जया पार्वती व्रत क्या है?
जया पार्वती व्रत, जिसे गौरी व्रत भी कहते हैं, देवी पार्वती (गौरी) को समर्पित पाँच दिन का व्रत है। यह गुजरात और पश्चिमी भारत के कुछ भागों में सर्वाधिक प्रचलित है।
अविवाहित कन्याएँ इसे अच्छे वर की कामना से रखती हैं, जबकि विवाहित स्त्रियाँ वैवाहिक सुख और पति की दीर्घायु के लिए। यह व्रत प्रेमपूर्वक उगाए गेहूँ या जवार के अंकुरित गमलों, जिन्हें जवारा कहते हैं, के लिए जाना जाता है, जिनकी पाँच दिन पूजा होती है और अंत में विसर्जन किया जाता है।
जया पार्वती व्रत 2026 - तिथियाँ
🟢 आरंभ: आषाढ़ शुक्ल त्रयोदशी - जुलाई 2026 की शुरुआत से मध्य तक 🔴 समाप्ति: आषाढ़ कृष्ण तृतीया - पाँच दिन बाद (रात्रि जागरण के बाद अगली सुबह)
व्रत पाँच दिन चलता है और अंतिम रात जागरण के साथ समाप्त होता है, अगले दिन जवारा का विसर्जन किया जाता है। तिथियाँ क्षेत्र अनुसार बदलती हैं, इसलिए आषाढ़ शुक्ल त्रयोदशी का आरंभ अपने पंचांग में देखें।
जया पार्वती व्रत विधि
1. जवारा बोना: कुछ दिन पहले एक छोटे मिट्टी के गमले में गेहूँ या जवार के बीज बोएँ। हरे अंकुर (जवारा) को देवी का स्वरूप माना जाता है। 2. पहला दिन संकल्प: स्नान करें, जवारा और पार्वती-शिव का चित्र स्थापित करें, और व्रत का संकल्प लें। 3. दैनिक पूजा: पाँच दिन गौरी की कुमकुम, पुष्प, रुई की माला (नागला) से पूजा करें, और जवारा को जल अर्पित करें। विवाहित स्त्रियाँ पूजा में सिंदूर लगाती हैं। 4. आहार: सात्विक व्रत रखा जाता है - बहुत लोग नमक, कुछ सब्जियाँ और अन्न त्यागकर दिन में एक बार सादा भोजन लेते हैं। 5. अंतिम रात्रि जागरण: अंतिम रात देवी के सम्मान में भजन और गरबा गाते हुए जागरण करें। 6. विसर्जन: अगली सुबह जवारा को नदी या तालाब में विसर्जित करें और व्रत तोड़ें।
जया पार्वती व्रत कथा (संक्षिप्त)

एक प्राचीन कथा एक भक्त पर निर्धन और संतानहीन दंपति की है, जो वन में देवी पार्वती के एक स्थान की पूजा करते थे। उनकी अटल भक्ति से प्रसन्न होकर देवी ने उन्हें समृद्धि दी, पर एक परीक्षा आई जब पति वन में मृत्यु-तुल्य अवस्था में पड़ गए।
पत्नी ने श्रद्धा नहीं खोई। उसने अखंड भक्ति से देवी जया पार्वती की प्रार्थना की, व्रत रखा, और देवी की कृपा से उसका पति पुनः जीवित और स्वस्थ हुआ।
यह कथा स्त्रियों में इस व्रत को सुखी वैवाहिक जीवन, पति के कल्याण और परिवार पर देवी की रक्षा पाने के साधन रूप में फैला गई। इसका सार है दृढ़ श्रद्धा जो कष्ट में भी नहीं डगमगाती।
महत्व और लाभ
- वैवाहिक सुख: विवाहित स्त्रियाँ इसे सामंजस्य और पति की दीर्घायु के लिए रखती हैं; कन्याएँ अच्छे जीवनसाथी की प्रार्थना करती हैं।
- गौरी का आशीर्वाद: पार्वती भक्ति और धैर्य की प्रतिमूर्ति हैं, और परिवार की शांति के लिए उनकी कृपा माँगी जाती है।
- प्रकृति से जुड़ाव: हरे जवारा की देखभाल व्रत को उर्वरता, वृद्धि और नवजीवन से जोड़ती है।
- अनुशासन और एकता: पाँच दिन का सात्विक जीवन और अंतिम जागरण श्रद्धा बढ़ाते हैं और परिवार की स्त्रियों को साथ लाते हैं।
सभी व्रतों की भाँति इसका सच्चा बल श्रद्धा है - स्वच्छ वातावरण, शांत मन और दृढ़ भक्ति कठोर नियमों से अधिक महत्वपूर्ण हैं।
त्वरित उत्तर
2026 में जया पार्वती व्रत कब है?+
जया पार्वती व्रत 2026 आषाढ़ शुक्ल त्रयोदशी (जुलाई की शुरुआत से मध्य) से आरंभ होकर पाँच दिन चलता है, जो रात्रि जागरण और जवारा विसर्जन के बाद समाप्त होता है। आरंभ तिथि अपने स्थानीय पंचांग में देखें।
जया पार्वती व्रत में जवारा क्या है?+
जवारा व्रत से कुछ दिन पहले एक छोटे मिट्टी के गमले में अंकुरित गेहूँ या जवार है। हरे अंकुरों की पाँच दिन देवी के स्वरूप रूप में पूजा होती है और अंत में जल में विसर्जन किया जाता है।
जया पार्वती व्रत कौन रखता है?+
इसे मुख्यतः गुजरात और पश्चिमी भारत की स्त्रियाँ रखती हैं - अविवाहित कन्याएँ अच्छे वर के लिए, और विवाहित स्त्रियाँ वैवाहिक सुख व पति की दीर्घायु के लिए। कुछ कन्याएँ इसे लगातार पाँच वर्ष रखती हैं।
क्या जया पार्वती व्रत और गौरी व्रत एक ही हैं?+
हाँ, जया पार्वती व्रत को गौरी व्रत भी कहते हैं। दोनों नाम देवी पार्वती (गौरी) को समर्पित उसी पाँच दिन के आषाढ़ व्रत को कहते हैं, जो मुख्यतः गुजरात में मनाया जाता है।
About the author
Anjali Mehta · Editor, M.A. Religious Studies
Anjali is the managing editor for Vandnaa and oversees the festival and vrat coverage. She holds an M.A. in Religious Studies and reviews every published article for accuracy, accessibility, and tradition-fidelity.
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