मंदिर के द्वार पर घंटी क्यों
जब हम मंदिर में प्रवेश करते हैं या घर पर पूजा आरंभ करते हैं, तो हम देवता के सामने आने से पहले घंटी बजाते हैं। घंटी मात्र सजावट नहीं है - यह वह यंत्र है जो उस क्षण को चिह्नित करती है जब हम साधारण संसार से पवित्र स्थान में प्रवेश करते हैं। इसकी ध्वनि 'ॐ' की आदि कंपन ले जाती मानी जाती है, वह ब्रह्मांडीय नाद जिससे सृष्टि उत्पन्न हुई। इसे बजाना दिव्य को हमारे आगमन की सूचना देता और हमारे अपने मन को विकर्षण छोड़ने हेतु तैयार करता है।
घंटी की ध्वनि का आध्यात्मिक अर्थ
घंटी की गूँजती ध्वनि पवित्र अक्षर ॐ (अउम्) से मिलती कही जाती है, जिसे स्वयं ब्रह्मांड का नाद माना जाता है। जैसे ही स्वर उठता और धीरे-धीरे मौन में विलीन होता है, वह भक्त को स्मरण कराता है कि समस्त सृष्टि दिव्य से उत्पन्न होती और उसी में लौटती है। घंटी देवता को जागृत कर उपासना ग्रहण करने हेतु और उपासक के मन को जागृत कर ध्यान को भीतर तथा सांसारिक विचारों से दूर खींचने के लिए भी मानी जाती है, ताकि प्रार्थना एकाग्र व सच्ची बने।
शास्त्रीय और सांस्कृतिक कारण
परंपरा घंटी बजाते समय पढ़ा जाने वाला एक सुंदर श्लोक देती है:
आगमार्थंतु देवानाम् गमनार्थंतु राक्षसाम्। कुर्वे घंटारवं तत्र देवताह्वान-लक्षणम्।
इसका अर्थ है: मैं यह घंटी देवताओं को आमंत्रित करने और नकारात्मक शक्तियों को दूर भगाने हेतु बजाता हूँ, जो दिव्य के आह्वान का चिह्न है। इस प्रकार घंटी देवता का आह्वान और नकारात्मकता के प्रस्थान का संकेत है। इसकी बनावट में भी प्रतीक हैं - घंटी का शरीर अनंत का, लोलक सरस्वती (बुद्धि की जिह्वा) का, और मूठ गरुड़, हनुमान या चक्र के रूप में, नाद के दिव्य वाहक का प्रतीक है।
वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक पक्ष

मंदिर की घंटियाँ पारंपरिक रूप से ताँबा, जस्ता, निकल और पीतल जैसी धातुओं के मिश्रण से ढाली जाती हैं, जो लंबी, गूँजती अनुनाद उत्पन्न करती हैं। यह स्थायी ध्वनि मन को स्वच्छ करती मानी जाती है, और आधुनिक अवलोकन सुझाता है कि यह सजग, एकाग्र अवस्था जगा सकती और क्षण भर के लिए भटकते विचारों को शांत कर सकती है। यह कंपन शरीर के ऊर्जा केंद्रों में अनुनादित होकर शांत व स्थिर प्रभाव देता भी माना जाता है। व्यावहारिक रूप से घंटी एक स्पष्ट संकेत है कि प्रार्थना का समय आरंभ हो गया, जो मन को तुरंत भक्ति-भाव में बदलने में सहायक है।
घंटी बजाने की सही विधि
घंटी कोमलता और भक्ति से बजाएँ, न कि ज़ोर से या लापरवाही से: 1. मंदिर में प्रवेश करते या आरती आरंभ करने से पहले इसे दाहिने हाथ से बजाएँ। 2. इसे दर्शन से पहले और आरती के दौरान बजाएँ, उपासना पूर्ण होने के बाद नहीं। 3. ध्वनि को कोमल और लयबद्ध रखें, आदर्श रूप से इसे ज़ोर से ठोकने के बजाय गूँजने दें। 4. बजाते समय मन ही मन देवता का आह्वान करें या ॐ का जप करें। 5. घर के मंदिर में आरती के समय छोटी घंटी बाएँ हाथ से बजाई जाती है जबकि दीपक दाहिने हाथ से घुमाया जाता है। विनम्रता और एकाग्रता का भाव ध्वनि की तीव्रता से अधिक मायने रखता है।
बचने योग्य सामान्य गलतियाँ
घंटी को ज़ोर से या मनोरंजन के लिए बार-बार न बजाएँ, क्योंकि यह पवित्र यंत्र है, खिलौना नहीं। इसे पूजा समाप्त होने के बाद न बजाएँ - यह दिव्य को आमंत्रित करने हेतु है, उपासना समाप्त करने हेतु नहीं। घंटी को स्वच्छ और अक्षत रखें, क्योंकि टूटी घंटी अपनी सच्ची अनुनाद खो देती है। बच्चों को कोमलता से सम्मान के साथ बजाना सिखाएँ, और मंदिर की घंटी को अधोए पैरों से या अशुद्ध अवस्था में कभी न लाँघें या छुएँ।
घंटी बजाने के लाभ

भक्ति से घंटी बजाना नकारात्मक ऊर्जा को दूर भगाने, परिवेश को शुद्ध करने और स्थान में दिव्य उपस्थिति को आमंत्रित करने वाला माना जाता है। उपासक के लिए यह तुरंत भटकते मन को एकाग्र करती, सांसारिक विचारों से स्पष्ट विराम देती और प्रार्थना के भाव को गहरा करती है। ध्वनि के विलीन होते ही अनेक लोग शांति व सजगता अनुभव करते हैं, जिससे घंटी रोज़मर्रा से सच्ची, हृदय से की गई उपासना तक का सरल किंतु शक्तिशाली द्वार बन जाती है।
भक्तों के सामान्य प्रश्न
हम पूजा से पहले घंटी क्यों बजाते हैं?+
हम इसे देवता को आमंत्रित करने, नकारात्मकता दूर भगाने और अपने मन को जागृत करने हेतु बजाते हैं। इसकी 'ॐ' जैसी ध्वनि साधारण संसार से पवित्र, एकाग्र उपासना में संक्रमण को चिह्नित करती है।
मंदिर की घंटी की ध्वनि क्या दर्शाती है?+
घंटी की गूँजती ध्वनि 'ॐ' से मिलती है, ब्रह्मांड का आदि नाद। इसका उठना और विलीन होना स्मरण कराता है कि समस्त सृष्टि दिव्य से उत्पन्न होती और उसी में लौटती है।
क्या पूजा समाप्त होने के बाद घंटी बजानी चाहिए?+
नहीं। घंटी दर्शन से पहले और आरती के दौरान दिव्य को आमंत्रित करने हेतु बजाई जाती है, उपासना समाप्त होने के बाद नहीं। सही समय पर भक्ति से कोमलता से बजाना ही मायने रखता है।
क्या मंदिर की घंटी के पीछे कोई वैज्ञानिक कारण है?+
मंदिर की घंटियाँ धातुओं के मिश्रण से बनी होती हैं जो लंबी अनुनाद देती हैं, मन को स्वच्छ करती, सजग एकाग्र अवस्था जगाती और शरीर पर शांत, स्थिर प्रभाव डालती मानी जाती हैं।
घंटी किस हाथ से बजानी चाहिए?+
मंदिर के प्रवेश पर इसे दाहिने हाथ से बजाएँ। घर की आरती के दौरान छोटी घंटी आमतौर पर बाएँ हाथ से बजाई जाती है जबकि दीपक दाहिने हाथ से घुमाया जाता है।
क्या मंदिर की घंटी नकारात्मकता दूर कर सकती है?+
हाँ, पारंपरिक रूप से माना जाता है कि घंटी का कंपन परिवेश को शुद्ध करता और नकारात्मक शक्तियों को दूर भगाता है, साथ ही दिव्य उपस्थिति को आमंत्रित कर मन को स्थिर करता है।
About the author
Pandit Mahesh Trivedi · Festival Traditions & Panchang
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