तुलसी पूजन दिवस क्या है?
तुलसी पूजन दिवस प्रति वर्ष 25 दिसंबर को मनाया जाता है - यह दिन पूर्णतः तुलसी माता को समर्पित है, जिन्हें हिंदू घरों में हजारों वर्षों से पूजा जाता है। तिथि आधारित पर्वों से अलग, यह पर्व सौर कैलेंडर की निश्चित तारीख पर आता है, इसलिए 2026 में भी यह 25 दिसंबर को ही होगा। इस दिन भक्त तुलसी चौरा (जहाँ तुलसी लगी होती है) को साफ कर सजाते हैं, पौधे के पास घी का दीपक जलाते हैं, जल, कुमकुम और पुष्प अर्पित करते हैं, परिक्रमा करते हैं और तुलसी मंत्रों का जप करते हैं। परिवार सर्दियों भर पौधे की देखभाल और नित्य तुलसी सेवा का संकल्प भी लेते हैं। यह दिवस स्मरण कराता है कि हिंदू परंपरा में दिव्यता केवल मंदिरों में नहीं, आँगन में खड़े जीवित पौधे में भी पूजी जाती है।
तुलसी पूजन दिवस की शुरुआत क्यों हुई?
तुलसी पूजन दिवस की शुरुआत 2014 में हुई, जब भारत के संतों और धार्मिक संस्थाओं ने परिवारों से आह्वान किया कि 25 दिसंबर का दिन भारतीय संस्कृति और तुलसी माता की पूजा को समर्पित करें। उद्देश्य सरल और सकारात्मक था: बच्चों और युवाओं को शीत ऋतु का उत्सव अपनी विरासत से जुड़कर मनाने का आनंदमय मार्ग देना - उस पौधे की पूजा द्वारा जिसे पद्म पुराण और स्कंद पुराण भगवान विष्णु को परम प्रिय बताते हैं। वर्षों में यह परंपरा घरों, विद्यालयों और आश्रमों में सहज रूप से फैल गई है। कई परिवार अब इस दिन तुलसी के पौधे उपहार में देते हैं, सामूहिक तुलसी पूजा करते हैं और वृंदा देवी की कथा पढ़ते हैं। मूल रूप से तुलसी पूजन दिवस किसी का विरोध नहीं, बल्कि यह स्मरण है कि प्रकृति के प्रति श्रद्धा सनातन परंपरा का अभिन्न अंग है।
हिंदू परंपरा में तुलसी माता का महत्व
तुलसी को साधारण पौधा नहीं, देवी माना जाता है - तुलसी माता, जो भगवान विष्णु की परम भक्त वृंदा देवी का पार्थिव रूप हैं। पुराण कहते हैं कि बिना तुलसी पत्र के विष्णु या कृष्ण की कोई पूजा पूर्ण नहीं होती, इसीलिए ठाकुर जी के हर भोग पर तुलसी दल रखा जाता है। तुलसी का पौधा घर को धर्ममय बनाता है; बड़े-बुजुर्ग कहते हैं कि जहाँ नित्य तुलसी को जल दिया जाता है, वहाँ लक्ष्मी का वास होता है और नकारात्मकता नहीं टिकती। शालिग्राम रूप में भगवान विष्णु से तुलसी का विवाह हर वर्ष देवउठनी एकादशी के बाद तुलसी विवाह के रूप में मनाया जाता है। तुलसी की माला से विष्णु और कृष्ण मंत्रों का जप होता है, और चरणामृत में एक पत्ता भी उसे पवित्र कर देता है। परंपरा तुलसी को भक्ति, पवित्रता और मोक्ष देने वाली मानती है।
तुलसी पूजन दिवस की पूजा विधि - चरण दर चरण

यह पूजा हर गृहस्थ के लिए सरल है: 1. प्रातः स्नान कर तुलसी चौरा साफ करें; उसे रंगोली, कुमकुम और तुलसी माता के लिए छोटी लाल चुनरी से सजा सकते हैं। 2. जड़ों में ताजा जल अर्पित करें (परंपरा से एकादशी को, और कई परिवारों में रविवार को, जल नहीं चढ़ाया जाता - यदि 25 दिसंबर ऐसे दिन पड़े तो केवल सूखी पूजा करें)। 3. चौरे पर हल्दी-कुमकुम लगाएँ और पुष्प, अक्षत तथा गन्ना या मौसमी फल अर्पित करें। 4. संध्या को पौधे के पास घी का दीपक और धूप जलाएँ - यह दिन का सबसे प्रिय क्षण है। 5. तुलसी जी की 3, 7 या 11 परिक्रमा करें और नाम-जप करते रहें। 6. तुलसी स्तुति या तुलसी मंत्र का पाठ करें, आरती करें और प्रसाद बाँटें।
कौन से मंत्र और तुलसी स्तुति का पाठ करें
इस दिन की सबसे प्रिय स्तुति है तुलसी स्तुति: महाप्रसाद जननी सर्व सौभाग्यवर्धिनी, आधि व्याधि हरा नित्यं तुलसी त्वं नमोस्तुते - "हे तुलसी, महाप्रसाद की जननी, समस्त सौभाग्य बढ़ाने वाली, आधि-व्याधि हरने वाली, मैं आपको नित्य प्रणाम करता हूँ।" परिक्रमा करते समय आप सरल मंत्र ॐ तुलस्यै नमः का 11, 21 या 108 बार जप कर सकते हैं। जो और गहराई चाहें, वे तुलसी नामाष्टक का पाठ करें - तुलसी के आठ नाम: वृंदा, वृंदावनी, विश्वपूजिता, विश्वपावनी, पुष्पसारा, नंदिनी, तुलसी और कृष्णजीवनी - परंपरा कहती है कि इनके पाठ से तुलसी विवाह का फल मिलता है। जप करते समय तुलसी माता को जीवित देवी मानकर भाव से स्मरण करें, केवल शब्द न दोहराएँ।
नित्य तुलसी सेवा के लाभ
नित्य तुलसी सेवा - सूर्योदय पर जल, संध्या को दीपक और छोटी परिक्रमा - किसी भी गृहस्थ के लिए सबसे सरल आध्यात्मिक आधार है। परंपरा कहती है कि इससे घर में विष्णु और लक्ष्मी की कृपा आती है, परिवार का वातावरण सात्विक रहता है और सेवा करने वाले का मन स्थिर होता है। यह सेवा मुश्किल से पाँच मिनट लेती है, इसलिए व्यस्ततम व्यक्ति भी इसे निभा सकता है और धीरे-धीरे स्मरण का अभ्यास बन जाता है। आयुर्वेद में तुलसी के पत्तों को घरेलू स्वास्थ्य परंपराओं में सदा महत्व मिला है, जिसे परंपरा तुलसी माता की ममता मानती है; इसे विरासत का ज्ञान समझें और किसी भी स्वास्थ्य समस्या में चिकित्सक से परामर्श लें। कई भक्त अनुभव करते हैं कि पौधा एक मौन सखा बन जाता है - एक हरी मूर्ति, जो प्रेम का उत्तर सुगंध और नई पत्तियों से देती है।
सर्दियों में तुलसी की देखभाल - यही सेवा है

तुलसी पूजन दिवस कड़ाके की सर्दी में आता है, जब पौधा सबसे नाजुक होता है - इसलिए उसकी देखभाल ही सच्ची पूजा है। कुछ सेवा-सूत्र: 1. गमले को ऐसी जगह रखें जहाँ सुबह की धूप आए और पाला तथा ठंडी रात की हवा से बचाव हो; दक्षिण या पूर्व की दीवार के पास अच्छा रहता है। 2. जल कम दें, केवल तब जब ऊपरी मिट्टी सूखी लगे; सर्दियों में अधिक पानी ठंड से भी ज्यादा जड़ों को हानि पहुँचाता है। 3. बहुत ठंडी रातों में पौधे को हल्के सूती कपड़े या पारंपरिक लाल चुनरी से ढकें और सूर्योदय के बाद हटा दें। 4. संध्या के समय या सर्दियों में अधिक पत्ते न तोड़ें; प्रार्थना के साथ कोमलता से तोड़ें, और जिन दिनों आपकी परंपरा मना करती है, उन दिनों बिल्कुल नहीं। 5. कभी-कभी मिट्टी हल्की कर थोड़ी खाद डालें - इसे तुलसी माता की मिट्टी सेवा मानें।
भक्तों के सामान्य प्रश्न
2026 में तुलसी पूजन दिवस कब है?+
तुलसी पूजन दिवस हर वर्ष निश्चित तारीख 25 दिसंबर को मनाया जाता है। अतः 2026 में यह शुक्रवार, 25 दिसंबर 2026 को है। तिथि आधारित पर्वों की तरह इसकी तारीख के लिए पंचांग देखने की आवश्यकता नहीं, फिर भी उस दिन की तिथि और शुभ समय वंदना पंचांग पर देख सकते हैं।
तुलसी पूजन दिवस की शुरुआत किसने और कब की?+
तुलसी पूजन दिवस की शुरुआत 2014 में हुई, जब भारत के संतों और धार्मिक संस्थाओं ने परिवारों से 25 दिसंबर को तुलसी माता की पूजा और भारतीय संस्कृति के उत्सव को समर्पित करने का आह्वान किया। तब से यह एक सकारात्मक सांस्कृतिक परंपरा के रूप में देशभर के घरों, विद्यालयों और आश्रमों में फैल गया है।
तुलसी पूजन दिवस पर कौन सा मंत्र जपें?+
तुलसी स्तुति का पाठ करें - महाप्रसाद जननी सर्व सौभाग्यवर्धिनी, आधि व्याधि हरा नित्यं तुलसी त्वं नमोस्तुते - या परिक्रमा करते हुए सरल मंत्र ॐ तुलस्यै नमः का 11, 21 या 108 बार जप करें। तुलसी के आठ नामों वाले तुलसी नामाष्टक का पाठ भी अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है।
क्या सर्दियों में तुलसी को रोज जल चढ़ा सकते हैं?+
जल केवल तभी दें जब ऊपरी मिट्टी सूखी लगे, क्योंकि सर्दियों में अधिक पानी जड़ों को हानि पहुँचाता है। परंपरा में एकादशी और कई परिवारों में रविवार को भी जल नहीं चढ़ाया जाता, क्योंकि माना जाता है कि उन दिनों तुलसी माता विष्णु जी के लिए व्रत रखती हैं। ऐसे दिनों में दीपक और परिक्रमा से सूखी पूजा करें।
संध्या को तुलसी के पास दीपक क्यों जलाते हैं?+
संध्या के समय तुलसी चौरे पर घी का दीपक जलाना सदियों पुरानी नित्य परंपरा है। मान्यता है कि यह दीपक तुलसी माता और भगवान विष्णु दोनों का सम्मान करता है, घर में लक्ष्मी जी की कृपा आमंत्रित करता है, और दिन से संध्या के संधिकाल को घर के केंद्र में प्रभु-स्मरण से जोड़ता है।
तुलसी पूजन दिवस और तुलसी विवाह में क्या अंतर है?+
तुलसी विवाह कार्तिक मास में देवउठनी एकादशी के बाद की तिथि को तुलसी माता और शालिग्राम रूप भगवान विष्णु का विधिवत विवाह है। तुलसी पूजन दिवस 25 दिसंबर की निश्चित तारीख वाला आधुनिक पर्व है, जिसका केंद्र तुलसी की पूजा और सेवा है। दोनों एक ही देवी का अलग-अलग रूपों में उत्सव हैं।
About the author
Acharya Vinaya Kapoor · M.A. Sanskrit, Mantra & Stotra Studies
Acharya Vinaya holds an M.A. in Sanskrit from Banaras Hindu University and writes the mantra and stotra commentary on Vandnaa. Her focus is on accurate pronunciation, traditional context, and helping modern readers connect with classical texts.
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