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फुलेरा दूज 2027 - राधा कृष्ण का फूलों का उत्सव और इसका महत्व
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फुलेरा दूज 2027 - राधा कृष्ण का फूलों का उत्सव और इसका महत्व

9 मिनट पढ़ेंप्रकाशित जून 10, 2026
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By Pandit Mahesh Trivedi · Festival Traditions & Panchang

Reviewed by Pandit Ravindra Sharma · Vedic Rituals & Bhakti, 22+ years

फुलेरा दूज क्या है?

फुलेरा दूज (फूल दूज) फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को मनाया जाने वाला राधा-कृष्ण का अत्यंत प्रिय उत्सव है। इसका नाम फूल से आया है, क्योंकि परंपरा के अनुसार इसी दिन श्रीकृष्ण राधा रानी और ब्रज की गोपियों के साथ फूलों से खेलकर होली के मौसम का शुभारंभ करते हैं। भक्तों के लिए फुलेरा दूज वह क्षण है जब शीत ऋतु की शांति फाल्गुन के रंगीन और उल्लासमय भाव में बदल जाती है। मथुरा और वृंदावन के मंदिरों में ठाकुर जी को सुंदर वस्त्र पहनाए जाते हैं, फूलों की वर्षा होती है और श्रीकृष्ण के श्रीविग्रह पर रंगीन कपड़ा या गुलाल रखा जाता है, मानो प्रभु अब होली के लिए तैयार हैं। यह आनंद, प्रेम और भक्ति का दिन है।

फुलेरा दूज 2027 की तिथि

फुलेरा दूज फाल्गुन शुक्ल द्वितीया को मनाई जाती है, अर्थात फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की दूसरी तिथि। वर्ष 2027 में यह तिथि मार्च 2027 के प्रारंभ में आने की संभावना है, होली से लगभग बारह-तेरह दिन पहले। चूँकि हिंदू पर्व चंद्र पंचांग पर आधारित होते हैं और तिथि का समय क्षेत्र तथा सूर्योदय के अनुसार बदल सकता है, पूजा या विवाह की योजना से पहले सटीक तिथि अवश्य देख लें। आप अपने शहर के लिए फाल्गुन शुक्ल द्वितीया का सही समय वंदना पंचांग पर देख सकते हैं, जहाँ प्रतिदिन तिथि का आरंभ और समाप्ति समय दिया रहता है। अधिकांश परंपराओं में फुलेरा दूज पर व्रत का नियम नहीं है; यह तप से नहीं, बल्कि गीत, फूल और सेवा से मनाया जाता है, इसलिए परिवार का हर सदस्य इसमें सहज भाग ले सकता है।

फुलेरा दूज अबूझ दिन क्यों है - हर दोष से मुक्त

भक्ति परंपरा में फुलेरा दूज को अबूझ मुहूर्त के रूप में पूजा जाता है (अबूझ अर्थात जिसके लिए पूछने की आवश्यकता नहीं)। बड़े-बुजुर्ग सिखाते हैं कि इस दिन का हर क्षण स्वाभाविक रूप से शुभ है, किसी भी दोष से मुक्त, क्योंकि राधा-कृष्ण की दिव्य लीला पूरी तिथि को पवित्र कर देती है। इसीलिए जिन परिवारों को वर्ष में विवाह की कोई तिथि नहीं मिल पाती, वे पूर्ण विश्वास से फुलेरा दूज चुनते हैं; अलग से मुहूर्त निकालने की आवश्यकता नहीं मानी जाती। यही श्रद्धा गृह प्रवेश, नामकरण, नए व्यापार के शुभारंभ, घर खरीदने या किसी भी शुभ कार्य पर लागू होती है। यह पीढ़ियों से चली आ रही ब्रज-भक्ति की आस्था और परंपरा है, कोई गणना नहीं। इसका गहरा संदेश सुंदर है - जो दिन दिव्य प्रेम में डूबा हो, उसमें कोई दोष हो ही नहीं सकता।

ब्रज की फूलों की होली - मथुरा, वृंदावन और मंदिर

ब्रज की फूलों की होली - मथुरा, वृंदावन और मंदिर

फुलेरा दूज जितनी जीवंत ब्रज में होती है, उतनी कहीं नहीं - यही श्रीकृष्ण की बाल-लीलाओं की पावन भूमि है। इसी दिन से ब्रज की प्रसिद्ध चालीस दिनों की होली का रंग सचमुच खिल उठता है। वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर में पुजारी भक्तों पर गेंदा, गुलाब और चमेली की पंखुड़ियाँ बरसाते हैं - यही प्रसिद्ध फूलों की होली है। मथुरा के द्वारकाधीश मंदिर और राधा रानी के बरसाना में ठाकुर जी को फूलमालाओं और हल्के गुलाल से सजाया जाता है, और आँगन होरी तथा रसिया के फाल्गुनी गीतों से गूँज उठते हैं। भक्तों की श्रद्धा है कि श्रीकृष्ण स्वयं अदृश्य रूप से इस खेल में सम्मिलित होते हैं, जैसे कभी यमुना तट पर गोपियों संग खेले थे। कई तीर्थयात्री अपनी ब्रज यात्रा फुलेरा दूज के आसपास ही रखते हैं, क्योंकि भीड़ होली सप्ताह से कम होती है और भक्ति-रस अपने शिखर पर होता है।

घर पर फुलेरा दूज कैसे मनाएँ - सरल पूजा विधि

राधा-कृष्ण को प्रसन्न करने के लिए ब्रज जाना आवश्यक नहीं; प्रेम से की गई घर की पूजा भी उन्हें उतनी ही प्रिय है। सरल विधि: 1. प्रातः स्नान कर मंदिर साफ करें; एक स्वच्छ चौकी पर पीला या गुलाबी वस्त्र बिछाकर राधा-कृष्ण का चित्र या मूर्ति विराजित करें। 2. घी का दीपक और धूप जलाएँ, ताजे मौसमी फूल अर्पित करें - गेंदा, गुलाब या बगीचे के कोई भी फूल। 3. ब्रज की फूलों की होली की भाँति ठाकुर जी पर धीरे-धीरे पंखुड़ियाँ बरसाएँ और चरणों में थोड़ा गुलाल रखें। 4. माखन-मिश्री, खीर या पोहे का भोग लगाएँ - ये ब्रज परंपरा के प्रिय व्यंजन हैं। 5. कृष्ण भजन या होरी गाएँ, श्री राधा-कृष्णाभ्यां नमः का जप करें और आरती करें। 6. अंत में प्रसाद और पंखुड़ियाँ परिवार में प्रेमपूर्वक बाँटें।

फुलेरा दूज और होली का मौसम - रंगों की पहली बौछार

फुलेरा दूज को प्रेम से होली का प्रवेश द्वार कहा जाता है। वसंत पंचमी से ही फाल्गुन का भाव जागने लगता है, पर रंग औपचारिक रूप से श्रीकृष्ण के आँगन में फुलेरा दूज को ही प्रवेश करता है। ब्रज के कई मंदिरों में इसी दिन से ठाकुर जी के पास एक छोटी गुलाल की पोटली बाँधी जाती है, और दैनिक शृंगार धीरे-धीरे और रसमय होता जाता है - फाल्गुन पूर्णिमा के होलिका दहन और होली तक। गृहस्थों के लिए यह दिन एक मधुर स्मरण है कि होली की तैयारी सबसे पहले भक्ति से शुरू करें: घर के मंदिर की सफाई, परिवार के होलिका दहन की योजना, और प्राकृतिक, फूलों से बने रंगों का चयन। यदि होली उत्सव की गर्जना है, तो फुलेरा दूज उसकी पहली कोमल बूँद है - आत्मीय, सुगंधित और पूर्णतः राधा-कृष्ण के प्रेम पर केंद्रित।

फुलेरा दूज के मंत्र और भजन

फुलेरा दूज के मंत्र और भजन

इस दिन जप को सरल और मधुर रखें। सबसे प्रिय नाम हैं राधे राधे और महामंत्र हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे। आप तुलसी की माला से ॐ क्लीं कृष्णाय नमः का 108 बार जप कर सकते हैं, या युगल-मंत्र श्री राधा-कृष्णाभ्यां नमः का स्मरण करें। आज बिरज में होली रे रसिया जैसे पारंपरिक होरी भजन घर को ब्रज के भाव से भर देते हैं। चाहें तो जप करते समय हर माला पर ठाकुर जी को एक पंखुड़ी अर्पित करें - यह पुष्प-जप ब्रज की परंपरा है, जो मंत्र को ही पुष्पांजलि बना देती है। अंत में मधुराष्टकम् (अधरं मधुरं) का पाठ करें, जो श्रीकृष्ण के सर्व-मधुर स्वरूप का वर्णन करता है - फूलों के उत्सव का सुंदरतम समापन।

पाठकों के प्रश्न

2027 में फुलेरा दूज कब है?+

फुलेरा दूज 2027 फाल्गुन शुक्ल द्वितीया को है, जो मार्च 2027 के प्रारंभ में, होली से लगभग बारह-तेरह दिन पहले आने की संभावना है। तिथि का समय शहर और सूर्योदय के अनुसार बदलता है, इसलिए पूजा से पहले वंदना पंचांग पर सटीक तिथि अवश्य देखें।

फुलेरा दूज को अबूझ मुहूर्त क्यों माना जाता है?+

परंपरा के अनुसार राधा-कृष्ण की दिव्य पुष्प-लीला पूरी तिथि को पवित्र कर देती है और वह हर दोष से मुक्त हो जाती है। इसलिए फुलेरा दूज का हर क्षण बिना अलग मुहूर्त निकाले शुभ माना जाता है। यह पीढ़ियों से चली आ रही भक्ति की आस्था है, जो ब्रज में विशेष रूप से प्रबल है।

क्या फुलेरा दूज पर बिना मुहूर्त के विवाह हो सकता है?+

हाँ, परंपरा से फुलेरा दूज अबूझ दिन है, इसलिए परिवार बिना अलग मुहूर्त निकाले इस दिन विवाह, सगाई, गृह प्रवेश और अन्य शुभ कार्य करते हैं। उत्तर भारत में कई सामूहिक विवाह आयोजन इसी कारण इसी दिन रखे जाते हैं।

क्या फुलेरा दूज पर व्रत रखा जाता है?+

अधिकांश परंपराओं में फुलेरा दूज पर व्रत का विधान नहीं है। यह आनंद का उत्सव है, जो फूलों, गुलाल, भजनों और माखन-मिश्री, खीर जैसे भोग से मनाया जाता है। कुछ भक्त स्वेच्छा से सात्विक आहार रखते हैं और दिन राधा-कृष्ण स्मरण में बिताते हैं, पर व्रत अनिवार्य नहीं है।

फूलों की होली क्या है और कहाँ खेली जाती है?+

फूलों की होली रंगों के स्थान पर फूलों की पंखुड़ियों से खेली जाने वाली होली है। यह ब्रज में फुलेरा दूज के आसपास शुरू होती है, और सबसे प्रसिद्ध रूप वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर में दिखता है, जहाँ पुजारी भक्तों पर गेंदा, गुलाब और चमेली की पंखुड़ियाँ बरसाते हैं और आँगन में होरी-रसिया गाए जाते हैं।

ब्रज न जा सकूँ तो घर पर फुलेरा दूज कैसे मनाऊँ?+

स्वच्छ चौकी पर राधा-कृष्ण का चित्र विराजित करें, घी का दीपक जलाएँ, ठाकुर जी पर पंखुड़ियाँ बरसाएँ, चरणों में थोड़ा गुलाल अर्पित करें और माखन-मिश्री या खीर का भोग लगाएँ। राधे राधे या हरे कृष्ण महामंत्र का जप करें, होरी भजन गाएँ और परिवार सहित आरती करें।

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About the author

Pandit Mahesh Trivedi · Festival Traditions & Panchang

Pandit Mahesh leads the festival-date and Panchang content on Vandnaa. He cross-references multiple regional panchangs (Drik, Vaishnava, Bengali, Marathi) for every festival date published on the site.

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