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गंगा दशहरा 2026: तिथि, स्नान महत्व, भगीरथ कथा और गंगा मंत्र
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गंगा दशहरा 2026: तिथि, स्नान महत्व, भगीरथ कथा और गंगा मंत्र

10 मिनट पढ़ेंप्रकाशित फ़रवरी 15, 2026
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By Acharya Vinaya Kapoor · M.A. Sanskrit, Mantra & Stotra Studies

Reviewed by Pandit Ravindra Sharma · Vedic Rituals & Bhakti, 22+ years

वह दिन जब माँ गंगा ने धरती को छुआ

विश्व में कोई और नदी जीवित माँ के रूप में पूजित नहीं। हिंदू पंचांग में कोई और दिन पूर्णतया किसी देवता के स्वर्ग से धरती अवतरण को समर्पित नहीं।

वह दिन है गंगा दशहरा - गंगा दशहरा 2026 शुक्रवार, 5 जून 2026 (ज्येष्ठ शुक्ल दशमी) को है।

गंगा केवल जल नहीं। वे माँ हैं। वे एकमात्र नदी हैं जो स्वर्ग, धरती व पाताल - तीनों लोकों में बहती हैं (स्वर्ग में मंदाकिनी, धरती पर भागीरथी/गंगा, पाताल में भोगवती)। वे ब्रह्मा की पुत्री, राजा शांतनु की पत्नी, भीष्म की माता, यमुना की बहन हैं। उन्होंने वामन के पैर की धूल धोकर ब्रह्मा के कमंडल में रखी थी।

वहाँ से वे उतरीं - पर केवल तब जब एक मनुष्य भगीरथ ने अपने पूर्वजों की आत्माओं को मुनि के शाप से मुक्त करने हेतु तीन जन्मों तक 60,000 वर्ष की अकल्पनीय तपस्या की।

'दशहरा' का अर्थ - '10 का नाशक'। इस दिन गंगा स्नान 10 प्रकार के पाप धोता है - शरीर के 3 (हिंसा, चोरी, निषिद्ध संबंध), वाणी के 4 (झूठ, कठोर वचन, चुगली, व्यर्थ बात), मन के 3 (लोभ, क्रोध, मिथ्या विश्वास)।

गंगा दशहरा पर एक स्नान अन्य दिनों के 1000 सामान्य गंगा स्नानों के समान।

🙏 गंगा तट तक न पहुँच पाएँ तो वंदना ऐप की सूर्योदय गंगा आरती व 108 गंगा मंत्र घर पर वही ऊर्जा सक्रिय करते हैं।

गंगा दशहरा 2026 - तिथि, स्नान मुहूर्त व विशेष योग

📅 तिथि: शुक्रवार, 5 जून 2026 🕒 दशमी तिथि प्रारंभ: 5 जून 2026, सुबह 4:35 🕒 दशमी तिथि समाप्त: 6 जून 2026, मध्यरात्रि 1:53

श्रेष्ठ स्नान मुहूर्त - ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 4:02 – 4:43 सूर्योदय स्नान: सुबह 5:23 – 7:00 मध्याह्न दान मुहूर्त: सुबह 11:50 – दोपहर 12:46 संध्या आरती मुहूर्त: सायं 6:50 – 7:30

2026 विशेष योग: इस वर्ष गंगा दशहरा शुक्रवार को - माँ लक्ष्मी का दिन। गंगा + लक्ष्मी एक तिथि में मिलकर गंगा-लक्ष्मी योग बनाते हैं - अत्यंत दुर्लभ, 19 वर्षों में एक बार। आज धन दान 11 गुना फल देता है।

हस्त नक्षत्र योग: दिन के पूर्वार्ध में हस्त नक्षत्र - संकल्प व गंभीर दान हेतु श्रेष्ठ। हस्त + दशमी + शुक्रवार का संयोग शास्त्रों में 'सर्व-पाप-विनाशिनी योग' कहा गया।

बचें: शुक्रवार राहु काल (सुबह 10:33 – दोपहर 12:13) - इसमें दान आरंभ न करें। दोपहर 1 बजे के बाद सुरक्षित।

भगीरथ कथा - एक मनुष्य कैसे गंगा को धरती पर लाया

Ma Ganga descending from Lord Shiva's matted locks following King Bhagiratha's chariot
Ganga descending - caught by Shiva's jata, led by Bhagiratha's chariot.

सूर्यवंश (जिसमें बाद में भगवान राम जन्मे) के राजा सगर के 60,000 पुत्र थे। संप्रभुता सिद्धि हेतु उन्होंने अश्वमेध यज्ञ किया - एक पवित्र घोड़ा एक वर्ष तक स्वतंत्र विचरण हेतु छोड़ा। जहाँ घोड़ा अबाध गया, वे भूमि उनकी अधीनता स्वीकार करती थीं।

ईर्ष्यालु इंद्र ने चुपके से घोड़ा चुराकर कपिल मुनि (विष्णु अवतार, गहरी तपस्या में लीन) के आश्रम में बाँध दिया।

सगर के 60,000 पुत्र पृथ्वी ढूँढते कपिल मुनि के पास घोड़ा पाया। बिना परखे ध्यानस्थ मुनि पर चोरी का आरोप लगाया, आक्रमण की तैयारी की। समाधि भंग होने पर कपिल मुनि ने आँखें खोलीं - और उनकी तपस्या की अग्नि ने एक क्षण में 60,000 पुत्रों को भस्म कर दिया।

उनकी आत्माएँ पाताल में अटक गईं - अंत्येष्टि न होने से मोक्ष न मिल सका। पीढ़ियों तक सगर वंश ने उन्हें मुक्त करने का प्रयास किया।

राजा अंशुमान (सगर के पौत्र) ने कपिल मुनि से सम्मान सहित प्रार्थना की। मुनि बोले - 'केवल स्वर्ग की गंगा यह पाप धो सकती हैं। उन्हें नीचे लाओ।'

अंशुमान ने तपस्या की। असफल। उनके पुत्र दिलीप ने तपस्या की। असफल। दिलीप के पुत्र भगीरथ ने प्रण किया - 'गंगा अवतरित होने तक सिंहासन नहीं लौटूँगा।'

भगीरथ राज्य त्याग कर हिमालय में 1000 वर्ष केवल वायु पीकर तपस्या करते रहे। गंगा अंततः प्रकट होकर बोलीं - 'हाँ, आऊँगी। पर स्वर्ग से मेरे गिरने की शक्ति पृथ्वी को दो भाग कर देगी। कौन धारण करेगा?'

भगीरथ निरुत्तर। एक और 1000 वर्ष तपस्या - इस बार भगवान शिव को। प्रसन्न शिव ने गंगा को अपनी जटा में धारण करना स्वीकार किया।

भगीरथ ने गंगा को अवतरण का संकेत किया। वे गर्वित होकर तीव्र वेग से उतरीं - सोचा शिव को ही बहा देंगी। शिव ने जटा में पकड़ लिया, और वे एक और 1000 वर्ष जटा की भूल-भुलैया में खो गईं, बह न सकीं।

भगीरथ ने तीसरी बार तपस्या की, शिव से उन्हें मुक्त करने की प्रार्थना। शिव मुस्कुराकर एक धारा छोड़ी। वही धारा भागीरथी बनी - उनके नाम पर - हिमालय गोमुख से प्रवाहित।

भगीरथ रथ पर आगे चले, गंगा पीछे आईं। मैदानों से बहती अंततः 60,000 पूर्वजों की भस्म पर पहुँचीं, धोया। उनकी आत्माओं को मोक्ष मिला। जिस दिन वे भस्म स्थान पहुँचीं और मोक्ष दिया - वह दिन गंगा दशहरा।

स्वर्ग लौटने से पहले गंगा बोलीं - 'मैं यहीं रहूँगी। जो हर वर्ष ज्येष्ठ शुक्ल दशमी को मुझ में स्नान करेगा, 10 जन्मों के पाप से मुक्त होगा। यह मेरा वचन है।'

वह वचन आज भी कायम है।

गंगा स्नान विधि - घाट पर या घर पर

गंगा स्नान विधि - घाट पर या घर पर

🌊 गंगा तक पहुँच सकें (हरिद्वार, ऋषिकेश, वाराणसी, प्रयागराज, गढ़मुक्तेश्वर, पटना आदि):

चरण 1 - सुबह 4:30 तक घाट पहुँचें (ब्रह्म मुहूर्त 4:02 बजे आरंभ)। सर्वाधिक शुभ स्नान - प्रातः-पूर्व अंधकार में एक दीया जल पर तैरते।

चरण 2 - घाट पर संकल्प: नदी मुख खड़े। हथेलियों में जल + अक्षत + फूल। संकल्प -

'मैं [नाम], इस ज्येष्ठ शुक्ल दशमी को इस जन्म व पूर्व जन्मों के तन-वचन-मन के 10 पापों के नाश हेतु गंगा स्नान करता/करती हूँ। गंगा माते, स्वीकार करें। ॐ नमो गंगायै विश्वरूपिण्यै नारायण्यै नमो नमः।'

चरण 3 - स्नान: 11 डुबकी (संभव हो तो 21)। प्रत्येक डुबकी पर मन में 'हर हर गंगे'। जल में मुख न खोलें - बाहर निकल कर ही पिएँ।

चरण 4 - सूर्य अर्घ्य व गंगा अर्घ्य: स्नान के बाद कमर तक जल में रहते हुए सूर्य को हथेली से जल अर्पण - 3 बार। फिर मुड़कर माँ गंगा को - 3 बार।

चरण 5 - घाट पर दान: ब्राह्मण, याचक, साधु को दान। सर्वाधिक शक्तिशाली - कलश से 10 जरूरतमंदों को 10 जलपात्र (हर नष्ट पाप हेतु एक)।

चरण 6 - संध्या आरती: सायं घाट की गंगा आरती में भाग लें (हरिद्वार हर की पौड़ी, वाराणसी दशाश्वमेध घाट विश्व-प्रसिद्ध)।

🏠 गंगा तक न पहुँच सकें (अधिकांश लोग):

गरुड़ पुराण स्पष्ट कहता है - 'जहाँ शुद्ध मंत्र से गंगा जल आमंत्रित हो, वह जल स्वयं गंगा बन जाता है।' यह शास्त्र-निर्धारित घर समानता है।

चरण 1 - स्नान जल में गंगाजल मिलाएँ: बाल्टी में केवल 1-2 चम्मच गंगाजल (ताम्र/रजत पात्र में रखा) डालें। डालते समय जपें - 'ॐ गंगे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वती। नर्मदे सिंधु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरु॥'

चरण 2 - संकल्प सहित स्नान: उपरोक्त संकल्प। 7 मग जल सिर पर डालें, प्रत्येक पर मन में 'हर हर गंगे'।

चरण 3 - घर मंदिर में गंगा पूजा: लाल वस्त्र पर कलश में जल + गंगाजल + तुलसी पत्र + अक्षत स्थापित। कलश को स्वयं माँ गंगा रूप पूजा। दीया। गंगा स्तोत्रम पढ़ें या सुनें।

चरण 4 - घर से दान: जल भरे मटके, हाथ पंखे, सत्तू, गुड़, श्वेत वस्त्र, चप्पल जरूरतमंद को। जून की गर्मी में 'पियाऊ' (मुफ्त जल स्टॉल) लगाना स्वयं गंगा स्नान के समान।

चरण 5 - संध्या गंगा आरती: गंगा चित्र के सामने पंच-बत्ती दीया। 'जय गंगे माता' आरती। संभव हो तो किसी जलाशय में दीया प्रवाहित।

गंगा दशहरा पर जप करने योग्य 5 गंगा मंत्र

1. गंगा बीज मंत्र (स्नान में 108 बार) ॐ नमो गंगायै विश्वरूपिण्यै नारायण्यै नमो नमः → ब्रह्मांड रूप, नारायण रूप माँ गंगा को नमन।

2. सप्त-नदी मंत्र (बाल्टी में गंगाजल डालते समय) ॐ गंगे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वती। नर्मदे सिंधु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरु॥ → सात पवित्र नदियों (गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिंधु, कावेरी) का इस जल में आह्वान। (यह एक मंत्र साधारण जल को सप्त-नदी जल बनाता है।)

3. गंगा स्तुति (संक्षिप्त) देवी सुरेश्वरी भगवती गंगे, त्रिभुवन तारिणी तरल तरंगे। शंकर मौलि विहारिणी विमले, मम मतिरास्तां तव पद कमले॥ → हे देवी, सुरेश्वरी, भगवती गंगे, तीनों लोकों को तारने वाली तरंगों वाली, शंकर की जटा में विहार करती निर्मले - मेरा मन आपके चरणकमलों में लगे।

4. गंगा गायत्री मंत्र ॐ विश्वरूपिणी विद्महे नंदिन्यै धीमहि। तन्नो गंगा प्रचोदयात्॥ → अंतर की गंगा चेतना जागृत। ब्रह्म मुहूर्त में श्रेष्ठ।

5. भागीरथी मंत्र (पूर्वज मोक्ष हेतु) ॐ भगीरथी हे माँ, पिशाच निवारिणी। दुष्कृति हारिणी, गंगे माँ नमो नमः॥ → पूर्वजों, हाल में दिवंगत, परिवार आत्माओं की मोक्ष प्रार्थना हेतु विशेष। गंगा दशहरा श्राद्ध-तुल्य प्रार्थना का सर्वाधिक शक्तिशाली दिन।

🎧 पाँचों मंत्र शुद्ध संस्कृत उच्चारण व आदि शंकराचार्य रचित पूर्ण गंगा स्तोत्रम वंदना ऐप पर - घर हो या घाट, सूर्योदय पूजा हेतु श्रेष्ठ।

गंगा दशहरा पर 10 दान वस्तुएँ (प्रत्येक 1 पाप नष्ट करती है)

गंगा दशहरा दान विशेष - आज संख्या 10 पवित्र है। एक ही वस्तु के 10 दान, अथवा नीचे 10 पारंपरिक वस्तुओं में से प्रत्येक का 1। प्रत्येक वस्तु एक विशिष्ट प्रकार का पाप नष्ट करती है।

| # | दान वस्तु | किस पाप का नाश | |---|---|---| | 1 | मटका (जल भरा) | अहंकार | | 2 | हाथ पंखा / विद्युत पंखा | क्रोध | | 3 | सत्तू (चना आटा पेय) | लोभ | | 4 | गुड़ / भूरी शक्कर | मोह | | 5 | श्वेत सूती वस्त्र | मद | | 6 | चप्पल | मात्सर्य (ईर्ष्या) | | 7 | छाता / छाँव | मिथ्या | | 8 | तरबूज / खीरा (शीतल फल) | कठोर वचन | | 9 | तिल | चोरी | | 10 | ब्राह्मण को मुद्रा/धन | नास्तिकता |

विशेष दान:

  • गौ दान: गोशाला की एक गाय का एक दिन का चारा प्रायोजित करना भी समान
  • गंगाजल दान: जिस तक पहुँच नहीं उसे छोटी बोतल गंगाजल - अत्यंत पुण्य
  • वृक्षारोपण: कोई फल वृक्ष - विशेषतः आम या पीपल - जीवन भर पुण्य
  • 'पियाऊ' लगाना: ग्रीष्म ऋतु में व्यस्त सड़क पर मुफ्त जल स्टॉल - शास्त्र इसे 'परमोदय दान' - दान का सर्वोच्च रूप - कहते हैं

महत्वपूर्ण नियम: दान दोपहर से पहले (5 जून, दोपहर 12:46 से पहले) देना चाहिए। संध्या दान का पुण्य कम - साधु/ब्राह्मण को विशेष रूप से देने पर ही पूर्ण।

गंगा दशहरा पर वर्जित कार्य (व्रत पुण्य रक्षा हेतु)

गंगा दशहरा पर वर्जित कार्य (व्रत पुण्य रक्षा हेतु)

🚫 कठोर वर्जन:

1. किसी भी जल स्रोत को दूषित न करें - अपना स्नान जल, पेय जल, नदी, तालाब। गंगा दशहरा पर जल स्वयं पवित्र है। कुछ भी मलिन, यहाँ तक साबुन का झाग नदी में फेंकना आज महापाप।

2. जल अपव्यय न करें - नल खुला छोड़ना, अत्यधिक स्नान, अनावश्यक पौधे सींचना। जल-आदर आज की केंद्रीय साधना।

3. मांसाहार, अंडा, मदिरा, धूम्रपान नहीं दिन भर - ये घर में आमंत्रित गंगा ऊर्जा को दूषित करते हैं।

4. क्रोध, कठोर वचन नहीं - विशेषतः माता-पिता, वृद्धजन, सेवा करने वालों (चालक, सहायक) पर। आज माँ गंगा का दिन। किसी भी मातृ रूप का अनादर पुण्य घटाता है।

5. प्याज, लहसुन, मसूर दाल, बैंगन, मशरूम नहीं - एकादशी जैसा सात्विक आहार।

6. धन उधार नहीं - आर्थिक लेन-देन कर्म स्थानांतरण मानी जाती है। आज की गंगा ऊर्जा ऋण से शुद्ध रहे।

7. चुगली, किसी की निंदा नहीं - चुगली वाणी के 4 पापों में है जिन्हें गंगा दशहरा धोता है। उसी दिन करना उद्देश्य विफल करता है।

8. शमशान/अंत्येष्टि नहीं अति-अनिवार्य न हो तो - गंगा द्वारा प्रवाहित मोक्ष-दायक ऊर्जा शोक ऊर्जा से न मिले।

9. नया व्यवसाय/संपत्ति दस्तावेज नहीं - यह दिन शुद्धिकरण का है, भौतिक विस्तार का नहीं। ये अक्षय तृतीया (बीत चुकी) या विजय दशमी पर आरंभ करें।

10. गंगाजल अपव्यय नहीं - एक बूँद भी पवित्र। न्यूनतम उपयोग, ताम्र पात्र में सुरक्षित, लापरवाही से न गिराएँ।

लोग सबसे ज़्यादा क्या पूछते हैं

क्या गंगा दशहरा और गंगा सप्तमी एक ही हैं?+

नहीं - गंगा कथा की भिन्न घटनाएँ। गंगा सप्तमी (वैशाख शुक्ल सप्तमी) - जिस दिन गंगा पहली बार शिव की जटा से प्रकट हुईं। गंगा दशहरा (ज्येष्ठ शुक्ल दशमी) - जब वे वास्तव में धरती पर अवतरित हुईं और भगीरथ के पूर्वजों की भस्म से मिलीं। सप्तमी 'शिव जटा से मुक्ति', दशहरा 'धरती पर आगमन'। दोनों मनाए जाते हैं, पर गंगा दशहरा अधिक महत्वपूर्ण क्योंकि यह वास्तविक मोक्ष-दायी क्षण मनाता है।

क्या मैं किसी भी नदी में गंगा स्नान कर सकता/सकती हूँ?+

गंगा दशहरा पर सभी पवित्र नदियाँ अस्थायी रूप से गंगा में विलीन - यमुना, गोदावरी, नर्मदा, कृष्णा, कावेरी, सिंधु, सरस्वती। गंगा तक न पहुँच सकें तो इनमें से किसी में स्नान वही पुण्य देता है। ये भी न मिलें तो कोई भी प्राकृतिक जलाशय - नदी, झील, तालाब, कुआँ - आज गंगा बन जाता है यदि सप्त-नदी मंत्र से आह्वान किया जाए। अंतिम विकल्प - स्नान बाल्टी में कुछ बूँद गंगाजल।

क्या घर में ताम्र पात्र में गंगाजल रखना वास्तव में लाभकारी है?+

बिल्कुल हाँ - और इसका वैज्ञानिक आधार है। गंगा जल में उच्च ऑक्सीजन व बैक्टीरियोफेज हैं जो माहों बाद भी बैक्टीरिया नहीं उगने देते। ताम्र पात्र में रखने से ताम्र आयन शुद्धिकरण और बढ़ाते हैं। पात्र पूजा कक्ष में रखें। पूर्णिमा, एकादशी, पर्वों पर स्नान जल में 1-2 चम्मच। शनिवार को तुलसी पत्र से हर कमरे में कुछ बूँद ऊर्जा शुद्धि हेतु। सही ढंग से रखा गंगाजल कभी खराब नहीं होता।

गंगा दशहरा व दिवंगत पूर्वजों के मोक्ष में क्या संबंध है?+

मूल गंगा दशहरा कथा 60,000 आत्माओं की पाताल मुक्ति की है - समस्त पंचांग में सर्वाधिक पितृ-मोक्ष शक्ति वाला दिन। पिछले 1-3 वर्ष में परिवार में किसी की मृत्यु हुई हो तो गंगा दशहरा पर किसी भी नदी तट पर 'पितृ-तर्पण' (जल + तिल + फूल अर्पण) गया में पिंडदान के समान शक्तिशाली। तर्पण के समय भागीरथी मंत्र जपें। शास्त्रों के अनुसार यह अर्पण घंटों में आत्माओं तक पहुँचता है।

आज जल-मटका दान सबसे महत्वपूर्ण क्यों माना जाता है?+

तीन कारण। पहला, गंगा दशहरा ज्येष्ठ में - उत्तर भारत का सबसे गर्म माह। जल का अधिकतम व्यावहारिक मूल्य। दूसरा, दिन की ऊर्जा स्वयं जल-ऊर्जा; जल दान ब्रह्मांडीय प्रवाह बढ़ाता है। तीसरा, भगीरथ कथा मूलतः जल को वहाँ लाने की है जहाँ नहीं था (पूर्वजों की भस्म रेगिस्तानी मैदान में)। जब आप राहगीरों हेतु मुफ्त जल स्टॉल लगाते हैं, छोटे भगीरथ बन जाते हैं - जल से राहत। स्कंद पुराण - आज एक मटका दान सामान्य दिन 100 गौ दान के समान।

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About the author

Acharya Vinaya Kapoor · M.A. Sanskrit, Mantra & Stotra Studies

Acharya Vinaya holds an M.A. in Sanskrit from Banaras Hindu University and writes the mantra and stotra commentary on Vandnaa. Her focus is on accurate pronunciation, traditional context, and helping modern readers connect with classical texts.

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