क्या और कब
कात्यायनी व्रत भागवत पुराण में वर्णित सबसे कोमल भक्ति-परंपराओं में से एक है, जिसे वृंदावन की गोपियों ने संपूर्ण मार्गशीर्ष मास (लगभग नवंबर-दिसंबर) में मनाया था। प्रतिदिन सूर्योदय से पूर्व गोपियाँ यमुना तट पर जाकर देवी कात्यायनी, जो देवी का ही एक स्वरूप हैं, की आराधना करती थीं।
इस व्रत को आज अटूट भक्ति के प्रतीक के रूप में स्मरण किया जाता है, और अनेक भक्त मार्गशीर्ष में इसका सरल रूप मनाते हैं, प्रातःकाल देवी से वही प्रार्थना करते हुए जो गोपियों ने की थी।
कथा और उत्पत्ति
भागवत पुराण के अनुसार गोपियों ने यह व्रत एक ही मनोकामना से रखा था, कि जिन कृष्ण को उन्होंने शुद्ध भक्ति से चाहा, वे उनके जीवन की पूर्णता बनें। वे कड़कड़ाती जाड़े की सुबहों में उठतीं, यमुना में स्नान करतीं, और नदी तट की रेत से देवी कात्यायनी की प्रतिमा बनाकर पूर्ण श्रद्धा से उनकी आराधना करतीं।
भक्तजन इस कथा को प्रेम-कथा के रूप में नहीं बल्कि भक्ति के गहनतम उदाहरण के रूप में संजोते हैं, जहाँ गोपियों का प्रेम आत्मा की उस चाहत का प्रतीक है जो परमात्मा से मिलन चाहती है, और देवी वह हैं जो ऐसी भक्ति को आशीर्वाद देती हैं।
रीति और विधि
पारंपरिक रूप से इस व्रत में सूर्योदय से पूर्व उठना, ठंडे जल से स्नान करना, तथा साथी भक्तों के संग हाथ थामे देवी की स्तुति गाते हुए पूजा स्थल तक चलना सम्मिलित था, जो साझा श्रद्धा की एक शृंखला बनाता था।
- देवी कात्यायनी की प्रतीकात्मक प्रतिमा को फूल, चंदन तथा प्रज्वलित दीप से पूजा जाता है
- भक्ति मंत्र का जाप होता है, 'कात्यायनि महामाये महायोगिन्यधीश्वरि, नन्दगोपसुतं देवि पतिं मे कुरु ते नमः', जिसका भाव है 'हे कात्यायनी, महामाया, महायोगिनियों की स्वामिनी, आपको नमन, कृपया मुझे भक्तिमय जीवन का संग प्रदान करें'
- यह व्रत संपूर्ण मास तक सात्विक भोजन और प्रातः जागरण के अनुशासन सहित रखा जाता है
- आज अनेक भक्त इसे धनुर्मास पूजा के भाग रूप में मनाते हैं, सूर्योदय से पूर्व माह भर प्रार्थना करते हुए
क्षेत्रीय रंग

कात्यायनी व्रत की भावना वृंदावन और मथुरा में विशेष रूप से संजोई जाती है, जहाँ यमुना घाट और कृष्ण मंदिर मार्गशीर्ष मास भर भजन और नदी-तट प्रार्थना के माध्यम से गोपियों की भक्ति का स्मरण कराते हैं।
उत्तर भारत भर में मार्गशीर्ष को भक्ति-पाठ और सरल व्रतों हेतु शुभ मास माना जाता है, और अनेक भक्त इस अवधि को गोपियों के आदर्श से प्रेरित होकर अपनी व्यक्तिगत भक्ति गहरी करने हेतु चुनते हैं।
मंत्र और सार
कात्यायनी मंत्र परंपरा के सबसे कोमल भक्ति-मंत्रों में से एक बना हुआ है, जिसके शब्द देवी से भक्तिमय जीवन की सरल, विनम्र प्रार्थना हैं, न कि किसी भौतिक लाभ की माँग।
गोपियों का व्रत यह सिखाता है कि भक्ति का शुद्धतम रूप परमात्मा की निकटता के अतिरिक्त कुछ नहीं माँगता, और अनुशासन तथा विनम्रता से बनाए रखी गई ऐसी श्रद्धा ही सबसे बड़ा वरदान है। यह व्रत, समस्त पूजा की भाँति, प्रेम का अर्पण है, लेन-देन नहीं।
भक्तों के सामान्य प्रश्न
कात्यायनी व्रत क्या है?+
कात्यायनी व्रत भागवत पुराण में वर्णित एक भक्ति-परंपरा है, जिसे वृंदावन की गोपियों ने मार्गशीर्ष मास भर देवी कात्यायनी की आराधना में रखा था।
कात्यायनी मंत्र क्या है?+
मंत्र है 'कात्यायनि महामाये महायोगिन्यधीश्वरि, नन्दगोपसुतं देवि पतिं मे कुरु ते नमः', जो भक्तिमय जीवन हेतु एक विनम्र प्रार्थना है।
क्या कात्यायनी व्रत आज भी मनाया जाता है?+
हाँ, अनेक भक्त मार्गशीर्ष में इस व्रत का सरल रूप मनाते हैं, सूर्योदय से पूर्व उठकर धनुर्मास पूजा के भाग रूप में देवी की प्रार्थना करते हुए।
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Pandit Mahesh Trivedi · Festival Traditions & Panchang
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