पारण क्या है और समय क्यों महत्वपूर्ण है
पारण (व्रत तोड़ना) केवल 'फिर से खाना' नहीं, बल्कि अपने नियम व समय सहित एक विशिष्ट अनुष्ठान है, जिसे व्रत का उतना ही महत्वपूर्ण भाग माना जाता है जितना उपवास स्वयं।
यह शब्द संस्कृत के 'पोषण' मूल से आया है। मान्यता है कि व्रत दो कृत्यों से घिरा है - आरंभ का संकल्प और समापन का पारण। लापरवाही से या गलत समय पर व्रत तोड़ने से उपवास का पुण्य कम हो सकता है।
सावन सोमवार में अधिकांश भक्त संध्या पूजा तक उपवास रखते हैं, अतः पारण का अर्थ है संध्या अभिषेक व आरती पश्चात मुख्य फलाहारी भोजन करना - निर्जला व्रत की भांति अगले दिन तक प्रतीक्षा आवश्यक नहीं।
समय का महत्व - संध्या पूजा से पहले व्रत तोड़ना उद्देश्य को अधूरा छोड़ता है; गलत ढंग से देर करना शारीरिक कष्ट देता है बिना अतिरिक्त पुण्य के। सही समय व क्रम ही वह भाग है जहां भक्त प्रायः चूक जाते हैं।
सावन सोमवार व्रत तोड़ने का सही समय
सामान्य सावन सोमवार (संध्या को तोड़ा जाने वाला व्रत, निर्जला नहीं) हेतु सही पारण समय सीधा है पर अक्सर जल्दबाज़ी में चूक जाता है।
मूल नियम - पारण संध्या शिव पूजा पूर्ण होने के बाद ही, पहले नहीं। जल-दूध अभिषेक, बेलपत्र अर्पण व आरती पहले पूर्ण हों।
सामान्य समय - सूर्यास्त के आसपास पूजा होने से पारण प्रायः शाम 7 से 9 बजे के बीच होता है। कोई एक निश्चित घड़ी-समय सभी हेतु तय नहीं - क्रम (पहले पूजा, फिर भोजन) ही महत्वपूर्ण है।
कठोर निर्जला सावन सोमवार रखने पर - पारण अगले दिन सूर्योदय पश्चात, पंचांग अनुसार शुभ मुहूर्त में, राहुकाल से बचते हुए करें।
पूजा में देरी हो तो भी क्रम न तोड़ें - पहले भोजन, बाद में पूजा न करें, भले ही पारण देर रात हो जाए।
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व्रत तोड़ते समय पहले क्या खाएं
पारण के पहले कुछ ग्रास का चयन परंपरा व पाचन दोनों दृष्टि से महत्वपूर्ण है।
पारंपरिक प्रथम ग्रास - अधिकांश परिवार प्रसाद से आरंभ करते हैं - पूजा में चढ़ाया गया फल, पंचामृत या भोग सबसे पहले। यह दर्शाता है कि आप पहले ईश्वर को अर्पित वस्तु पुनः प्राप्त कर रहे हैं।
प्रसाद पश्चात हल्का क्रम - घंटों उपवास बाद सीधे भारी, तैलीय भोजन उचित नहीं -
- पहले गुनगुना जल या थोड़ा दूध
- फिर हल्का फल - केला या पपीता
- फिर मुख्य फलाहारी भोजन - साबूदाना खिचड़ी, कुट्टू पराठा आदि
पारण में विशेष रूप से वर्जित -
- खाली पेट चाय-कॉफी से पारण, अम्लता का कारण
- भूख के कारण जल्दी अधिक खा लेना
- शिव व्रत के तुरंत बाद मांसाहार या मदिरा
धीरे, ध्यानपूर्वक खाना पूजा की ही भावना को आगे बढ़ाता है - पारण अनुष्ठान का अंतिम भाग है, सामान्य भोजन नहीं।
वे सामान्य भूलें जो व्रत का पुण्य कम कर देती हैं

पारण चरण में अधिकांश भूलें जल्दबाज़ी या क्रम की जानकारी न होने से होती हैं, भक्ति की कमी से नहीं।
1. पूजा पूर्ण होने से पहले खाना/पीना - सबसे सामान्य भूल। स्वास्थ्य कारण से पहले खाना आवश्यक हो तो यह सचेत निर्णय होना चाहिए, अनजाने में नहीं।
2. प्रसाद छोड़कर सीधे सामान्य भोजन - यह पारण के प्रतीकात्मक अर्थ को छोड़ देता है।
3. फलाहारी व्रत में समय से पहले अनाज खाना - व्रत की सीमा को धुंधला करता है।
4. तुरंत अधिक खा लेना - यह संयम के बजाय अतिरेक की ओर ले जाता है, जबकि व्रत का उद्देश्य संतुलन है।
5. क्रोध, बहस या ध्यान भटकाव में पारण करना - दिनभर की शांत भावना को कमज़ोर करता है।
6. आभार का एक क्षण भी न लेना - बिना कृतज्ञता के सीधे खाना अनुष्ठान का मानसिक समापन छोड़ देता है।
सोमवार अन्य व्रतों से मेल खाए तो विशेष नियम
2026 के सावन कैलेंडर में कुछ तिथियां निकट हैं, जिससे व्रत मेल का प्रश्न उठता है।
एकादशी निकट हो तो - एकादशी का अपना कठोर पारण नियम है, अगली सुबह विशेष मुहूर्त में। सोमवार व एकादशी को अलग-अलग व्रत मानें, प्रत्येक का पारण अपने नियम अनुसार करें।
सावन शिवरात्रि (11 अगस्त, मंगलवार) पर - यदि उसी सप्ताह का सोमवार व्रत (10 अगस्त) भी रखा हो, दोनों को अलग व्रत मानें। शिवरात्रि का पारण चौथे प्रहर पूजा पूर्ण होने पश्चात, प्रायः अगली सुबह होता है - सोमवार से अधिक कठोर व देर से। ध्यान दें, 11 अगस्त इस वर्ष दूसरी मंगला गौरी भी है, अतः वह व्रत रखने वालों को उसका पारण भी अलग से करना चाहिए।
नाग पंचमी सोमवार व्रत के ही दिन पड़े तो - इस वर्ष नाग पंचमी (17 अगस्त) तीसरे सावन सोमवार के ठीक उसी दिन पड़ती है, अतः पारण भी एक ही होगा, दो नहीं - सामान्य संध्या सोमवार नियम अनुसार दोनों पूजा पूर्ण होने पर पारण करें, अलग समायोजन आवश्यक नहीं।
सामान्य सिद्धांत - हर व्रत का अपना संकल्प व पारण होता है - कई व्रतों को मिलाकर एक साथ न तोड़ें, जब तक (इस वर्ष नाग पंचमी व तीसरे सोमवार जैसे) दोनों वास्तव में एक ही तिथि को न पड़ें।
पारण मंत्र और समापन विधि
पारण पर एक संक्षिप्त समापन विधि, हालांकि पूजा जितनी कठोरता से संहिताबद्ध नहीं, फिर भी व्यापक रूप से प्रचलित है।
प्रथम ग्रास से पूर्व - कई भक्त कृतज्ञता की संक्षिप्त प्रार्थना करते हैं। सरल विकल्प चाहने वालों हेतु भोजन से पूर्व तीन बार 'ॐ नमः शिवाय' सहित मौन आभार पर्याप्त माना जाता है।
समापन क्रिया - 1. प्रसाद को माथे या आंखों से स्पर्श कर सम्मान दें। 2. पहले प्रसाद, फिर शेष भोजन खाएं। 3. भोजन बनाने-परोसने वालों का आभार व्यक्त करें। 4. सोलह सोमवार जैसे लंबे संकल्प में, हर सोमवार पर बड़े समारोह की आवश्यकता नहीं - बस मानसिक स्वीकृति; बड़ा समापन उद्यापन पर होता है।
याद रखने योग्य बात - पारण किसी दौड़ का अंतिम बिंदु नहीं। पूजा जैसी ही शांत सजगता के साथ किया गया पारण, पूरे दिन की शिव भक्ति का संतोषजनक समापन बनता है।
लोग सबसे ज़्यादा क्या पूछते हैं
सावन सोमवार व्रत में पारण क्या है?+
पारण व्रत तोड़ने की औपचारिक विधि है, जिसके अपने नियम व समय हैं, केवल दोबारा खाना नहीं। यह प्रातः के संकल्प से खुले व्रत को बंद करता है।
सावन सोमवार व्रत तोड़ने का सही समय क्या है?+
सही नियम क्रम है, निश्चित घड़ी-समय नहीं: पारण संध्या शिव पूजा व आरती पूर्ण होने के बाद ही, प्रायः शाम 7 से 9 बजे के बीच होना चाहिए।
व्रत तोड़ते समय पहले क्या खाना चाहिए?+
पूजा में चढ़ाया प्रसाद पहले खाएं, फिर गुनगुना जल या फल, फिर मुख्य फलाहारी भोजन - सीधे भारी या तीखा भोजन नहीं।
क्या पूजा पूर्ण होने से पहले खाने से व्रत का पुण्य कम हो जाता है?+
हां, परंपरा अनुसार संध्या पूजा व आरती पूर्ण होने से पहले खाना-पीना व्रत को गलत क्रम में तोड़ता है और पुण्य कम करता है, जब तक कोई वास्तविक चिकित्सीय कारण न हो।
सावन सोमवार एकादशी या शिवरात्रि के निकट पड़े तो?+
हर व्रत का अपना संकल्प व पारण है। दोनों को अलग रखें - सोमवार का पारण संध्या को, एकादशी/शिवरात्रि का पारण उनके अपने मुहूर्त अनुसार करें।
क्या व्रत तोड़ने से पहले कोई विशेष मंत्र जपना चाहिए?+
तीन बार सच्चे मन से 'ॐ नमः शिवाय' जपना व एक क्षण आभार व्यक्त करना पर्याप्त माना जाता है। कुछ परिवार प्रथम ग्रास से पूर्व संक्षिप्त संस्कृत श्लोक भी पढ़ते हैं।
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Pandit Mahesh Trivedi · Festival Traditions & Panchang
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