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दशरथ कृत शनि स्तोत्र - बोल और लाभ
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दशरथ कृत शनि स्तोत्र - बोल और लाभ

9 मिनट पढ़ेंप्रकाशित जून 3, 2026
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By Acharya Vinaya Kapoor · M.A. Sanskrit, Mantra & Stotra Studies

Reviewed by Anjali Mehta · Editor, M.A. Religious Studies

दशरथ कृत शनि स्तोत्र क्या है

दशरथ कृत शनि स्तोत्र भगवान शनि (शनि ग्रह) का एक पूज्य स्तोत्र है जिसकी रचना (कृत) भगवान राम के पिता राजा दशरथ ने की। कथा कहती है कि जब शनि कृत्तिका नक्षत्र में ऐसी स्थिति में प्रवेश करने वाले थे जो उनके राज्य में अकाल व कष्ट लाती, तो धर्मात्मा राजा दशरथ ने इस शक्तिशाली प्रार्थना से शनि की उपासना की। उनकी भक्ति व प्रजा के प्रति चिंता से प्रसन्न होकर शनि ने उन्हें राहत का वरदान दिया।

स्तोत्र के पीछे की कथा

परंपरा अनुसार, दशरथ ने अपने ज्योतिषियों से जाना कि शनि का गोचर सूखा व कष्ट लाएगा। ग्रह से लड़ने के बजाय, बुद्धिमान राजा विनम्रता से शनि का सामना करने गए और देवता को उनके अनेक नामों से संबोधित करते हुए यह स्तुति स्तोत्र रचा। दशरथ के अपनी प्रजा के प्रति निःस्वार्थ प्रेम से द्रवित होकर, शनि ने उन्हें आशीर्वाद दिया और वचन दिया कि जो भी इस स्तोत्र का भक्ति से पाठ करेगा उसकी उनके सबसे कठोर कष्टों से रक्षा होगी। इसीलिए यह शनि के कष्टों का एक प्रसिद्ध उपाय है।

प्रारंभिक छंद - लिप्यंतरण और देवनागरी

स्तोत्र शनि की स्तुति उनके नामों व रूपों की एक माला से करता है:

नमः कृष्णाय नीलाय शितिकण्ठनिभाय च। नमः कालाग्निरूपाय कृतान्ताय च वै नमः॥

एक और छंद का उदाहरण:

नमो निर्मांसदेहाय दीर्घश्मश्रुजटाय च। नमो विशालनेत्राय शुष्कोदर-भयानक॥

ये छंद शनि को श्याम वर्ण, नील वर्ण, काल के स्वामी और उग्र रूप के रूप में प्रणाम करते हुए श्रद्धा से उनकी कृपा माँगते हैं।

प्रार्थना का अर्थ

प्रार्थना का अर्थ

यह स्तोत्र भगवान शनि को उनके विभिन्न नामों व गुणों से किए गए *विनम्र प्रणामों (नमः) की एक श्रृंखला है। स्वार्थपूर्वक माँगने के बजाय, दशरथ बार-बार प्रणाम करते हैं, कर्म व काल के न्यायप्रिय स्वामी रूप में शनि की शक्ति को स्वीकार करते हुए। गहरी शिक्षा यह है कि शनि भय या सौदेबाजी से नहीं बल्कि विनम्रता, ईमानदारी व दूसरों की चिंता से प्रसन्न होते हैं*। सम्मान से समर्पण कर भक्त शनि के कठोर अनुशासन को रक्षा व कृपा में बदल देता है।

कैसे और कब पाठ करें

1. शनिवार को स्नान कर स्वच्छ गहरे नीले या काले वस्त्र पहनें; पश्चिम की ओर मुख करें। 2. भगवान शनि के सामने तिल (तिल) के तेल का दीपक जलाएँ और काला तिल, नीले या काले पुष्प व सरसों का तेल अर्पित करें। 3. दशरथ कृत शनि स्तोत्र को विनम्रता से धीरे पढ़ें, साढ़े साती में आदर्श रूप से सात या ग्यारह बार। 4. चाहें तो इसके बाद ॐ शं शनैश्चराय नमः मंत्र का 108 बार जप करें। 5. काला तिल, उड़द दाल, लोहा या तेल जरूरतमंदों को दान कर समापन करें। शनिवार, शनि जयंती व शनि अमावस्या सबसे शक्तिशाली दिन हैं।

शनि स्तोत्र के लाभ

दशरथ कृत शनि स्तोत्र का पाठ साढ़े साती व ढैया में राहत लाता, पीड़ित शनि से उत्पन्न कठिनाइयों को कम करता, और करियर, धन व स्वास्थ्य की बाधाओं को दूर करता माना जाता है। यह धैर्य, साहस और दुर्घटनाओं, ऋणों व कानूनी परेशानियों से रक्षा देता कहा जाता है। चूँकि शनि ईमानदारी व परिश्रम को पुरस्कृत करते हैं, इस स्तोत्र से मिली उनकी कृपा धीमी पर गहरी जड़ों वाली और स्थायी सफलता लाती है।

नियम और याद रखने योग्य बातें

नियम और याद रखने योग्य बातें

सच्ची विनम्रता से पाठ करें, कभी किसी को हानि पहुँचाने हेतु नहीं। शनिवार को गरीबों, वृद्धों, श्रमिकों, कौवों व कुत्तों के प्रति दयालु रहें, जिनकी शनि रक्षा करते हैं। उनके दिन सत्य बोलें और मद्य व मांसाहार से बचें। पीपल वृक्ष के नीचे दीप जलाना और जरूरतमंदों की सेवा इस स्तोत्र के सबसे शक्तिशाली सहारों में माने जाते हैं, अक्सर केवल अनुष्ठान से भी अधिक।

भक्तों के सामान्य प्रश्न

दशरथ कृत शनि स्तोत्र क्या है?+

यह भगवान शनि का स्तोत्र है जिसकी रचना भगवान राम के पिता राजा दशरथ ने अपने राज्य को शनि के कष्ट से बचाने हेतु की। यह शनि के अनेक नामों की स्तुति कर उनकी कृपा व दया माँगता है।

क्या यह स्तोत्र साढ़े साती में सहायक है?+

हाँ। दशरथ कृत शनि स्तोत्र साढ़े साती व ढैया में राहत हेतु पढ़ा जाने वाला एक प्रसिद्ध उपाय है, जो शनि की कठिनाइयों को कोमल करता और कठिन काल में मन को स्थिर करता माना जाता है।

स्तोत्र कैसे आरंभ होता है?+

यह 'नमः कृष्णाय नीलाय' से आरंभ होता है, शनि को श्याम व नील वर्ण, काल के स्वामी रूप में प्रणाम करते हुए। यह स्तोत्र शनि को उनके अनेक नामों से किए गए विनम्र प्रणामों की श्रृंखला है।

शनि स्तोत्र कब पढ़ना चाहिए?+

शनिवार उत्तम हैं, पश्चिम की ओर मुख कर तिल के तेल का दीपक जलाकर। शनि जयंती व शनि अमावस्या सबसे शक्तिशाली दिन हैं, और साढ़े साती में इसे सात या ग्यारह बार पढ़ा जा सकता है।

इस स्तोत्र के क्या लाभ हैं?+

यह साढ़े साती व ढैया में राहत लाता, करियर, धन व स्वास्थ्य की बाधाएँ दूर करता, धैर्य व साहस देता, और दुर्घटनाओं, ऋणों व कानूनी परेशानियों से रक्षा करता माना जाता है।

स्तोत्र के साथ भगवान शनि को कैसे प्रसन्न करें?+

विनम्रता व ईमानदारी से पाठ करें, शनिवार को गरीबों, वृद्धों, कौवों व कुत्तों के प्रति दयालु रहें, पीपल वृक्ष के नीचे दीप जलाएँ, और काला तिल, उड़द दाल, लोहा या तेल जरूरतमंदों को दान करें।

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About the author

Acharya Vinaya Kapoor · M.A. Sanskrit, Mantra & Stotra Studies

Acharya Vinaya holds an M.A. in Sanskrit from Banaras Hindu University and writes the mantra and stotra commentary on Vandnaa. Her focus is on accurate pronunciation, traditional context, and helping modern readers connect with classical texts.

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