परिक्रमा क्या है
परिक्रमा, जिसे प्रदक्षिणा भी कहते हैं, किसी देवता, मंदिर, पवित्र वृक्ष या पवित्र पर्वत या नदी के चारों ओर वृत्त में चलने का कर्म है। प्रदक्षिणा शब्द का अर्थ ही है 'दाहिनी ओर', क्योंकि भक्त चलते समय पवित्र केंद्र को सदा अपनी दाहिनी ओर रखता है। यह एक मौन, गतिशील प्रार्थना है - यह कहने का तरीका कि दिव्य हमारे जीवन का केंद्र है और हमारे सभी मार्ग उसी के चारों ओर घूमते हैं।
दिव्य की परिक्रमा का आध्यात्मिक अर्थ
परिक्रमा प्रतीक है कि ईश्वर समस्त अस्तित्व का केंद्र और स्रोत है, जैसे ग्रह सूर्य के चारों ओर घूमते हैं। देवता की परिक्रमा कर भक्त स्वीकार करता है कि दिव्य स्थिर व अपरिवर्तनीय है जबकि हम उसके चारों ओर जीवन में चलते हैं। यह वृत्त जीवन के चक्र और आत्मा की यात्रा का भी प्रतीक है, जिसका स्थिर केंद्र उस शाश्वत सत्य की ओर संकेत करता है जो कभी नहीं हिलता। प्रत्येक चक्र अपने कर्मों व विचारों को दिव्य के चरणों में अर्पित करना है।
परिक्रमा सदा दक्षिणावर्त क्यों होती है
परिक्रमा सदा दक्षिणावर्त दिशा में की जाती है, देवता को अपनी दाहिनी ओर रखते हुए। यह आकाश में सूर्य की स्वाभाविक गति और ग्रहों के पथ का अनुसरण करती है, जो भक्त को ब्रह्मांडीय व्यवस्था से संरेखित करता है। दिव्य को दाहिनी ओर रखना हिंदू परंपरा में सम्मान और शुभता का चिह्न है, जहाँ दाहिनी ओर का आदर होता है। दक्षिणावर्त चलना सकारात्मक, सामंजस्यपूर्ण ऊर्जा खींचता माना जाता है, जबकि वामावर्त चलना इस प्रवाह को बाधित करता समझा जाता है।
शिवलिंग का अपवाद - आधी परिक्रमा

अधिकांश देवताओं के लिए भक्त पूर्ण दक्षिणावर्त चक्र करते हैं। शिवलिंग का विशेष नियम है: कोई जलाधारी (वह नाली जो अभिषेक के समय अर्पित जल व दूध को ले जाती है) को नहीं लाँघता। भक्त सामने से दक्षिणावर्त चलकर जलाधारी के एक ओर तक जाता है, फिर उसी मार्ग से वापस लौटकर दूसरी ओर पहुँचता है, नाली को लाँघे बिना, जिससे यह आधी या आंशिक परिक्रमा बनती है जो आगे-पीछे दोहराई जाती है। जलाधारी शक्तिशाली, पवित्र ऊर्जा वहन करती है और सम्मानवश इसे लाँघना पारंपरिक रूप से वर्जित है।
परिक्रमा करने की सही विधि
परिक्रमा धीमे, सचेत और भक्ति से करें: 1. देवता के सामने से आरंभ करें, हाथ जोड़ें और पहले प्रणाम करें। 2. दक्षिणावर्त चलें, देवता को अपनी दाहिनी ओर रखते हुए। 3. धीरे और मौन चलें, हर कदम पर देवता का नाम या मंत्र जपते हुए। 4. पारंपरिक चक्रों की संख्या पूरी करें - आमतौर पर विषम संख्या जैसे 1, 3, 5, 7 या 11, देवता के अनुसार। 5. शिवलिंग के लिए जलाधारी लाँघे बिना आधी परिक्रमा करें। 6. सामने समाप्त करें, पुनः प्रणाम करें और अपनी प्रार्थना अर्पित करें। मन को दिव्य पर रखना गति या संख्या से कहीं अधिक मायने रखता है।
बचने योग्य सामान्य गलतियाँ
देवता के चारों ओर कभी वामावर्त न चलें, क्योंकि यह शुभ प्रवाह को उलट देता है। यंत्रवत बिना ध्यान के चक्र भागने से बचें, क्योंकि परिक्रमा ध्यान है, बोझ नहीं। शिवलिंग की जलाधारी न लाँघें, और बिना प्रणाम किए लापरवाही से परिक्रमा आरंभ या समाप्त न करें। चक्रों के दौरान बातचीत, फोन का उपयोग या मन भटकने से बचें, और परिक्रमा देवता के सामने से नहीं बल्कि पीछे से कभी आरंभ न करें।
परिक्रमा के लाभ

परिक्रमा देवता के चारों ओर ऊर्जा परिपथ को पूर्ण करती मानी जाती है, जिससे भक्त गर्भगृह से विकीर्ण सकारात्मक कंपन ग्रहण कर सकता है। आध्यात्मिक रूप से यह विनम्रता, समर्पण और दिव्य पर स्थिर एकाग्रता विकसित करती है। शारीरिक रूप से धीमा, सचेत चलना एक कोमल व्यायाम है जो नाड़ियों को शांत और अशांत मन को स्थिर करता है। भक्ति से की गई परिक्रमा साधारण चलने को एक शक्तिशाली प्रार्थना में बदल देती है जो शरीर, मन व आत्मा को पवित्र केंद्र से संरेखित करती है।
पाठकों के प्रश्न
परिक्रमा किस दिशा में करनी चाहिए?+
परिक्रमा सदा दक्षिणावर्त की जाती है, देवता को अपनी दाहिनी ओर रखते हुए। यह सूर्य के पथ का अनुसरण करती है और हिंदू परंपरा में सम्मानजनक व शुभ मानी जाती है।
शिवलिंग की परिक्रमा केवल आधी क्यों की जाती है?+
कोई जलाधारी को नहीं लाँघता, वह नाली जो अभिषेक का जल व दूध ले जाती है। भक्त दक्षिणावर्त उस तक चलते, फिर उसी मार्ग से लौटते हैं, जिससे सम्मानवश यह आधी परिक्रमा बनती है।
परिक्रमा के कितने चक्र करने चाहिए?+
पारंपरिक रूप से देवता के अनुसार 1, 3, 5, 7 या 11 जैसी विषम संख्याएँ की जाती हैं। मुख्य बात धीरे और सचेत चलना है, मन को दिव्य पर एकाग्र रखते हुए।
परिक्रमा क्या प्रतीक है?+
यह प्रतीक है कि ईश्वर समस्त अस्तित्व का स्थिर केंद्र और स्रोत है, जबकि हम जीवन भर दिव्य के चारों ओर घूमते हुए अपने कर्म व विचार उसके चरणों में अर्पित करते हैं।
क्या वृक्षों और नदियों की भी परिक्रमा की जा सकती है?+
हाँ। भक्त पीपल जैसे पवित्र वृक्षों, पवित्र नदियों, पर्वतों और मंदिरों की परिक्रमा करते हैं। हर स्थिति में वही दक्षिणावर्त नियम और भक्ति-भाव लागू होता है।
क्या परिक्रमा करने के कोई लाभ हैं?+
हाँ। यह देवता के चारों ओर ऊर्जा परिपथ पूर्ण करती, विनम्रता व एकाग्रता विकसित करती, मन को शांत करती और एक कोमल, ध्यानमय शारीरिक गति का काम करती मानी जाती है।
About the author
Dr. Suresh Iyer · Vastu Shastra & Jyotish, 18+ years
Dr. Suresh has practiced traditional Vastu and basic Vedic Jyotish for over 18 years across South India. He contributes the Vastu, direction, and home-puja layout guides on Vandnaa.
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