मंगला गौरी व्रत क्या है
मंगला गौरी व्रत माँ गौरी को समर्पित एक पवित्र व्रत है, जो देवी पार्वती का सौम्य और शुभ रूप हैं। इसे मुख्यतः विवाहित स्त्रियाँ रखती हैं, और अच्छे वर की कामना करती अविवाहित कन्याएँ भी। गौरी भगवान शिव की दिव्य अर्धांगिनी, भक्ति, धैर्य और दांपत्य प्रेम की आदर्श हैं। इस व्रत में उनकी उपासना कर भक्त दीर्घ व सुखी दांपत्य, पति के कल्याण और संतान सुख की कामना करते हैं।
यह कब रखा जाता है
मंगला गौरी व्रत श्रावण (सावन) मास के प्रत्येक मंगलवार को रखा जाता है, जो प्रायः जुलाई-अगस्त में आता है। नाम स्वयं मंगला (मंगल द्वारा शासित मंगलवार) को गौरी से जोड़ता है। श्रावण में सामान्यतः चार या पाँच मंगलवार होते हैं, और व्रत हर मंगलवार को रखा जाता है। अनेक स्त्रियाँ विवाह के प्रथम वर्ष से व्रत आरंभ कर लगातार पाँच वर्ष तक रखती हैं और विधिवत उद्यापन से इसे पूर्ण करती हैं। प्रति वर्ष श्रावण की सही तिथियों के लिए वंदना पंचांग पर मंगलवार की तिथियाँ देखें।
मंगला गौरी व्रत पूजा विधि
पूजा प्रातः स्नान के बाद करें: 1. प्रातः जल्दी उठें, स्नान करें और स्वच्छ, यथासंभव लाल या शुभ रंग के वस्त्र पहनें। 2. एक चौकी पर स्वच्छ लाल वस्त्र बिछाएँ और उस पर माँ गौरी (पार्वती) की मूर्ति या चित्र रखें। 3. यदि मूर्ति न हो तो हल्दी या मिट्टी से छोटी गौरी प्रतिमा बनाकर चावल की थाली पर रखें। 4. घी का दीपक जलाएँ और रोली, अक्षत, मेहंदी, कुमकुम, चूड़ियाँ, बिंदी व लाल पुष्प - सुहाग के प्रतीक - अर्पित करें। 5. यथासंभव प्रत्येक वस्तु सोलह की संख्या में चढ़ाएँ - 16 माला, 16 फल, 16 मिठाई, 16 लड्डू। 6. मंगला गौरी व्रत कथा पढ़ें, फिर आरती करें। 7. पति की दीर्घायु और सुखी गृहस्थी की प्रार्थना करें, और पूजा के बाद सात्विक भोजन से व्रत खोलें।
मंगला गौरी व्रत कथा

एक प्रसिद्ध कथा धर्मपाल नामक धनी व्यापारी और उसकी पत्नी की है, जिन्हें लंबे समय तक संतान न थी। अंततः पुत्र का आशीर्वाद मिला, पर पता चला कि बालक अल्पायु है। एक ऋषि की सलाह पर, जब बालक का विवाह ऐसी कन्या से हुआ जो स्वयं श्रद्धा से मंगला गौरी व्रत रखती थी, तो माँ गौरी के प्रति उसकी भक्ति के पुण्य ने उसके पति को अकाल मृत्यु से बचाया और उसे दीर्घ, स्वस्थ जीवन दिया। कथा सिखाती है कि गौरी की सच्ची उपासना दांपत्य की रक्षा करती और दुर्भाग्य को आशीर्वाद में बदलती है।
व्रत के नियम
व्रत स्वच्छता और भक्ति से रखें। अधिकांश स्त्रियाँ निर्जला या फल-दूध का व्रत रखती हैं और संध्या या पूजा के बाद एक बार ही सात्विक भोजन - बिना अनाज, प्याज, लहसुन के - करती हैं। व्रत के दिन क्रोध, कटु वचन और निंदा से बचें। सुहाग के प्रतीक धारण करें और पूजा सामग्री केवल पूजा हेतु सुरक्षित रखें। व्रत के बाद पूजा सामग्री या लड्डू किसी ब्राह्मण या सुहागिन स्त्री को दान करना अत्यंत शुभ माना जाता है।
मंगला गौरी व्रत के लाभ
यह व्रत पति को दीर्घ व स्वस्थ जीवन, दांपत्य में सामंजस्य व प्रेम, और घर की दुर्भाग्य से रक्षा देता माना जाता है। अविवाहित कन्याओं के लिए यह अच्छे व स्नेही वर का आशीर्वाद देता कहा जाता है। भक्त इसके द्वारा संतान सुख और पूरे परिवार के कल्याण की भी प्रार्थना करते हैं। सबसे बढ़कर, यह स्त्री के श्रद्धा-बंधन को माँ गौरी से गहरा करता है, जो आदर्श, समर्पित पत्नी की साक्षात मूर्ति हैं।
पाठकों के प्रश्न
मंगला गौरी व्रत कौन रख सकता है?+
इसे मुख्यतः विवाहित स्त्रियाँ पति की दीर्घायु और सुखी दांपत्य के लिए रखती हैं। अविवाहित कन्याएँ भी अच्छे व स्नेही वर के आशीर्वाद हेतु इसे रखती हैं।
मंगला गौरी व्रत किस दिन रखा जाता है?+
यह श्रावण (सावन) मास के प्रत्येक मंगलवार को रखा जाता है, प्रायः जुलाई-अगस्त में। प्रति वर्ष श्रावण के मंगलवार की सही तिथियाँ वंदना पंचांग पर देखें।
इस पूजा में सोलह वस्तुएँ क्यों चढ़ाई जाती हैं?+
सोलह की संख्या सुहाग के सोलह श्रृंगार का प्रतीक है, जो सुहागिन स्त्री को पवित्र हैं। सोलह की संख्या में वस्तुएँ अर्पित करना माँ गौरी को दांपत्य सुख की दात्री रूप में सम्मान देना है।
व्रत कितने वर्ष तक रखा जाता है?+
अनेक स्त्रियाँ विवाह के प्रथम वर्ष से आरंभ कर लगातार पाँच वर्ष तक इसे रखती हैं और विधिवत उद्यापन से व्रत को पूर्ण करती हैं, जो संकल्प को समाप्त करता है।
मंगला गौरी व्रत में क्या भोजन किया जाता है?+
अधिकांश स्त्रियाँ निर्जला या फल-दूध का व्रत रखती हैं और पूजा के बाद एक बार सात्विक भोजन - बिना अनाज, प्याज, लहसुन के - करती हैं। भक्ति का भाव सबसे महत्वपूर्ण है।
मंगला गौरी व्रत कथा क्या सिखाती है?+
यह सिखाती है कि माँ गौरी की सच्ची भक्ति दांपत्य की रक्षा करती है। कथा में एक नववधू का श्रद्धापूर्ण व्रत उसके पति को अकाल मृत्यु से बचाता और दीर्घायु देता है।
About the author
Pandit Mahesh Trivedi · Festival Traditions & Panchang
Pandit Mahesh leads the festival-date and Panchang content on Vandnaa. He cross-references multiple regional panchangs (Drik, Vaishnava, Bengali, Marathi) for every festival date published on the site.
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