शीतला माता कौन हैं
शीतला माता, जिनके नाम का अर्थ है 'शीतल करने वाली', स्वास्थ्य व आरोग्य की मातृ देवी हैं, जिनकी उपासना विशेषकर ज्वर, खसरा, चेचक व अन्य ताप-जनित रोगों से रक्षा हेतु की जाती है। उन्हें गधे पर सवार, झाड़ू, सूप, छोटा कलश और नीम-पत्र धारण किए दर्शाया जाता है - स्वच्छता, शीतलता और रोग-निवारण के प्रतीक। आदि शक्ति का एक रूप, वे उत्तर भारत में बच्चों और पारिवारिक स्वास्थ्य की स्नेहमयी संरक्षिका के रूप में पूजी जाती हैं।
शीतला अष्टमी (बसोड़ा)
शीतला अष्टमी, जिसे बसोड़ा भी कहते हैं, चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को, होली के ठीक बाद आती है। इसकी सबसे अनूठी विशेषता बसोड़ा है - केवल एक दिन पहले बना ठंडा, बासी भोजन खाने की परंपरा - इस दिन रसोई में आग नहीं जलाई जाती। यह ग्रीष्म की ओर ऋतु-परिवर्तन का प्रतीक है, जब सुपाच्य शीतल भोजन स्वास्थ्य की रक्षा करता है, और यह उस देवी का सम्मान करता है जो शरीर को शीतल व रोगमुक्त रखती हैं।
शीतला माता व्रत और पूजा विधि
1. एक रात पहले वह भोग (मीठे चावल, पूरी, हलवा या दही-आधारित व्यंजन) बनाएँ जो अगले दिन ठंडा अर्पित होगा। 2. अष्टमी को जल्दी स्नान करें पर रसोई की आग न जलाएँ। 3. शीतला माता मंदिर जाएँ या घर पर पहले से बने ठंडे भोजन से पूजा करें। 4. ठंडा जल, नीम-पत्र, रोली, चावल और बासी भोग अर्पित करें; दीपक जलाएँ पर ताज़ा भोजन न बनाएँ। 5. शीतला माता कथा सुनें या पढ़ें और आरती करें। 6. देवी की रक्षा हेतु ठंडे प्रसाद का थोड़ा अंश बच्चों पर लगाएँ। स्त्रियाँ यह व्रत विशेषकर अपने बच्चों के स्वास्थ्य व दीर्घायु के लिए रखती हैं।
शीतला माता कथा (संक्षेप में)

एक पुरानी ग्रामीण कथा एक स्त्री की है जिसने अपने पड़ोसियों में अकेले शीतला अष्टमी पर देवी को ठंडे भोग से सम्मानित करने के बजाय ताज़ा गरम भोजन बनाया। उस रात आग या रोग फैला, और केवल वही घर सुरक्षित बचे जिन्होंने बसोड़ा परंपरा निभाई और भक्ति से शीतला माता की पूजा की थी। अपनी भूल समझकर स्त्री ने सच्चे मन से प्रार्थना की, और सदा करुणामयी देवी ने उसके परिवार में शांति व स्वास्थ्य लौटा दिया। कथा श्रद्धा, विनम्रता और देवी के सरल अनुशासन के सम्मान की सीख देती है।
शीतला माता आरती
देवी के सामने दीपक लेकर यह आरती गाएँ:
जय शीतला माता, मैया जय शीतला माता। आदि ज्योति महामाया, सब दुख हरने वाली। रिधि-सिधि दाता मैया, रोग-शोक मिटाने वाली। शरण पड़ी जो तेरी, विपदा मिट जाती।
ज्योति अर्पित करें, फिर परिवार के स्वास्थ्य और बच्चों की रक्षा की प्रार्थना करें।
महत्व और लाभ
शीतला माता की उपासना परिवार को ज्वर, चेचक, त्वचा रोगों व ऋतुजन्य बीमारी से रक्षा करती और बच्चों को स्वास्थ्य व दीर्घायु का आशीर्वाद देती मानी जाती है। भक्ति से परे, बसोड़ा परंपरा में व्यावहारिक ज्ञान है - रसोई को विश्राम देना और ग्रीष्म आरंभ में शीतल, सुपाच्य भोजन करना। यह व्रत श्रद्धा को शरीर की ऋतु-अनुसार देखभाल से जोड़ता है।
लोग सबसे ज़्यादा क्या पूछते हैं
शीतला माता कौन हैं?+
शीतला माता स्वास्थ्य व आरोग्य की मातृ देवी हैं, जिनकी उपासना ज्वर, चेचक, खसरा व अन्य रोगों से रक्षा हेतु की जाती है। वे आदि शक्ति का रूप और बच्चों के स्वास्थ्य की संरक्षिका हैं।
शीतला अष्टमी कब मनाई जाती है?+
शीतला अष्टमी, जिसे बसोड़ा भी कहते हैं, चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को, होली के ठीक बाद, सामान्यतः मार्च या अप्रैल में आती है।
शीतला अष्टमी पर ठंडा, बासी भोजन क्यों खाया जाता है?+
बसोड़ा परंपरा का अर्थ है इस दिन ताज़ा भोजन न बनाना; केवल एक दिन पहले बना भोजन ठंडा खाया जाता है। यह शीतल देवी का सम्मान करता है और ग्रीष्म की ओर ऋतु-परिवर्तन दर्शाता है, जब शीतल, सुपाच्य भोजन स्वास्थ्य की रक्षा करता है।
शीतला माता को क्या अर्पित किया जाता है?+
ठंडा जल, नीम-पत्र, रोली, चावल और एक दिन पहले बना बासी भोग (मीठे चावल, पूरी, हलवा या दही व्यंजन) अर्पित किए जाते हैं। इस दिन ताज़ा गरम भोजन न बनाया न अर्पित किया जाता है।
स्त्रियाँ शीतला माता व्रत क्यों रखती हैं?+
स्त्रियाँ यह व्रत विशेषकर अपने बच्चों के स्वास्थ्य व दीर्घायु के लिए रखती हैं, शीतला माता से रोगों से रक्षा और परिवार के समग्र कल्याण की प्रार्थना करते हुए।
शीतला माता कथा क्या सिखाती है?+
कथा श्रद्धा, विनम्रता और देवी के सरल अनुशासन के सम्मान की सीख देती है। यह बताती है कि कैसे भक्ति से बसोड़ा परंपरा निभाने वाले परिवार सुरक्षित रहे, जबकि उपेक्षा कष्ट लाई जब तक सच्ची प्रार्थना ने शांति न लौटाई।
About the author
Acharya Vinaya Kapoor · M.A. Sanskrit, Mantra & Stotra Studies
Acharya Vinaya holds an M.A. in Sanskrit from Banaras Hindu University and writes the mantra and stotra commentary on Vandnaa. Her focus is on accurate pronunciation, traditional context, and helping modern readers connect with classical texts.
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