वनि का चिंतन करने का एक मार्ग है।

AM

About the author

Anjali Mehta · Editor, M.A. Religious Studies

Anjali is the managing editor for Vandnaa and oversees the festival and vrat coverage. She holds an M.A. in Religious Studies and reviews every published article for accuracy, accessibility, and tradition-fidelity.

Meet the Vandnaa editorial team →

Listen all aartis, mantras & bhajans in one place.

Download Vandnaa App.

Download Now

Explore on Vandnaa

संबंधित लेख