संकष्टी चतुर्थी क्या है? मासिक क्यों
संकष्टी चतुर्थी (संकष्टहरा चतुर्थी भी लिखा) भगवान गणेश को समर्पित मासिक व्रत है, हर कृष्ण पक्ष (क्षयमान चंद्र पक्ष) की 4वीं तिथि (चतुर्थी) पर मनाया जाता। 'संकष्टी' का अर्थ 'संकट' या 'बाधा' और 'चतुर्थी' 4वाँ चांद्र दिन। साथ में, 'संकष्टी चतुर्थी' का शाब्दिक अर्थ 'संकट निवारण हेतु 4वाँ दिन'। गणेश विघ्नहर्ता (बाधा निवारक), और इस विशिष्ट चांद्र चरण पर, उनकी बाधा-निवारक शक्ति शीर्ष पर। भक्त सूर्योदय से चंद्रोदय तक उपवास, फिर चंद्र दर्शन के बाद ही उपवास तोड़ते - चंद्रमा व गणेश दोनों की पूजा के बाद। यह संकष्टी को हिंदू उपवासों में अद्वितीय बनाता - अधिकांश व्रत सूर्यास्त पर समाप्त, परन्तु संकष्टी विशेष रूप से चंद्र की प्रतीक्षा करता। व्रत स्कंद पुराण, भविष्य पुराण, और गणेश पुराण में उल्लिखित। पूरे भारत में मनाया परन्तु महाराष्ट्र में विशेष रूप से तीव्र (जहाँ 'संकष्टहार' कहलाता), तमिलनाडु ('संकष्ट हरा चतुर्थी'), और कर्नाटक। 12 वार्षिक संकष्टी चतुर्थियाँ प्रत्येक विशिष्ट गणेश रूप पर नामांकित - वक्रतुण्ड, एकदन्त, कृष्णपिङ्गाक्ष, गजवक्त्र, आदि - प्रत्येक एक विशिष्ट आशीर्वाद। मंगलवार की संकष्टी 'अंगारकी चतुर्थी' कहलाती और नियमित संकष्टी से 100 गुना अधिक शक्तिशाली मानी।
2026 की सभी 12 संकष्टी चतुर्थी तिथियाँ
1. जनवरी संकष्टी - सकट चौथ / तिलकुटा चौथ (6 जनवरी 2026, मंगलवार) - अंगारकी चतुर्थी (मंगलवार + संकष्टी = 100 गुना शक्ति)! विशेष महत्व: माताएं पुत्रों की दीर्घायु हेतु उपवास। रूप: वक्रतुण्ड। 2. फरवरी संकष्टी - द्विजप्रिय संकष्टी (5 फरवरी 2026, गुरुवार) - बुद्धि व ब्राह्मण पूजा हेतु। रूप: द्विजप्रिय। 3. मार्च संकष्टी - भालचंद्र संकष्टी (6 मार्च 2026, शुक्रवार) - समृद्धि हेतु। रूप: भालचंद्र। 4. अप्रैल संकष्टी - विकट संकष्टी (5 अप्रैल 2026, रविवार) - प्रमुख बाधा निवारण हेतु। रूप: विकट। 5. मई संकष्टी - एकदंत संकष्टी (4 मई 2026, सोमवार) - ज्ञान हेतु। रूप: एकदंत। 6. जून संकष्टी - कृष्णपिङ्गल संकष्टी (2 जून 2026, मंगलवार) - अंगारकी चतुर्थी (मंगलवार + संकष्टी)! दोगुना शक्तिशाली। रूप: कृष्णपिङ्गाक्ष। 7. जुलाई संकष्टी - गजानन संकष्टी (2 जुलाई 2026, गुरुवार) - उर्वरता व संतान हेतु। रूप: गजानन। 8. अगस्त संकष्टी - हेरम्ब संकष्टी (1 अगस्त 2026, शनिवार) - सुरक्षा हेतु। रूप: हेरम्ब। 9. सितंबर संकष्टी - विघ्नराज संकष्टी (30 अगस्त 2026, रविवार) - सभी बाधा निवारण हेतु। रूप: विघ्नराज। 10. अक्टूबर संकष्टी - वक्रतुण्ड संकष्टी (29 सितंबर 2026, मंगलवार) - अंगारकी चतुर्थी! वर्ष की सबसे शक्तिशाली संकष्टी (शुभ मास + अंगारकी दिन)। रूप: फिर वक्रतुण्ड। 11. नवंबर संकष्टी - गणाधिप संकष्टी (28 अक्टूबर 2026, बुधवार) - नेतृत्व हेतु। रूप: गणाधिप। 12. दिसंबर संकष्टी - अखुरथ संकष्टी (27 नवंबर 2026, शुक्रवार) - धन हेतु (अखु = चूहा, गणेश का वाहन)। रूप: अखुरथ। नोट: चंद्रोदय समय शहर-दर-शहर भिन्न - अपने स्थानीय समय हेतु पंचांग ऐप जाँचें। सामान्यतः, कृष्ण चतुर्थी पर चंद्रोदय 8 PM से 10 PM के बीच।
सम्पूर्ण व्रत विधि - घंटा दर घंटा
प्रातः (4:30-6:30 AM, ब्रह्म मुहूर्त): 1. सूर्योदय से पहले जागें, ठंडा स्नान। 2. लाल या पीले वस्त्र। 3. संकल्प: 'मैं [नाम], गोत्र [गोत्र], आज [दिनांक], इस संकष्टी चतुर्थी पर [प्रयोजन] हेतु सूर्योदय से चंद्रोदय तक निर्जला/फलाहार व्रत रखता हूँ, गणेश-चंद्र पूजा के बाद ही तोड़ूँगा'। 4. दिन की शुरुआत गणेश प्रार्थना से - 'ॐ गं गणपतये नमः' 21 बार। प्रातः पूजा (6:30-8:00 AM): 5. गणेश वेदी - गणेश मूर्ति/चित्र, लाल/पीले पुष्प, दूर्वा घास (गणेश हेतु अनिवार्य), 21 मोदक (या लड्डू) तैयार भोग, ताज़े फल। 6. घी दीया। 7. गणेश अथर्वशीर्ष या संकष्टी स्तोत्र (8 पंक्तियाँ)। 8. 21 दूर्वा पत्ते अर्पण - गणेश के सबसे महत्वपूर्ण अर्पणों में से एक। दिन भर: 9. यथासंभव मौन रखें - आवश्यकता पर ही बोलें। 10. गणेश पुराण, संकष्टी व्रत कथा पढ़ें। 11. 'ॐ गं गणपतये नमः' निरंतर जपें - 11-21 माला करने का प्रयास। 12. व्रत प्रकार: फलाहार (फल, दूध, सूखे मेवे, कोई अनाज नहीं, कोई नमक नहीं) सबसे सामान्य। कठोर निर्जला (कोई जल नहीं) केवल उन्नत साधकों हेतु। 13. टालें: प्याज, लहसुन, मांसाहार, शराब, क्रोध, झूठ, किसी जीव को हानि। चंद्रोदय - महत्वपूर्ण क्षण: 14. सटीक चंद्रोदय समय हेतु पंचांग जाँचें। 15. चंद्रोदय से लगभग 30 मिनट पहले अंतिम ठंडा स्नान। 16. स्वच्छ वस्त्र, पूर्व-उत्तर मुख बैठें। 17. षोडशोपचार (16 सेवाओं) के साथ पूर्ण गणेश पूजा। 18. जैसे ही चंद्र उगे, चंद्र मंत्र जपते हुए चंद्र को अर्घ्य (जल)। 19. गणेश मूर्ति को चंद्र दिखाएं। 20. फिर व्रत तोड़ें - पहले एक दूर्वा-स्पर्शित मोदक/लड्डू, फिर पूर्ण भोजन। इस पूजा से पहले चंद्र देखने से बचें - परंपरा कहती पूजा से पहले प्रत्यक्ष चंद्र-दर्शन 'कलंक' (झूठा आरोप) लाता - स्यमंतक मणि कथा पर आधारित।
संकष्टी व्रत कथा (कृष्ण व स्यमंतक मणि की कहानी)

बहुत समय पहले, कृष्ण के द्वारका युवावस्था में, सत्राजित (सूर्य भक्त) ने एक उज्ज्वल स्यमंतक मणि प्राप्त की जो दैनिक 8 मण स्वर्ण उत्पन्न करती। कृष्ण ने राजा उग्रसेन को उपहार देने का सुझाव दिया, परन्तु सत्राजित ने इनकार किया, संदेह करते कृष्ण इसे स्वयं के लिए चाहते। जब सत्राजित के भाई प्रसेन ने शिकार हेतु पहनी, सिंह ने उसे मार दिया। सिंह को फिर जाम्बवान (रामायण का भालू, अब गुफा में रहते) ने मारा। सत्राजित ने कृष्ण पर मणि चुराने व भाई को मारने का आरोप लगाया। नाम साफ़ करने हेतु, कृष्ण जाम्बवान की गुफा में प्रवेश, 28 दिनों तक लड़े, और मणि वापस ली। कृष्ण ने जाम्बवान की पुत्री जाम्बवती से विवाह भी किया। द्वारका लौटकर, कृष्ण ने मणि सत्राजित को लौटाई और रखने से इनकार किया। संकष्टी से संबंध: कृष्ण ने गणेश से पूछा कि निर्दोष होने के बावजूद उन पर झूठा आरोप क्यों लगा। गणेश ने प्रकट किया: 'भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी (गणेश चतुर्थी) पर, मैंने शाप दिया कि जो इस दिन चंद्र देखे वह झूठे आरोपों का सामना करेगा। देव भी छूट नहीं'। इस शाप को हटाने हेतु, कृष्ण ने संकष्टी चतुर्थी व्रत रखा - चंद्रोदय तक उपवास, पूर्ण गणेश पूजा, फिर गणेश की छवि के साथ चंद्र देखने के बाद ही व्रत तोड़ा। यह व्रत वर्ष के चंद्र-शाप हटाने हेतु निर्धारित उपाय। व्रत की शक्ति: 1. झूठे आरोप व अपवाद हटाता। 2. प्रतिष्ठा पुनर्स्थापित। 3. खोया धन या संपत्ति वापस लाता। 4. चोरी व छल से सुरक्षा। चंद्रोदय क्यों महत्वपूर्ण: संकष्टी पूजा चंद्र की 'कलंक' (शाप) ऊर्जा को 'कृपा' (आशीर्वाद) ऊर्जा में बदलती, वर्ष भर सुरक्षित चंद्र-दर्शन की अनुमति।
संकष्टी के दौरान जपने हेतु शक्तिशाली मंत्र
1. मूल मंत्र: 'ॐ गं गणपतये नमः' - प्रातः व सायं 108 बार। 2. संकष्टी विशेष: 'ॐ वक्रतुण्डाय हुं' - चंद्रोदय पूजा से पहले बाधा निवारण हेतु 108 बार। 3. संकष्टी स्तोत्र (8 पंक्तियाँ, अति शक्तिशाली): 'प्रणम्य शिरसा देवं गौरीपुत्रं विनायकम्, भक्तावासं स्मरेन्नित्यं आयुष्कामार्थसिद्धये। प्रथमं वक्रतुण्डं च एकदन्तं द्वितीयकम्, तृतीयं कृष्णपिङ्गाक्षं गजवक्त्रं चतुर्थकम्। लम्बोदरं पञ्चमं च षष्ठं विकटमेव च, सप्तमं विघ्नराजं च धूम्रवर्णं तथाष्टमम्। नवमं फालचन्द्रं च दशमं तु विनायकम्, एकादशं गणपतिं द्वादशं तु गजाननम्। द्वादशैतानि नामानि त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नरः, न च विघ्नभयं तस्य सर्वसिद्धिं करावह'। अर्थ: 'गौरी-पुत्र विनायक को सिर झुकाकर प्रणाम, भक्त को (गणेश के 12 नाम) दीर्घायु, सफलता, समृद्धि हेतु दैनिक स्मरण करना चाहिए। 12 नाम: वक्रतुण्ड, एकदन्त, कृष्णपिङ्गाक्ष, गजवक्त्र, लम्बोदर, विकट, विघ्नराज, धूम्रवर्ण, फालचन्द्र, विनायक, गणपति, गजानन। जो तीनों संध्या (प्रातः, दोपहर, सायं) पर इन 12 नामों को पढ़ता उसे कोई बाधा-भय नहीं और सभी सिद्धियाँ मिलती'। 4. अर्घ्य हेतु चंद्र मंत्र: 'ॐ श्रां श्रीं श्रौं सः चन्द्रमसे नमः' - चंद्र को जल अर्पण करते 3 बार। 5. चंद्र दर्शन के बाद: 'ॐ गणेश देवी पुत्राय वक्रतुण्डाय हुं फट् स्वाहा' - समापन हेतु।
पाठकों के प्रश्न
यदि मैं चंद्रोदय खिड़की चूक जाऊँ तो?+
यदि चंद्र नहीं देख सकते (बादल रात, इंडोर), चंद्र फेज ऐप से समय बीतने की पुष्टि करें, फिर चंद्र की कल्पना करते प्रतीकात्मक पूजा। गणेश मूर्ति को चंद्र (ऐप/फोटो) दिखाएं। इस प्रतीकात्मक दर्शन के बाद व्रत तोड़ें। यदि प्रतीकात्मक पूजा भी न कर सकें, व्रत निरर्थक - अगले माह पुनरारंभ। संकल्प टूटता है यदि चंद्र को प्रत्यक्ष या प्रतीकात्मक रूप से देखे बिना खाएं।
क्या गर्भवती महिलाएं संकष्टी व्रत कर सकती हैं?+
केवल संशोधित संस्करण। निर्जला नहीं - माँ व शिशु हेतु खतरनाक। अनुमत: दिन भर जल, हल्के फल, हर 2-3 घंटे दूध। प्रातः पूजा व जप पूर्णतः ठीक। यदि रात देर हो तो चंद्रोदय प्रतीक्षा छोड़ें (गर्भावस्था में नींद उपवास से अधिक महत्वपूर्ण)। अधिकांश प्राचीन ग्रंथ गर्भवती महिलाओं को कठोर व्रत से स्पष्ट छूट देते - गर्भावस्था स्वयं व्रत मानी जाती (जीवन धारण का व्रत)। संशोधित पालन भी पूर्ण पुण्य अर्जित।
गणेश हेतु दूर्वा घास क्यों अनिवार्य है?+
दूर्वा शीतल है, और गणेश को 'पित्त-प्रकोप' मुद्दे हैं (अग्नि-जीभ कथा के कारण ताप-संबंधी)। दूर्वा उन्हें शांत करती। कथा: अनलासुर (अग्नि-राक्षस) ने गणेश को भीतर से जलाकर हराया। ठंडा होने हेतु, गणेश ने 21 ताज़े दूर्वा पत्ते खाए - तत्काल राहत। तब से, हर गणेश पूजा में दूर्वा अनिवार्य, विशेष रूप से संकष्टी। हमेशा 21 ताज़े पत्ते अर्पण (प्रत्येक 3 तने, 3 के 7 सेट)। बासी या सूखी दूर्वा लाभ 70% कम।
क्या अंगारकी संकष्टी वास्तव में 100 गुना अधिक शक्तिशाली है?+
हाँ - स्कंद पुराण व मुद्गल पुराण के अनुसार। कारण: मंगलवार मंगल (अङ्गारक) दिन; संकष्टी के साथ संयुक्त, 'अङ्गारकी योग' बनाता - दुर्लभ ज्योतिषीय संरेखण। वर्ष में एक या दो बार। 2026 में तीन अङ्गारकी संकष्टी (जनवरी, जून, सितंबर) - असाधारण वर्ष। महाराष्ट्र के भक्त इन दिनों सिद्धिविनायक मंदिर (मुंबई) व अष्टविनायक मंदिरों की यात्रा करते, अक्सर रात भर जागते। अङ्गारकी पर किया व्रत 100 संकष्टी के बराबर पुण्य देता।
क्या मैं कथा जाने बिना संकष्टी व्रत कर सकता हूँ?+
हाँ, परन्तु कथा पढ़ना अति अनुशंसित - यह दिन हेतु भाव (भक्ति भावना) निर्धारित करती। दिन भर कथा पढ़ें (प्रातः पूजा व चंद्रोदय के बीच कभी भी)। किसी अन्य से सुनना भी स्वीकार्य। केवल उपवास + चंद्र पूजा बिना कथा 60% पुण्य अर्जित। कथा जोड़ने से 100% तक। कृष्ण-स्यमंतक कथा से परे कई क्षेत्रीय कथाएं - कोई भी गणेश कथा वैध।
About the author
Acharya Vinaya Kapoor · M.A. Sanskrit, Mantra & Stotra Studies
Acharya Vinaya holds an M.A. in Sanskrit from Banaras Hindu University and writes the mantra and stotra commentary on Vandnaa. Her focus is on accurate pronunciation, traditional context, and helping modern readers connect with classical texts.
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