देव और उनका गोवर्धन रूप
श्रीनाथजी लगभग सात वर्ष की आयु के भगवान कृष्ण हैं, जिनका बायाँ हाथ उठा है मानो गोवर्धन पर्वत उठा रहे हों, दूसरा हाथ कमर पर टिका है। देव स्वयंभू (स्वयं प्रकट) हैं, एक ही काले पत्थर से उकेरे गए, और उस लीला का स्मरण कराते हैं जिसमें बाल कृष्ण ने इंद्र की वर्षा से वृंदावन की रक्षा हेतु गोवर्धन को छोटी उँगली पर उठाया। उनकी सेवा दूर की मूर्ति के बजाय जीवंत शिशु के रूप में प्रेम से होती है, जो पुष्टिमार्ग का केंद्र है।
स्थान और गोवर्धन से यात्रा
मंदिर नाथद्वारा में, उदयपुर से लगभग 48 किमी दूर राजस्थान में, बनास नदी के तट पर स्थित है। देव पहले मथुरा के निकट गोवर्धन पर्वत पर प्रकट हुए और वहाँ सदियों पूजे गए। 17वीं शताब्दी में औरंगज़ेब के काल में मूर्ति की रक्षा हेतु इसे मेवाड़ ले जाया गया, जहाँ राजा राणा राज सिंह ने शरण दी। जहाँ रथ का पहिया भूमि में धँस गया, वहीं मंदिर स्थापित हुआ, और नगर नाथद्वारा - प्रभु का द्वार - कहलाया।
पुष्टिमार्ग और आठ दर्शन
श्रीनाथजी श्री वल्लभाचार्य द्वारा स्थापित पुष्टिमार्ग (अनुग्रह का मार्ग) के प्रमुख देव हैं, जहाँ उपासना प्रभु की प्रिय शिशु रूप में प्रेममयी सेवा है। प्रतिदिन देव के आठ दर्शन (अष्टयाम सेवा) होते हैं: मंगला, शृंगार, ग्वाल, राजभोग, उत्थापन, भोग, संध्या आरती और शयन। प्रत्येक दर्शन का अपना वस्त्र, आभूषण, भोग व संगीत होता है, जो समय व ऋतु के साथ बदलता है, ताकि भक्त प्रभु की जागरण से शयन तक की दिनचर्या का अनुभव करें।
दर्शन समय और सुझाव

आठ दर्शन दिनभर फैले रहते हैं, प्रातः के मंगला से रात्रि के शयन तक, प्रत्येक की केवल कुछ मिनटों की छोटी झाँकी और बीच में विराम के साथ। ठीक समय ऋतु व पर्वों से बदलता है।
सुझाव: 1. पहुँचते ही दिन की दर्शन सूची देखें, क्योंकि समय अक्सर बदलता है। 2. प्रत्येक दर्शन हेतु जल्दी पहुँचें, क्योंकि झाँकी छोटी होती है। 3. भीतर फोटोग्राफी वर्जित है, अतः फोन दूर रखें। 4. साधारण वस्त्र पहनें और प्रवेश से पहले चमड़े की वस्तुएँ हटा दें। 5. सबसे सुंदर झाँकियों हेतु मंगला या शृंगार दर्शन में सम्मिलित हों।
जप के लिए एक मंत्र
पुष्टिमार्गी भक्त वल्लभाचार्य के मूल मंत्र का अभिवादन व जप करते हैं:
श्री कृष्णः शरणं मम ('भगवान कृष्ण ही मेरी एकमात्र शरण हैं।')
आप प्रेम से यह भी पुकार सकते हैं:
श्री गोवर्धननाथजी की जय
श्रीनाथजी के उठे हुए हाथ का स्मरण करते हुए, जो हर शरणागत की रक्षा करता है, इसे धीरे दोहराएँ।
यहाँ मनाए जाने वाले पर्व
नाथद्वारा पुष्टिमार्ग पंचांग को भव्यता से मनाता है। दिवाली के अगले दिन अन्नकूट (गोवर्धन पूजा) सबसे भव्य है, जब गोवर्धन उठाने के स्मरण में भोजन के पर्वत अर्पित होते हैं। जन्माष्टमी, रंगों भरी होली और वर्षा ऋतु का हिंडोला (झूला) पर्व विशेष प्रिय हैं। प्रत्येक पर्व पर देव के वस्त्र, आभूषण व पिछवाई चित्र बदलते हैं, जिससे हर दर्शन एक नया, जीवंत उत्सव बन जाता है।
पाठकों के प्रश्न
श्रीनाथजी कौन हैं?+
श्रीनाथजी लगभग सात वर्ष की आयु के भगवान कृष्ण हैं, जो उठे हुए बाएँ हाथ से गोवर्धन पर्वत उठाते दर्शाए जाते हैं। वे नाथद्वारा में पुष्टिमार्ग परंपरा के प्रमुख देव हैं।
श्रीनाथजी मंदिर कहाँ स्थित है?+
मंदिर राजस्थान के नाथद्वारा में, उदयपुर से लगभग 48 किमी दूर बनास नदी के तट पर है। देव को 17वीं शताब्दी में मथुरा के निकट गोवर्धन से यहाँ लाया गया।
पुष्टिमार्ग परंपरा क्या है?+
श्री वल्लभाचार्य द्वारा स्थापित अनुग्रह का मार्ग पुष्टिमार्ग, कृष्ण की प्रिय शिशु रूप में प्रेममयी सेवा से उपासना करता है। नाथद्वारा के श्रीनाथजी इसके केंद्रीय देव हैं।
श्रीनाथजी के आठ दर्शन कौन से हैं?+
आठ दैनिक दर्शन हैं मंगला, शृंगार, ग्वाल, राजभोग, उत्थापन, भोग, संध्या आरती और शयन। प्रत्येक का अपना वस्त्र, आभूषण, भोग व संगीत होता है।
श्रीनाथजी का मुख्य मंत्र क्या है?+
पुष्टिमार्गी भक्त 'श्री कृष्णः शरणं मम' जपते हैं, जिसका अर्थ है 'भगवान कृष्ण ही मेरी एकमात्र शरण हैं'। अनेक प्रेम से 'श्री गोवर्धननाथजी की जय' भी पुकारते हैं।
नाथद्वारा में सबसे भव्य पर्व कौन सा है?+
दिवाली के अगले दिन अन्नकूट (गोवर्धन पूजा) सबसे भव्य है, जब कृष्ण के गोवर्धन उठाने के स्मरण में भोजन के पर्वत अर्पित होते हैं। जन्माष्टमी व होली भी जीवंत हैं।
About the author
Pandit Ravindra Sharma · Vedic Rituals & Bhakti, 22+ years
Pandit Ravindra is the Vandnaa editorial team's resident specialist on aarti, chalisa, and daily devotion. He has performed home and temple pujas across Varanasi and Delhi for over two decades and contributes the bhakti-focused articles on this site.
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