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श्री सूक्तम्: लक्ष्मी को समर्पित वैदिक स्तुति - पाठ, अर्थ और लाभ
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श्री सूक्तम्: लक्ष्मी को समर्पित वैदिक स्तुति - पाठ, अर्थ और लाभ

8 मिनट पढ़ेंप्रकाशित जून 23, 2026
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By Acharya Vinaya Kapoor · M.A. Sanskrit, Mantra & Stotra Studies

Reviewed by Anjali Mehta · Editor, M.A. Religious Studies

श्री सूक्तम् क्या है?

श्री सूक्तम् देवी महालक्ष्मी को समर्पित सर्वाधिक पूजनीय स्तुतियों में से एक है, जो धन, समृद्धि और मंगल की देवी हैं। यह ऋग्वेद के साथ जुड़ी (खिल भाग) एक प्राचीन स्तुति है और सम्पूर्ण भारत में समृद्धि के आह्वान हेतु पढ़ी जाती है - केवल धन ही नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, अन्न, गौ, यश, सौंदर्य और आध्यात्मिक संपन्नता।

यह स्तुति लक्ष्मी को श्री के रूप में संबोधित करती है - सौभाग्य की तेजोमयी शक्ति - और अग्निदेव से उनकी उपस्थिति के आह्वान की प्रार्थना करती है। प्रत्येक मंत्र उन्हें स्वर्णमयी, कमलासना और सदा देने वाली के रूप में चित्रित करता है। वैदिक होने के कारण श्री सूक्तम् को विशेष आदर प्राप्त है और यह लक्ष्मी पूजा, दीवाली, नवरात्रि और शुक्रवार की उपासना का मुख्य अंग है।

अर्थ सहित आरंभिक मंत्र

मंत्र 1:

हिरण्यवर्णां हरिणीं सुवर्णरजतस्रजाम्। चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आ वह॥

हिरण्यवर्णां हरिणीं सुवर्णरजतस्रजाम्, चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आ वह।

अर्थ: हे अग्नि (जातवेद), मेरे लिए उस लक्ष्मी का आह्वान करें जो स्वर्ण के समान वर्ण वाली, स्वर्ण और रजत की मालाओं से सुशोभित, चंद्रमा सी उज्ज्वल और स्वर्ण सी देदीप्यमान हैं।

मंत्र 2:

तां म आ वह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम्। यस्यां हिरण्यं विन्देयं गामश्वं पुरुषानहम्॥

तां म आ वह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम्, यस्यां हिरण्यं विन्देयं गामश्वं पुरुषानहम्।

अर्थ: हे अग्नि, मेरे लिए उस लक्ष्मी को लाएँ जो कभी नहीं जातीं, जिनकी कृपा से मुझे स्वर्ण, गौ, अश्व और परिवार प्राप्त हो।

एक प्रिय परवर्ती मंत्र:

ॐ श्रीर्वर्चस्वमायुष्यमारोग्यमाविधात् पवमानं महीयते। धनं धान्यं पशुं बहुपुत्रलाभं शतसंवत्सरं दीर्घमायुः॥

अर्थ: देवी तेज, दीर्घ आयु, आरोग्य, धन, धान्य, पशु, संतान का सौभाग्य और सौ वर्षों की लंबी आयु प्रदान करें।

श्री सूक्तम् पाठ के लाभ

  • धन और समृद्धि: यह स्थिर, धर्ममय धन हेतु लक्ष्मी की कृपा पाने की सर्वप्रमुख वैदिक प्रार्थना है।
  • अलक्ष्मी का निवारण: एक प्रमुख मंत्र देवी से दरिद्रता, दुर्भाग्य और अमंगल (अलक्ष्मी) को घर से दूर करने की प्रार्थना करता है।
  • स्वास्थ्य और दीर्घायु: यह स्तुति स्पष्ट रूप से आरोग्य और लंबी, परिपूर्ण आयु माँगती है।
  • धन से परे समृद्धि: यह अन्न, गौ, संतान, यश, सौंदर्य और संतोष का आशीर्वाद देती है - समृद्धि की सम्पूर्ण कल्पना।
  • आध्यात्मिक संपन्नता: यहाँ लक्ष्मी केवल भौतिक नहीं हैं; वे मंगल स्वरूपा हैं, मन को शुद्ध कर सात्विक सौभाग्य का आह्वान करती हैं।

नियमित पाठ से आर्थिक स्थिरता, घर में सामंजस्य और ऐसी कृतज्ञता आती है जो धन को दुरुपयोग से बचाती है, ऐसा माना जाता है।

श्री सूक्तम् कैसे पढ़ें (विधि)

श्री सूक्तम् कैसे पढ़ें (विधि)

1. समय: स्नान के बाद प्रातः, या शुक्रवार, दीवाली और नवरात्रि में। प्रातः और संध्या श्रेष्ठ हैं। 2. आसन और दिशा: स्वच्छ आसन पर महालक्ष्मी के चित्र के समक्ष पूर्व या उत्तर मुख होकर बैठें। 3. तैयारी: घी का दीप जलाएँ, लाल या कमल पुष्प, कुमकुम और थोड़ी खीर या मिठाई अर्पित करें। स्वच्छ, शांत स्थान देवी को प्रिय है। 4. संकल्प: एक क्षण संकल्प लें, केवल धन नहीं बल्कि उसे सद्उपयोग करने की कृपा माँगते हुए। 5. पाठ: मंत्रों को स्पष्ट और भाव सहित पढ़ें। परंपरागत रूप से इसे धूप अर्पित करते हुए या प्रत्येक मंत्र के साथ हवन करते हुए पढ़ा जाता है। 6. आवृत्ति: प्रतिदिन एक बार उत्तम है; बहुत लोग शुक्रवार को इसे 3 या 9 बार पढ़ते हैं। लक्ष्मी आरती से समापन कर प्रसाद बाँटें।

वैदिक उच्चारण में शुद्धता महत्वपूर्ण है, इसलिए किसी ऑडियो गाइड या गुरु से सीखना श्रेयस्कर है।

भक्तों के सामान्य प्रश्न

श्री सूक्तम् किसलिए है?+

श्री सूक्तम् देवी महालक्ष्मी को समर्पित वैदिक स्तुति है जो सम्पूर्ण समृद्धि - धन, अन्न, स्वास्थ्य, संतान, यश और मंगल - के आह्वान और दरिद्रता तथा दुर्भाग्य को दूर करने हेतु है।

क्या श्री सूक्तम् वेदों से है?+

हाँ। श्री सूक्तम् ऋग्वेद के साथ जुड़ी (इसके खिल या परिशिष्ट भाग की) एक प्राचीन स्तुति है, इसीलिए इसे विशेष वैदिक आदर प्राप्त है और औपचारिक लक्ष्मी पूजा में पढ़ी जाती है।

श्री सूक्तम् कब पढ़ना चाहिए?+

इसे स्नान के बाद प्रातः पढ़ना श्रेष्ठ है, और विशेषकर शुक्रवार, नवरात्रि तथा दीवाली पर। प्रातः और संध्या लक्ष्मी पूजा के लिए सर्वाधिक शुभ समय माने जाते हैं।

श्री सूक्तम् में वर्णित लक्ष्मी कौन हैं?+

वे श्री-महालक्ष्मी हैं, जिन्हें स्वर्णवर्णा, चंद्र सी तेजोमयी, कमलासना और स्वर्ण-रजत से सुशोभित बताया गया है। स्तुति अग्नि से उन्हें सदा उपस्थित सौभाग्य दात्री के रूप में आह्वान करने को कहती है।

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About the author

Acharya Vinaya Kapoor · M.A. Sanskrit, Mantra & Stotra Studies

Acharya Vinaya holds an M.A. in Sanskrit from Banaras Hindu University and writes the mantra and stotra commentary on Vandnaa. Her focus is on accurate pronunciation, traditional context, and helping modern readers connect with classical texts.

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