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विषु 2027 - केरल का नव वर्ष, विषुक्कणी और विषुक्कैनीट्टम
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विषु 2027 - केरल का नव वर्ष, विषुक्कणी और विषुक्कैनीट्टम

9 मिनट पढ़ेंप्रकाशित जून 10, 2026
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By Pandit Mahesh Trivedi · Festival Traditions & Panchang

Reviewed by Dr. Suresh Iyer · Vastu Shastra & Jyotish, 18+ years

विषु क्या है?

विषु केरल का पारंपरिक नव वर्ष है, जो मेष संक्रांति को मनाया जाता है - जब सूर्य सौर पंचांग के अनुसार मेष राशि में प्रवेश करते हैं। यह हर वर्ष लगभग अप्रैल के मध्य में पड़ता है, और विषु 2027 भी इसी अवधि में आएगा। सटीक दिन वंदना पंचांग पर देखें। विषु शब्द संस्कृत के विषुवम् से बना है, जिसका अर्थ है समान - उस समय की स्मृति जब यह पर्व विषुव से जुड़ा था, जब दिन और रात संतुलन में होते हैं। मलयाली समाज के लिए विषु कृषि नव वर्ष है - बुवाई और आशा के नए चक्र का आरंभ। पर सबसे बढ़कर यह कृष्ण भक्ति का पर्व है: पूरा दिन इस प्रकार रचा गया है कि नए वर्ष में आपकी आंखें सबसे पहले स्वर्णिम समृद्धि से घिरे भगवान कृष्ण के मुख पर पड़ें। केरल की मान्यता है - जैसा आरंभ, वैसा पूरा वर्ष।

विषु 2027 - समय और संक्रांति से संबंध

चैत्र के चंद्र पर्वों के विपरीत विषु सौर पंचांग का अनुसरण करता है: यह मलयालम मास मेडम के पहले दिन पड़ता है, जब सूर्य मेष राशि में संक्रमण करते हैं। यही मेष संक्रांति पूरे भारत में अलग-अलग नामों से मनाई जाती है, जो लगभग 14-15 अप्रैल के आसपास आती है - हालांकि 2027 का सटीक दिन और शुभ कणी दर्शन समय वंदना पंचांग पर अवश्य देखें। विषु का सबसे महत्वपूर्ण समय है विषु प्रातः का ब्रह्म मुहूर्त, लगभग 4 से 6 बजे के बीच, जब विषुक्कणी के दर्शन होते हैं। कणी पिछली रात सजाई जाती है - प्रायः घर की माता या सबसे बड़ी महिला द्वारा, पूजा कक्ष में दीपक के सामने। केरल भर के मंदिर, जिनमें गुरुवायुर और सबरीमला प्रमुख हैं, इन्हीं पवित्र भोर की घड़ियों में कणी दर्शन खोलते हैं, जहां मध्यरात्रि से पंक्तियां लग जाती हैं।

विषुक्कणी - वस्तुओं की पूरी सूची

कणी का अर्थ है 'जो सबसे पहले देखा जाए', और विषुक्कणी शुभता का सुविचारित दृश्य है। पारंपरिक वस्तुएं हैं: 1. भगवान कृष्ण की मूर्ति या चित्र (प्रायः बालगोपाल या गुरुवायुरप्पन रूप में) 2. उरुली - कांसे का चौड़ा पात्र जिसमें पूरी सजावट होती है 3. कोन्ना के फूल (अमलतास, स्वर्ण वर्षा) - केरल का सुनहरा विषु पुष्प 4. कच्चे चावल और धान - वर्ष भर की अन्न-समृद्धि 5. सुनहरी ककड़ी (कणी वेल्लरी), नारियल, कटहल, आम और केला - ऋतु की फसल 6. स्वर्ण आभूषण और सिक्के या मुद्रा - धन और लक्ष्मी कृपा 7. तहों में सजा कसावु मुंडु (क्रीम और स्वर्णिम वस्त्र) 8. वाल-कन्नाडी - पारंपरिक हस्त दर्पण 9. निलाविलक्कु - प्रज्वलित कांस्य दीप 10. भगवद्गीता जैसा पवित्र ग्रंथ पान के पत्ते, सुपारी, तेल के दीपों सहित नारियल के आधे भाग और कुमकुम-चंदन कणी को पूर्ण करते हैं।

विषुक्कणी कैसे सजाएं और देखें

विषुक्कणी कैसे सजाएं और देखें

कणी विषु की पूर्व संध्या को सूर्यास्त के बाद सजाएं, संभव हो तो पूर्वमुखी पूजा कक्ष में। कृष्ण को केंद्र में सबसे ऊंचे स्थान पर रखें, उनके सामने चावल भरी उरुली, फिर उसके चारों ओर सब्जियां, फल, स्वर्ण, वस्त्र और दर्पण सजाएं, और सब पर कोन्ना के फूल उदारता से बिखेरें - कहते हैं उनका सोना कृष्ण का अपना रंग है। दर्शन से ठीक पहले निलाविलक्कु प्रज्वलित करें। विषु की भोर में घर का सबसे बड़ा सदस्य ब्रह्म मुहूर्त में उठकर पहले स्वयं कणी देखता है, फिर हर सदस्य को - आंखें बंद कराकर - बिस्तर से पूजा कक्ष तक लाता है, और आंखें केवल कणी के सामने खुलती हैं। सजावट में रखे दर्पण का अर्थ सबसे सुंदर है: कृष्ण और स्वर्णिम समृद्धि को निहारते हुए आप उनके बीच अपना मुख भी देखते हैं - यह कोमल शिक्षा कि इस शुभता में आप भी सम्मिलित हैं, जिस दिव्य समृद्धि को आप खोजते हैं उसमें आप पहले से विद्यमान हैं। बाद में कणी घर के पशुओं और वृक्षों को भी दिखाई जाती है।

विषुक्कैनीट्टम और विषु सद्या

कणी दर्शन के बाद आता है विषुक्कैनीट्टम - देकर आशीर्वाद देने की केरल की कोमल परंपरा। बड़े-बुजुर्ग बच्चों और छोटे सदस्यों की हथेलियों में सिक्के या नोट रखते हैं - और कई घरों में सहायकों व पड़ोसियों के हाथों में भी - वर्ष के पहले दान के रूप में। शिक्षा सरल और गहरी है: वर्ष का आरंभ पाने से नहीं, देने से कीजिए, और समृद्धि खुले हाथों से बहती रहेगी। बच्चे अपने कैनीट्टम की उत्सुकता से प्रतीक्षा करते हैं और प्रायः सिक्कों को कृष्ण के आशीर्वाद रूप में संजोते हैं। कई घरों में पटाखे (विषु पडक्कम) भोर का स्वागत करते हैं। फिर आती है विषु सद्या - केले के पत्ते पर उत्सव भोज, जिसमें ऋतु के व्यंजन होते हैं: विषु कंजी (चावल का पेय), थोरन, मांपष़ा पुलिसेरी (पके आम की कढ़ी), विषु कट्टा (चावल-नारियल दूध की मिठाई) और पायसम। सद्या छहों रसों को संतुलित करती है - मधुर, अम्ल, लवण, तिक्त, कटु, कषाय - यह स्मरण कराते हुए कि नया वर्ष, सामने रखे पत्ते की तरह, जीवन का हर स्वाद लेकर आएगा।

विषु पर गुरुवायुर की कृष्ण भक्ति

विषु के कृष्णमय हृदय को कोई स्थान गुरुवायुर श्रीकृष्ण मंदिर जैसा व्यक्त नहीं करता - केरल का भूलोक वैकुंठ। विषु पर लाखों भक्त गुरुवायुरप्पन के विषुक्कणी दर्शन के लिए पिछली रात से पंक्ति में लगते हैं, जब स्वयं प्रभु ही कणी बन जाते हैं - स्वर्ण से अलंकृत, कोन्ना पुष्पों, फलों के ढेर, अन्न और जगमगाते दीपों से घिरे। भक्तों की मान्यता है कि वर्ष का आरंभ गुरुवायुरप्पन के मुख-दर्शन से करने पर आने वाले बारहों महीनों पर उनकी कृपा बनी रहती है। मंदिर की कणी वस्तुएं बाद में वितरित होती हैं, और दिन विशेष पूजाओं तथा नारायणीयम् के पाठ से चलता रहता है - वह प्रिय स्तोत्र जो मेल्पत्तूर नारायण भट्टतिरि ने इसी मंदिर में रचा था। जो परिवार गुरुवायुर नहीं पहुंच पाते, वे घर की कणी में गुरुवायुरप्पन का चित्र रखकर भाव से मंदिर से जुड़ जाते हैं। सबरीमला में भी भगवान अय्यप्पा की प्रसिद्ध विषुक्कणी होती है, और पूरे केरल का हर मंदिर भोर से पहले जगमगा उठता है।

क्षेत्रीय समानताएं - एक सूर्य, अनेक नव वर्ष

क्षेत्रीय समानताएं - एक सूर्य, अनेक नव वर्ष

विषु अप्रैल मध्य में पूरे भारत में मनाए जाने वाले सौर नव वर्ष उत्सवों के सुंदर परिवार का अंग है, जो सभी उसी मेष संक्रांति से जुड़े हैं: 1. पुत्तांडु (तमिलनाडु): तमिल नव वर्ष, जहां परिवार कणी जैसी ही फल, स्वर्ण और दर्पण की शुभ थाली देखते हैं और मीठी-खट्टी-कड़वी आम पचड़ी बांटते हैं 2. बोहाग बिहू (असम): भोज, बिहू नृत्य और गोधन-सम्मान का आनंदमय रोंगाली बिहू, जिससे असमिया वर्ष खुलता है 3. पोहेला बोइशाख (बंगाल): नए बही-खातों (हाल खाता), मिठाइयों और एशो हे बोइशाख गीतों का बंगाली नव वर्ष पंजाब की बैसाखी और ओडिशा की पना संक्रांति भी इसी समवेत स्वर में सम्मिलित हैं। शिक्षा हृदयस्पर्शी है: एक सूर्य आकाश में एक बिंदु पार करता है, और दर्जन भर संस्कृतियां उसका स्वागत अपनी भाषा, अपनी मिठाइयों और अपने गीतों से करती हैं - नदियां अनेक, कृतज्ञता का सागर एक। विषु उसी साझे स्तोत्र में केरल का स्वर्णिम छंद है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

विषु 2027 कब है?+

विषु मेष संक्रांति को पड़ता है - जब सूर्य मेष राशि में प्रवेश करते हैं, जो मलयालम मास मेडम का पहला दिन है। यह हर वर्ष लगभग अप्रैल मध्य में आता है, और विषु 2027 भी इसी अवधि में पड़ेगा। सटीक तारीख और शुभ कणी दर्शन समय वंदना पंचांग पर देखें।

विषुक्कणी के लिए कौन सी वस्तुएं चाहिए?+

आवश्यक वस्तुएं हैं: कृष्ण मूर्ति या चित्र, कच्चे चावल भरी उरुली, कोन्ना (अमलतास) के फूल, सुनहरी ककड़ी, नारियल, कटहल, आम और केला, स्वर्ण आभूषण, सिक्के या मुद्रा, कसावु मुंडु वस्त्र, वाल-कन्नाडी दर्पण, प्रज्वलित निलाविलक्कु दीप और भगवद्गीता जैसा पवित्र ग्रंथ - पान के पत्तों और सुपारी सहित।

विषुक्कणी में दर्पण क्यों रखा जाता है?+

वाल-कन्नाडी दर्पण कणी की सबसे सुंदर शिक्षा है: स्वर्णिम समृद्धि से घिरे कृष्ण को निहारते हुए आप सजावट के भीतर अपना मुख भी देखते हैं। यह कोमलता से याद दिलाता है कि इस शुभता में आप भी सम्मिलित हैं - जिस दिव्य समृद्धि की आप प्रार्थना करते हैं, उसमें आप पहले से हैं, और नव वर्ष का आशीर्वाद भीतर से आरंभ होता है।

विषुक्कैनीट्टम क्या है?+

विषुक्कैनीट्टम विषु की वह परंपरा है जिसमें बड़े-बुजुर्ग बच्चों, छोटे सदस्यों और प्रायः सहायकों व पड़ोसियों की हथेलियों में सिक्के या धन रखते हैं - वर्ष के पहले दान के रूप में। यह सिखाता है कि वर्ष का आरंभ संग्रह से नहीं, उदारता से हो, ताकि समृद्धि खुले हाथों से बहती रहे।

गुरुवायुर मंदिर में विषु की क्या विशेषता है?+

गुरुवायुर में स्वयं भगवान गुरुवायुरप्पन विषुक्कणी बन जाते हैं - कोन्ना पुष्पों, फलों, अन्न और दीपों के बीच स्वर्ण से अलंकृत। लाखों भक्त इस भोर-पूर्व दर्शन के लिए पिछली रात से पंक्ति लगाते हैं, इस विश्वास से कि वर्ष का आरंभ प्रभु के मुख-दर्शन से होने पर बारहों महीने उनकी कृपा बनी रहती है। दिन विशेष पूजाओं और नारायणीयम् पाठ से चलता है।

विषु का पुत्तांडु, बोहाग बिहू और पोहेला बोइशाख से क्या संबंध है?+

चारों अप्रैल मध्य की मेष संक्रांति से जुड़े सौर नव वर्ष उत्सव हैं। पुत्तांडु तमिल नव वर्ष है जिसकी अपनी शुभ प्रथम-दर्शन थाली होती है, बोहाग बिहू भोज और बिहू नृत्य से असमिया वर्ष खोलता है, और पोहेला बोइशाख नए बही-खातों व मिठाइयों से बंगाली वर्ष आरंभ करता है। विषु उसी साझे सौर क्षण की केरल की अभिव्यक्ति है।

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Pandit Mahesh Trivedi · Festival Traditions & Panchang

Pandit Mahesh leads the festival-date and Panchang content on Vandnaa. He cross-references multiple regional panchangs (Drik, Vaishnava, Bengali, Marathi) for every festival date published on the site.

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