लक्ष्मी अष्टोत्तर शतनामावली क्या है?
लक्ष्मी अष्टोत्तर शतनामावली देवी लक्ष्मी के 108 दिव्य नामों का पवित्र संग्रह है - धन, सौभाग्य, सौंदर्य, उर्वरता व प्रचुरता की सर्वोच्च देवी। यह स्तोत्र पद्म पुराण, विष्णु पुराण व लक्ष्मी तंत्र में मिलता है। यह लक्ष्मी को उनके सभी 8 प्राथमिक रूपों (अष्टलक्ष्मी) में दर्शाता: आदि लक्ष्मी (आदि), धन लक्ष्मी (धन), धान्य लक्ष्मी (अन्न), गज लक्ष्मी (राज्य शक्ति), सन्तान लक्ष्मी (संतान), वीर लक्ष्मी (साहस), विद्या लक्ष्मी (विद्या), विजय लक्ष्मी (विजय)। 108 नामों में से प्रत्येक एक विशिष्ट पहलू दर्शाता - 'पद्मासना' (कमलासन) से 'सर्वभक्षकारी' (सभी इच्छाओं की दात्री) तक। दैनिक जप केंद्रीय अभ्यास: दीवाली सप्ताह में हिंदू व्यापारी परिवार, विवाह व संतान चाहने वाली महिलाएं, ठहरे करियर वाले पेशेवर, छात्रवृत्ति आकांक्षी छात्र, और दीर्घकालिक वित्तीय अवरोध सामना करने वाला कोई भी। अष्टोत्तर अक्सर श्री सूक्तम् (ऋग्वेद से लक्ष्मी का प्रमुख स्तुति) के साथ अधिकतम धन-आकर्षण शक्ति हेतु जोड़ा जाता।
लक्ष्मी के सम्पूर्ण 108 नाम (संस्कृत + संक्षिप्त अर्थ)
नाम 1-18: ॐ प्रकृत्यै नमः (आदि प्रकृति), ॐ विकृत्यै नमः (प्रकटीकरण), ॐ विद्यायै नमः (विद्या), ॐ सर्वभूतहितप्रदायै नमः (सब प्राणियों का कल्याण), ॐ श्रद्धायै नमः (श्रद्धा), ॐ विभूत्यै नमः (वैभव), ॐ सुरभ्यै नमः (दिव्य गाय), ॐ परमात्मिकायै नमः (परमात्मा), ॐ वाचे नमः (वाणी), ॐ पद्मालयायै नमः (कमलवासिनी), ॐ पद्मायै नमः (पद्म), ॐ शुचये नमः (शुद्धता), ॐ स्वाहायै नमः (हवन-आह्वान), ॐ स्वधायै नमः (पितृ-आह्वान), ॐ सुधायै नमः (अमृत), ॐ धन्यायै नमः (अन्न-दात्री), ॐ हिरण्मय्यै नमः (स्वर्ण-रूपा), ॐ लक्ष्म्यै नमः (देवी लक्ष्मी)। नाम 19-36: ॐ नित्यपुष्टायै, ॐ विभावर्यै, ॐ आदित्यै, ॐ दित्यै, ॐ दीपायै, ॐ वसुधायै, ॐ वसुधारिण्यै, ॐ कमलायै, ॐ कान्तायै, ॐ कामाक्ष्यै, ॐ क्रोधसम्भवायै, ॐ अनुग्रहप्रदायै, ॐ बुद्ध्यै, ॐ अनघायै, ॐ हरिवल्लभायै, ॐ अशोकायै, ॐ अमृतायै, ॐ दीप्तायै। नाम 37-72 में पद्म-संबंधित (पद्महस्ता, पद्माक्ष्या, पद्मसुन्दर्या, पद्मोद्भवा), चंद्र-संबंधित (चन्द्रवदना, चन्द्रसहोदर्या), औषधि-संबंधित (दारिद्र्यनाशिन्या, सर्वोपद्रववारिण्या) नाम। नाम 91-108 में अंतिम: ॐ वसुप्रदायै, ॐ हिरण्यप्राकारायै, ॐ समुद्रतनयायै, ॐ जयायै, ॐ मङ्गलायै, ॐ विष्णुवक्षःस्थलस्थितायै (विष्णु वक्षस्थल निवासिनी), ॐ विष्णुपत्न्यै, ॐ प्रसन्नाक्ष्यै, ॐ नारायणसमाश्रितायै, ॐ दारिद्र्यध्वंसिन्यै, ॐ सर्वोपद्रववारिण्यै, ॐ नवदुर्गायै, ॐ महाकाल्यै, ॐ ब्रह्मविष्णुशिवात्मिकायै, ॐ त्रिकालज्ञानसम्पन्नायै, ॐ भुवनेश्वर्यै नमः। समापन: 'इति श्री लक्ष्मी अष्टोत्तर शतनामावली सम्पूर्णम्'।
दैनिक जप के 7 शक्तिशाली लाभ
1. सही माध्यमों से धन आकर्षण - जोखिमपूर्ण धन मंत्रों के विपरीत, लक्ष्मी अष्टोत्तर ईमानदार आय के माध्यम से धन आमंत्रित करता - वेतन वृद्धि, व्यापार विकास, ऋण निपटान, अप्रत्याशित वैध लाभ। भक्त कठिन परिश्रम के साथ संयोजन से 6 महीनों में 20-40% आय वृद्धि बताते। 2. दारिद्र्य दोष (निर्धनता शाप) हटाता - 'दारिद्र्यनाशिन्यै' व 'दारिद्र्यध्वंसिन्यै' जैसे नाम विशेष रूप से पीढ़ी-गत निर्धनता पैटर्न नष्ट करने लक्षित। व्यक्तिगत क्षमता के बावजूद लंबे वित्तीय संघर्ष वाले परिवारों हेतु विशेष शक्तिशाली। 3. दाम्पत्य सामंजस्य व संतान - लक्ष्मी विष्णु पत्नी व विवाह संरक्षक। 'सन्तान लक्ष्मी' पहलू युगलों को गर्भधारण में सहायता और विवाहित युगलों को विवाद सुलझाने में। विवाहित स्त्री के चित्र के सामने दैनिक दीया। 4. अवसाद व आत्म-संदेह उपचार - लक्ष्मी प्रचुरता चेतना का प्रतिनिधि। दैनिक जप मानसिकता को कमी ('मेरे पास पर्याप्त नहीं') से प्रचुरता ('मैं धन्य हूँ') में बदलता। चिकित्सक चिंता/अवसाद के चिकित्सीय उपचार का पूरक मानते। 5. व्यापार सफलता व ग्राहक आकर्षण - हिंदू व्यापार शुक्रवार (लक्ष्मी का दिन) व दीवाली (व्यापारों हेतु हिंदू नववर्ष) पर लक्ष्मी अष्टोत्तर करते। दैनिक लक्ष्मी पूजा करने वाली दुकानों में दीवाली सीज़न में 30%+ राजस्व वृद्धि। 6. संपत्ति व विरासत अनलॉक - 'वसुधायै' व 'हिरण्यप्राकारायै' अटके संपत्ति सौदे, विरासत विवाद, व रियल एस्टेट विंडफॉल अनलॉक करते। 7. आध्यात्मिक धन व संतोष - परम लक्ष्मी आशीर्वाद धन नहीं संतुष्टि। वर्षों लक्ष्मी अष्टोत्तर अभ्यास करने वाले बैंक बैलेंस की परवाह किए बिना 'समृद्ध' महसूस करते - प्रचुरता अस्तित्व की स्थिति बन जाती।
लक्ष्मी अष्टोत्तर जप विधि

श्रेष्ठ दिन: शुक्रवार (लक्ष्मी का दिन) व मंगलवार (मंगल-लक्ष्मी संयोजन)। दीवाली सप्ताह सर्वोच्च। शनिवार टालें। श्रेष्ठ समय: 6-8 AM (सूर्योदय) दैनिक अभ्यास हेतु; 7-9 PM (प्रदोष काल) सायं हेतु। दीवाली रात 8 PM-12 मध्यरात्रि वार्षिक सर्वाधिक शक्तिशाली विंडो। संकल्प तैयारी: 1. ठंडे जल से स्नान (गुनगुना नहीं - ठंडा ओजस् सक्रिय)। पीले, सोने, लाल या गुलाबी वस्त्र (लक्ष्मी पूजा में काला कभी नहीं)। 2. पीले रेशम या ऊनी आसन पर पूर्व/उत्तर मुख बैठें (उत्तर कुबेर की दिशा)। 3. लक्ष्मी चित्र/मूर्ति। लाल व पीले पुष्प (गुलाब, गेंदा), उपलब्ध हो तो कमल। अर्पण सामग्री (पंचामृत + अतिरिक्त): 4. 5 छोटे कप: दूध, दही, घी, शहद, चीनी (पंचामृत)। 5. इलायची, लौंग, पान, सुपारी। 6. नारियल (खुला)। 7. मिठाई (लड्डू, खीर, मखाना)। 8. वेदी पर सोने का सिक्का या नया रुपये का नोट। 9. घी का दीपक - सरसों तेल नहीं। पूजा: 10. आचमन (3 बार 'ॐ विष्णवे नमः')। 11. नाम, गोत्र, तिथि, विशिष्ट संकल्प। 12. पहले गणेश आह्वान ('ॐ गं गणपतये नमः' 11 बार)। 13. अष्टोत्तर शुरू - 108 नाम, प्रति नाम 'नमः' (जैसे 'ॐ प्रकृत्यै नमः')। 14. प्रति नाम पुष्प/अक्षत अर्पण। 15. सभी 108 नामों के बाद ज्ञात हो तो श्री सूक्तम् (12 मंत्र, 5 मिनट)। 16. कपूर आरती (ॐ जय लक्ष्मी माता)। समापन: 17. प्रसाद ग्रहण। पंचामृत परिवार बाँटें। 18. दान बॉक्स में दान किया नोट डालें (यह धन चक्र पूर्ण करता)।
श्रेष्ठ दिन, पर्व व समय कैलेंडर
साप्ताहिक: शुक्रवार THE दिन। कई दक्षिण भारतीय परिवार श्रावण मास के शुक्रवार 'वरलक्ष्मी व्रतम्' मनाते। मासिक: हर मास की अष्टमी व पूर्णिमा - दोनों लक्ष्मी-सरस्वती संयुक्त ऊर्जा से जुड़े। वार्षिक प्रमुख पर्व: 1. दीवाली (कार्तिक अमावस्या) - वर्ष की सबसे बड़ी लक्ष्मी पूजा। प्रदोष क्षण पर अष्टोत्तर। 2. धनतेरस (दीवाली से 2 दिन पहले) - सोना/चाँदी खरीदकर रखने से पहले 108 नाम जपें। 3. अक्षय तृतीया (वैशाख शुक्ल 3) - द्वितीय सबसे बड़ा धन दिन। 4. वरलक्ष्मी व्रतम् (श्रावण/अगस्त शुक्रवार) - विवाहित जीवन हेतु महिलाओं का लक्ष्मी व्रत। 5. कोजागरी पूर्णिमा (आश्विन पूर्णिमा) - 'जागृत लक्ष्मी' को समर्पित पूर्णिमा; मध्यरात्रि अष्टोत्तर। 6. मार्गशीर्ष पूर्णिमा - कृष्ण का प्रिय मास; संयुक्त कृष्ण-लक्ष्मी पूजा। 7. नववर्ष दिवस (व्यापार का वित्तीय नववर्ष) - आगामी वर्ष के धन हेतु अष्टोत्तर। अशुभ दिन: शनिवार टालें (शनि लक्ष्मी प्रवाह रोकता), किसी दिन का राहु काल, और संबंधी की मृत्यु के अगले दिन (सूतक काल - 13वीं क्रिया पूर्ण होने तक)।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
क्या कोई भी कुलदेवता की परवाह किए बिना लक्ष्मी अष्टोत्तर जप सकता है?+
हाँ - लक्ष्मी सरस्वती व दुर्गा की तरह सार्वभौमिक माता देवी। उनकी पूजा किसी कुलदेवता से टकराव नहीं। कई परिवार अपनी प्राथमिक पूजा के साथ दैनिक लक्ष्मी पूजा शामिल करते। एकमात्र सुझाव: पहले 5 मिनट कुलदेवता पूजा, फिर लक्ष्मी अष्टोत्तर। यह परंपरागत श्रेणी बनाए रखता।
क्या जप करते समय मेरे पास धन/सोना रखूँ?+
हाँ - प्रतीकात्मक उपस्थिति परिणाम बढ़ाती। लक्ष्मी चित्र के सामने स्वच्छ नोट (कोई भी मूल्य), सोने/चाँदी का सिक्का, या कुछ चावल के दाने रखें। जप के बाद धन वापस बटुए में (न खर्चें - यह 'लक्ष्मी-स्पर्शित' भाग्यशाली धन बने)। कुछ परंपराएं विशेष 'अक्षय पात्र' रखती - एक छोटा कटोरा जिसमें जप बाद ₹1 दैनिक डालें, कभी न निकालें, लक्ष्मी-आशीर्वादित कोष बनाएं।
लक्ष्मी अष्टोत्तर श्री सूक्तम् से कैसे भिन्न है?+
श्री सूक्तम् ऋग्वेद खिल से वैदिक लक्ष्मी स्तुति - 16 शक्तिशाली मंत्र, 5-8 मिनट। लक्ष्मी अष्टोत्तर पश्च-वैदिक (पौराणिक) - 108 नाम, 10-12 मिनट। श्री सूक्तम् आध्यात्मिक गहराई व अनुष्ठान हेतु; अष्टोत्तर दैनिक भक्ति अभ्यास हेतु। आदर्श क्रम: पहले श्री सूक्तम् (ब्रह्मांडीय सक्रियण हेतु), फिर अष्टोत्तर (व्यक्तिगत आशीर्वाद हेतु)। मिलकर पूर्ण लक्ष्मी साधना।
क्या मासिक धर्म के दौरान लक्ष्मी अष्टोत्तर जप सकती हूँ?+
मानसिक जप सदा अनुमत। परंपरागत निषेध मंदिर दर्शन व भौतिक अर्पण अनुष्ठान पर। रिकॉर्ड पाठ सुनें, मन में 108 नाम दोहराएं, लक्ष्मी की कल्पना करें। भाव शरीर स्थिति की परवाह किए बिना देवी तक पहुँचता। चक्र समाप्ति के बाद (स्नान दिन 4 के बाद), पूर्ण अनुष्ठान फिर से। कई प्राचीन ग्रंथ नोट करते लक्ष्मी स्वयं देवी और स्त्री चक्र समझती - कोई आध्यात्मिक दंड नहीं।
मुझे धन परिणाम कितनी जल्दी दिखेंगे?+
यथार्थवादी समयरेखा: 11-21 दिनों में छोटे अप्रत्याशित लाभ (रिफंड, उपहार, छोटे बोनस)। 3-6 महीनों में मध्यम परिणाम (वेतन वृद्धि, व्यापार उछाल, ऋण निपटान)। 1-2 वर्षों के निरंतर अभ्यास में प्रमुख जीवन परिवर्तन (संपत्ति, विवाह, संतान)। महत्वपूर्ण: लक्ष्मी प्रयास + भक्ति साथ पुरस्कृत करती। बैठकर जप करते हुए बिना कर्म धन की अपेक्षा 10% फल। जप + कठिन परिश्रम + नैतिक आचरण 100%। लक्ष्मी धार्मिक प्रचुरता की देवी, अनार्जित धन की नहीं।
About the author
Acharya Vinaya Kapoor · M.A. Sanskrit, Mantra & Stotra Studies
Acharya Vinaya holds an M.A. in Sanskrit from Banaras Hindu University and writes the mantra and stotra commentary on Vandnaa. Her focus is on accurate pronunciation, traditional context, and helping modern readers connect with classical texts.
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