देव और उनका खड़ा रूप
विट्ठल, जिन्हें विठोबा या पांडुरंग भी कहते हैं, भगवान कृष्ण (विष्णु) का रूप हैं जो ईंट पर दोनों हाथ कमर पर रखे खड़े हैं। यह सरल, प्रतीक्षा-मुद्रा प्रभु के अपने भक्त पुंडलिक हेतु धैर्य से खड़े होने को दर्शाती मानी जाती है। श्याम वर्ण व मुकुटधारी, वे जनसाधारण की भक्ति के स्वामी हैं, जिन तक विस्तृत अनुष्ठान से नहीं बल्कि प्रेम, गीत व शुद्ध हृदय से पहुँचा जाता है। उनकी संगिनी रुक्मिणी (रखुमाई) उनके पास पूजी जाती हैं।
स्थान और पुंडलिक की कथा
मंदिर महाराष्ट्र के सोलापुर जिले में पंढरपुर में, चंद्रभागा (भीमा) नदी के तट पर स्थित है। प्रसिद्ध कथा पुंडलिक की है, जो अपने वृद्ध माता-पिता की सेवा में इतना लीन था कि जब भगवान कृष्ण उसे आशीर्वाद देने आए, उसने प्रभु के खड़े होने हेतु एक ईंट फेंकी और प्रतीक्षा करने को कहा। माता-पिता के प्रति ऐसी भक्ति से प्रसन्न होकर प्रभु प्रसन्नता से ईंट पर खड़े हो गए, और आज तक विट्ठल रूप में वहीं हैं, निःस्वार्थ सेवा का सम्मान करते हुए।
वारकरी परंपरा
विठोबा वारकरी आंदोलन के प्रिय देव हैं, जो सदियों पुराना भक्ति-मार्ग है, जिसे ज्ञानेश्वर, नामदेव, एकनाथ और तुकाराम जैसे संतों ने गढ़ा। वारकरी प्रभु की पादुका (खड़ाऊँ) पालकी (पालखी) में ले जाते और अभंग (भक्ति गीत) गाते व उनका नाम जपते सैकड़ों किलोमीटर चलते हैं। परंपरा समानता, सादा जीवन, शाकाहार और जाति या धन से परे सबके लिए खुली भक्ति पर बल देती है, जिससे विठोबा जनता के स्वामी बनते हैं।
दर्शन समय और सुझाव

मंदिर सामान्यतः भोर से पहले लगभग 4 बजे काकड़ आरती से खुलता है और रात्रि की शेज आरती तक, लगभग 11 बजे तक, निश्चित समयों पर आरतियों के साथ खुला रहता है। एक विशेषता यह है कि भक्तों को परंपरागत रूप से प्रभु के चरण स्पर्श (पाद-स्पर्श दर्शन) की अनुमति है।
सुझाव: 1. दर्शन से पहले चंद्रभागा नदी में पवित्र स्नान करें। 2. एकादशी के दिनों में अत्यधिक भीड़ की अपेक्षा रखें। 3. चरण स्पर्श चाहें तो पाद-स्पर्श पंक्ति चुनें। 4. सरल व सम्मानपूर्वक वस्त्र पहनें। 5. विट्ठल के साथ रुक्मिणी का दर्शन भी करें।
जप के लिए एक मंत्र
वारकरी निरंतर प्रभु के आनंदमय नाम का जप करते हैं:
विट्ठल विट्ठल, जय हरि विट्ठल
पंढरपुर का महान जप है:
जय जय राम कृष्ण हरि
नाम को साँस पर बहने दें जैसे वारकरी करते हैं, गिनती के बजाय प्रेम और गाते हृदय के साथ।
पर्व और आषाढ़ी वारी
सबसे बड़ा आयोजन आषाढ़ी एकादशी वारी है, जब लाखों वारकरी आलंदी व देहू जैसे स्थानों से दिनों चलकर पंढरपुर पहुँचते हैं, आषाढ़ी एकादशी (जून-जुलाई) को, जो विश्व की सबसे बड़ी यात्राओं में से एक है। कार्तिकी एकादशी शरद में एक और भव्य वारी लाती है। जन्माष्टमी और संतों की पुण्यतिथियाँ भी मनाई जाती हैं। गाते तीर्थयात्रियों और भगवा ध्वजों से भरे नदी तट का दृश्य अविस्मरणीय है।
भक्तों के सामान्य प्रश्न
विट्ठल या विठोबा कौन हैं?+
विट्ठल, जिन्हें विठोबा या पांडुरंग भी कहते हैं, भगवान कृष्ण का रूप हैं जो ईंट पर कमर पर हाथ रखे खड़े हैं। वे पंढरपुर और वारकरी परंपरा के प्रिय देव हैं।
विट्ठल ईंट पर क्यों खड़े हैं?+
जब कृष्ण अपने माता-पिता की सेवा कर रहे भक्त पुंडलिक को आशीर्वाद देने आए, पुंडलिक ने प्रभु को प्रतीक्षा हेतु ईंट फेंकी। उसकी भक्ति से प्रसन्न प्रभु वहीं खड़े हो गए और विट्ठल बने रहे।
वारकरी परंपरा क्या है?+
वारकरी आंदोलन विठोबा की भक्ति का सदियों पुराना महाराष्ट्रीय मार्ग है, जिसे तुकाराम व ज्ञानेश्वर जैसे संतों ने गढ़ा। यह समानता, सादा जीवन और सबके लिए खुली भक्ति पर बल देता है।
आषाढ़ी वारी क्या है?+
आषाढ़ी वारी एक विशाल तीर्थयात्रा है जिसमें लाखों वारकरी दिनों चलकर पंढरपुर पहुँचते हैं, जून-जुलाई में आषाढ़ी एकादशी को। यह विश्व की सबसे बड़ी यात्राओं में से एक है।
विठोबा भक्त कौन सा मंत्र जपते हैं?+
वारकरी 'विट्ठल विट्ठल, जय हरि विट्ठल' और पंढरपुर का महान जप 'जय जय राम कृष्ण हरि' जपते हैं, नाम को गिनती के बजाय प्रेम के साथ बहने देते हुए।
क्या भक्त विट्ठल के चरण स्पर्श कर सकते हैं?+
हाँ। पंढरपुर की एक विशेषता यह है कि भक्तों को परंपरागत रूप से पाद-स्पर्श दर्शन, प्रभु के चरण स्पर्श की अनुमति है। इस दर्शन हेतु सामान्यतः अलग पंक्ति होती है।
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Pandit Mahesh Trivedi · Festival Traditions & Panchang
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