अन्नपूर्णा माता कौन हैं
अन्नपूर्णा माता अन्न, पोषण व समृद्धि की देवी हैं - नाम का अर्थ है 'जो अन्न से परिपूर्ण हैं' (अन्न + पूर्णा)। वे देवी पार्वती का करुणामय रूप हैं, काशी की रानी, जो समस्त प्राणियों को भोजन देती और सुनिश्चित करती हैं कि कोई भक्त भूखा न रहे। उन्हें कलछुल और भोजन का पात्र (खीर या अन्न) धारण किए दर्शाया जाता है, प्रायः स्वयं भगवान शिव को भोजन परोसते हुए। उनकी उपासना घर को भरी रसोई, अच्छे स्वास्थ्य और हर भोजन के प्रति कृतज्ञता का आशीर्वाद देती है।
अन्नपूर्णा कथा (संक्षेप में)
एक प्रसिद्ध कथा बताती है कि भगवान शिव ने एक बार घोषणा की कि भोजन सहित भौतिक जगत मात्र माया है। यह सिखाने हेतु कि पोषण पवित्र व वास्तविक है, देवी पार्वती अंतर्धान हो गईं, और संसार अकाल से ग्रस्त हो गया - न अन्न उगा न प्राणी सबल रहे। उनके कष्ट से द्रवित होकर देवी काशी में अन्नपूर्णा रूप में प्रकट हुईं, और सबको भोजन देने हेतु भोजनशाला लगाई। स्वयं शिव भिक्षा-पात्र लेकर आए, और उन्होंने प्रेम से उन्हें भोजन कराया, यह दर्शाते हुए कि ब्रह्मांड के स्वामी भी अन्नदाता का सम्मान करते हैं।
अन्नपूर्णा चालीसा - सार और प्रारंभिक दोहा
अन्नपूर्णा चालीसा देवी को उस माता रूप में स्तुति करती है जो हर घर व हृदय को पोषण से भर देती हैं। प्रारंभिक दोहा:
जय अन्नपूर्णे माँ भवानी, अन्न-दान की स्वामी रानी। शरण पड़ी जो आपकी, भर दो अन्न-भंडार निदानी।
चौपाई (उदाहरण): जय जय अन्नपूर्णा महारानी, काशी-वासी जग-जननी। हाथ कलछुल अन्न का प्याला, भक्त-जनो का करती रखवाला।
छंद उन्हें काशी की रानी और अन्न व समृद्धि की शाश्वत दात्री रूप में स्मरण कराते हैं।
अन्नपूर्णा व्रत और पूजा विधि

अन्नपूर्णा व्रत प्रायः मार्गशीर्ष पूर्णिमा (अन्नपूर्णा जयंती) और अष्टमी तिथियों पर रखा जाता है। विधि: 1. रसोई को अच्छी तरह स्वच्छ करें, क्योंकि वह घर में देवी का स्थान है। 2. जल्दी स्नान कर अन्नपूर्णा माता के चित्र सहित चूल्हे व अन्न की पूजा करें। 3. घी का दीपक जलाएँ, खीर, ताज़ा अन्न, फल और लाल या पीले पुष्प अर्पित करें। 4. अन्नपूर्णा चालीसा पढ़ें, कथा सुनें और ॐ ह्रीं श्रीं अन्नपूर्णायै नमः का 108 बार जप करें। 5. आरती करें, फिर भोजन बनाकर बाँटें, परिवार, अतिथि व जरूरतमंदों को खिलाएँ। 6. इस दिन भोजन कभी व्यर्थ न करें; दूसरों को खिलाना उनकी सर्वोच्च उपासना है।
अन्नपूर्णा उपासना के लाभ
अन्नपूर्णा माता की उपासना सुनिश्चित करती मानी जाती है कि घर कभी अन्न-विहीन न रहे, परिवार में समृद्धि लाए और रसोई व उसमें भोजन बनाने वालों को आशीर्वाद दे। यह दरिद्रता, भूख व धन-चिंता दूर करती और कृतज्ञता, स्वास्थ्य व संतोष बढ़ाती मानी जाती है। सबसे बढ़कर, उनकी उपासना भक्तों को स्मरण कराती है कि भोजन पवित्र है और दूसरों को खिलाना सर्वोच्च भक्ति-कर्मों में है।
ध्यान रखने योग्य बातें
अपनी रसोई को पवित्र स्थान मानें - उसे स्वच्छ रखें, क्रोध में भोजन न बनाएँ, और खाने से पहले भोजन का पहला अंश देवी या अग्नि को अर्पित करें। भोजन व्यर्थ करने या उसका अनादर करने से बचें, और प्रतिदिन कम-से-कम एक व्यक्ति, अतिथि या पशु को खिलाने का प्रयास करें। अन्न व रसोई को आग्नेय कोण (अग्नि-कोना) में व्यवस्थित रखना और भोजन कृतज्ञता से आरंभ करना अन्नपूर्णा माता को प्रसन्न करता है।
लोग सबसे ज़्यादा क्या पूछते हैं
अन्नपूर्णा माता कौन हैं?+
अन्नपूर्णा माता अन्न व पोषण की देवी हैं, देवी पार्वती का करुणामय रूप और काशी की रानी। वे सुनिश्चित करती हैं कि किसी भक्त का घर कभी अन्न-विहीन न रहे।
अन्नपूर्णा मंत्र क्या है?+
मंत्र 'ॐ ह्रीं श्रीं अन्नपूर्णायै नमः' है, जिसे दीप जलाकर व चालीसा पढ़कर 108 बार जपा जाता है, आदर्श रूप से अन्नपूर्णा व्रत या मार्गशीर्ष पूर्णिमा को।
अन्नपूर्णा व्रत कब रखा जाता है?+
यह प्रायः मार्गशीर्ष पूर्णिमा को, जिसे अन्नपूर्णा जयंती कहते हैं, और अष्टमी तिथियों पर रखा जाता है। देवी के साथ रसोई, चूल्हे व अन्न की पूजा की जाती है।
अन्नपूर्णा कथा क्या सिखाती है?+
कथा सिखाती है कि भोजन पवित्र व वास्तविक है, मात्र माया नहीं। जब पार्वती अकाल-ग्रस्त संसार को खिलाने अन्नपूर्णा रूप में प्रकट हुईं, तब स्वयं शिव ने उनसे भोजन लिया, अन्नदाता का सम्मान करते हुए।
अन्नपूर्णा माता की उपासना के क्या लाभ हैं?+
यह घर को अन्न-विहीन न रखने, समृद्धि लाने, रसोई को आशीर्वाद देने, दरिद्रता व भूख दूर करने और कृतज्ञता, स्वास्थ्य व संतोष बढ़ाने वाली मानी जाती है।
दूसरों को खिलाना अन्नपूर्णा उपासना का अंग क्यों है?+
अन्नपूर्णा समस्त प्राणियों को अन्न देने वाली हैं, इसलिए परिवार, अतिथि, जरूरतमंद या पशुओं को खिलाना उनकी सर्वोच्च उपासना मानी जाती है और घर पर उनकी कृपा लाती है।
About the author
Acharya Vinaya Kapoor · M.A. Sanskrit, Mantra & Stotra Studies
Acharya Vinaya holds an M.A. in Sanskrit from Banaras Hindu University and writes the mantra and stotra commentary on Vandnaa. Her focus is on accurate pronunciation, traditional context, and helping modern readers connect with classical texts.
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