क्यों वट सावित्री विवाहित महिला का सबसे शक्तिशाली व्रत है
हिंदू शास्त्र में एक ऐसी कथा है जहाँ पत्नी की भक्ति इतनी प्रबल थी कि स्वयं यमराज को पति के प्राण लौटाने पड़े।
वह कथा है सावित्री और सत्यवान की। और उससे जन्मा व्रत - हर विवाहित हिंदू स्त्री का सबसे पवित्र संकल्प।
वट सावित्री व्रत 2026 बुधवार, 27 मई 2026 - ज्येष्ठ अमावस्या को है। अमावस्या तिथि 26 मई दोपहर 2:22 से शुरू होकर 27 मई शाम 4:16 बजे समाप्त होगी। पूजा सूर्योदय (5:25 AM) से दोपहर 12:30 तक पूर्ण होनी चाहिए।
व्रत का नाम वट सावित्री है क्योंकि पूजा वट (बरगद) वृक्ष के नीचे होती है - वही वृक्ष जिसके नीचे सावित्री बैठी थीं जब यमराज सत्यवान के प्राण ले जा रहे थे। बरगद अक्षय (अमर) माना जाता है और यह एकमात्र वृक्ष है जहाँ ब्रह्मा, विष्णु और शिव तीनों निवास करते हैं।
जब पत्नी सावित्री की कथा सुनते हुए बरगद के तने पर लाल पवित्र धागा बाँधती है, वह उसी शक्ति का आह्वान करती है जो सत्यवान को मृत्यु से लौटा लाई। शास्त्र वचन है: यह एक व्रत पति की 7 जन्मों तक रक्षा करता है।
इस लेख में जानेंगे - सटीक पूजा विधि, संपूर्ण सावित्री-सत्यवान कथा, व्रत की शक्ति तय करने वाले 7 कठोर नियम, और 108 परिक्रमा के धागे बाँधते समय के मंत्र।
🙏 वंदना ऐप में मुफ्त वट सावित्री रिमाइंडर सेट करें ताकि अमावस्या तिथि समाप्त होने से पहले पूजा पूर्ण हो।
वट सावित्री व्रत 2026 - सटीक तिथि, तिथि आरंभ/अंत व पूजा मुहूर्त
इन समयों का ध्यान रखें - अमावस्या तिथि पार होने पर व्रत टूटता है।
📅 तिथि: बुधवार, 27 मई 2026 🕒 अमावस्या प्रारंभ: 26 मई 2026, दोपहर 2:22 🕒 अमावस्या समाप्त: 27 मई 2026, शाम 4:16
सूर्योदय पूजा (सर्वश्रेष्ठ): सुबह 5:25 – 7:10 मुख्य पूजा मुहूर्त: सुबह 9:15 – दोपहर 12:30 अभिजीत मुहूर्त: सुबह 11:51 – दोपहर 12:45
महत्वपूर्ण: उत्तर भारत (UP, बिहार, MP, पंजाब) ज्येष्ठ अमावस्या (27 मई) मानता है - उपरोक्त तिथियाँ लागू। पर महाराष्ट्र, गुजरात व दक्षिण भारत ज्येष्ठ पूर्णिमा को मानते हैं, जो 2026 में 10 जून है - यह वट सावित्री पूर्णिमा है। अपनी पारिवारिक परंपरा का पालन करें।
2026 का विशेष योग: अमावस्या बुधवार को - गणेश का दिन। यह गणेश योग बनाता है जो व्रत के सभी विघ्न हटाता है। अत्यंत दुर्लभ व शक्तिशाली संयोग।
मूल सावित्री-सत्यवान कथा - हर सुहागिन की जाननी चाहिए
राजकुमारी सावित्री मद्र देश के राजा अश्वपति की पुत्री थीं। विवाह योग्य होने पर कोई राजकुमार उनके योग्य न लगा। वह वनों में गईं और सत्यवान को चुना - एक दरिद्र राजकुमार जिसके पिता राज्य गँवा चुके थे और वनवास में थे।
नारद मुनि ने सावित्री को चेताया - 'सत्यवान शुद्ध हृदय व वीर हैं - पर ठीक एक वर्ष बाद उनकी मृत्यु होगी।'
सावित्री ने निर्णय न बदला। 'हिंदू कन्या पति एक ही बार चुनती है। मेरा प्रण स्थिर है।'
उन्होंने विवाह कर एक वर्ष वन में तपस्विनी की भाँति रहीं। मृत्यु के पूर्व तीन दिन उन्होंने व्रत आरंभ किया। जिस प्रातः सत्यवान लकड़ी काटने वन गए, सावित्री साथ गईं।
काटते समय सत्यवान को चक्कर आया। वह सावित्री की गोद में लेट गए। तभी स्वयं यमराज प्रकट हुए - काले भैंसे पर, पाश हाथ में - और सत्यवान की आत्मा को शरीर से खींच लिया।
यमराज दक्षिण दिशा को चले। सावित्री पीछे-पीछे।
यमराज: 'लौट जाओ। यह मार्ग जीवितों का नहीं।' सावित्री: 'जहाँ पति, वहीं मैं।'
घंटों यमराज के पीछे चलती हुईं, उन्होंने धर्म, सत्य व पतिव्रता के बारे में ऐसी बुद्धिमत्ता की बातें कहीं कि यमराज प्रभावित होकर तीन वरदान देने लगे (पर पति का जीवन नहीं)।
वरदान 1: सावित्री ने माँगा - 'अंधे ससुर को दृष्टि व राज्य लौटा दें।' मिला। वरदान 2: 'मेरे पिता को 100 पुत्र हों।' मिला। वरदान 3: 'मैं 100 पुत्रों की माता बनूँ।'
यमराज ने कहा 'तथास्तु' - और भूल समझे। सावित्री 100 पुत्रों की माता कैसे बन सकतीं यदि पति सत्यवान मृत थे? हिंदू पत्नी दूसरा पुरुष कभी नहीं स्वीकारती।
अपने ही वचन में बंधे यमराज ने सत्यवान की आत्मा मुक्त कर दी। सत्यवान बरगद के नीचे गहरी नींद से जागे।
बरगद वृक्ष सब देख रहा था। उसी दिन से हर ज्येष्ठ अमावस्या को हिंदू महिलाएँ बरगद पर धागा बाँध वही वर माँगती हैं - 'मेरे पति दीर्घायु, स्वस्थ रहें, इस व 7 जन्मों तक उनकी सेवा करूँ।'
यह वह व्रत है जो पतियों को - मृत्यु से भी - लौटा लाता है।
बरगद के नीचे वट सावित्री पूजा विधि - चरण दर चरण

यदि शहर में बरगद उपलब्ध नहीं, तो बरगद की टहनी घर लाकर जलपात्र में रखकर पूजा करें। व्रत मान्य रहेगा।
आवश्यक सामग्री:
- लाल सूती धागा (100 हाथ + 8 लड़ी = 108 परिक्रमा हेतु)
- रोली, चंदन, अक्षत, कुमकुम, हल्दी, मेहंदी
- लाल चूड़ियाँ, लाल वस्त्र, लाल फूल (विशेषतः गुड़हल)
- 16 श्रृंगार (बिंदी, सिंदूर, कंगन इत्यादि)
- पत्तों का पंखा (ताड़ या आम का पत्ता)
- मेवा, खीर, चना, गुड़
- गंगाजल, कच्चा दूध
- सावित्री-सत्यवान का चित्र (या प्रिंटआउट)
- वट (बरगद) वृक्ष - या टहनी यदि वृक्ष उपलब्ध न हो
चरण 1 - व्रत पूर्व तैयारी (26 मई संध्या): केवल एक सात्विक भोजन लें। सूर्यास्त के बाद कुछ न खाएँ। हाथों में मेहंदी लगाएँ। अगले दिन के 16 श्रृंगार तैयार रखें।
चरण 2 - स्नान व श्रृंगार (27 मई प्रातः): सूर्योदय से पहले स्नान। लाल या पीली साड़ी (सुहागिन के रंग)। पूर्ण 16 श्रृंगार - माँग में सिंदूर, बिंदी, चूड़ियाँ, काजल, मेहंदी इत्यादि। सुहागिन का श्रृंगार ही इस व्रत का शस्त्र है।
चरण 3 - संकल्प: बरगद के समक्ष पूर्व मुख बैठें। संकल्प लें - 'मैं [अपना नाम], [पति का नाम] की पत्नी, इस ज्येष्ठ अमावस्या को वट सावित्री व्रत रखती हूँ। सावित्री माता व वट वृक्ष से पति की दीर्घायु, स्वास्थ्य व इस व 7 जन्मों के साथ की प्रार्थना करती हूँ।'
चरण 4 - वट वृक्ष पूजा: बरगद की जड़ों पर दूध मिला जल अर्पण। तने पर रोली-चंदन-हल्दी-कुमकुम लगाएँ। अक्षत व लाल फूल अर्पित। सावित्री-सत्यवान का चित्र जड़ में रखें।
चरण 5 - कथा श्रवण: ऊपर दी गई सावित्री-सत्यवान कथा पढ़ें या सुनें। संतान हो तो उन्हें भी सुनाएँ - परंपरा जीवित रहेगी।
चरण 6 - 108 परिक्रमा धागे सहित: बरगद की 108 परिक्रमा करें (न हो सके तो न्यूनतम 7)। प्रत्येक परिक्रमा पर तने पर धागे का एक फेरा बाँधें और जपें: 'ॐ वट सावित्र्यै नमः' प्रत्येक चक्र में पति की दीर्घायु की प्रार्थना करें।
चरण 7 - भोग अर्पण: चना, गुड़, मेवा व खीर वृक्ष को अर्पित। पत्तों के पंखे से वृक्ष पर 7 बार हवा करें - वह हवा जो सत्यवान को जीवित करने वाली पवन का प्रतीक है।
चरण 8 - आरती व प्रसाद: घी का दीया जलाएँ। सावित्री आरती करें। वृक्ष के तथा परिवार की किसी वरिष्ठ सुहागिन के चरण स्पर्श करें - उनका आशीर्वाद लें। अन्य सुहागिनों में प्रसाद बाँटें (पुरुष या अविवाहित कन्या को यह प्रसाद नहीं)।
चरण 9 - व्रत पारण: अमावस्या तिथि समाप्त (4:16 PM) के बाद पहले चना-गुड़ प्रसाद से, फिर एक सात्विक भोजन से व्रत खोलें। आज अन्न, प्याज, लहसुन वर्जित।
वट सावित्री व्रत पर हर विवाहित महिला के लिए 7 नियम
1. आज पति से कोई वाद-विवाद नहीं - चाहे वह गलत ही क्यों न हों। वट सावित्री पर पति से कठोर बोलना पूरा व्रत भंग करता है। वह दूर हों तो फोन पर प्रेम से बात करें।
2. पूर्ण 16 श्रृंगार - माँग में सिंदूर सबसे महत्वपूर्ण। श्रृंगार रहित व्रत हाथ जोड़े बिना की गई प्रार्थना के समान है। यह एक दिन अपना पूरा सुहाग सम्मान का है।
3. अमावस्या समाप्ति तक न अन्न, न जल (निर्जल व्रत) - जो महिलाएँ निर्जल न रख सकें, एक बार फल-दूध मान्य (फलाहार व्रत)। कभी अन्न, नमक या प्रसंस्कृत भोजन नहीं।
4. न्यूनतम 7 परिक्रमा - 108 आदर्श, पर आयु/स्वास्थ्य न दे तो 7 व्रत पूर्ण करने हेतु न्यूनतम। 7 से कम अपूर्ण।
5. धागा एक वर्ष तक रखें - परिक्रमा के धागे का छोटा टुकड़ा कलाई पर बाँधें, अगली वट सावित्री तक रखें। यह आपका रक्षा कवच है।
6. पहला भोग गौ, फिर ब्राह्मण, फिर सुहागिन - देने से पूर्व स्वयं न खाएँ। चना+गुड़ का छोटा टुकड़ा भी संभव हो तो पहले गौ को।
7. दिन में न सोएँ - सावित्री सत्यवान की मृत्यु से पहले तीन दिन नहीं सोई थीं। उनका अनुसरण करते हुए आप भी सूर्य के रहते जागें। अमावस्या समाप्ति के बाद ही विश्राम।
वट सावित्री पर पूर्ण निषेध:
- बाल, नाखून या कोई धागा न काटें
- किसी कीट की हिंसा न करें (विशेषतः बरगद पर चींटी/मकड़ी)
- काले, सफेद या फीके रंग न पहनें
- नकारात्मक शब्द न बोलें - 'मृत्यु', 'रोग', 'असफलता'
- अपना सिंदूर या बिंदी किसी और को स्पर्श न करने दें
सावित्री और सत्यवान की संपूर्ण कथा: वट सावित्री व्रत के पीछे की पौराणिक कथा
सावित्री और सत्यवान की कहानी महाभारत के वन पर्व से है - स्वयं मृत्यु के देवता के साथ एक बौद्धिक वाद-विवाद जो तर्क, प्रेम और अटूट उपस्थिति से जीता गया।
पृष्ठभूमि: सावित्री एक असाधारण सुंदर और बुद्धिमान राजकुमारी थीं। उन्होंने वन में सत्यवान को चुना।
भयानक भविष्यवाणी: ऋषि नारद ने घोषणा की कि सत्यवान एक वर्ष में मरेंगे। सावित्री ने अपना निर्णय नहीं बदला।
यम के साथ मुठभेड़: जब यम सत्यवान की आत्मा लेने आए, सावित्री पीछे चल पड़ीं।
तीन वरदान: 1. श्वसुर की दृष्टि बहाली 2. ससुराल का राज्य वापसी 3. सत्यवान से सौ पुत्र - इससे यम फंस गए!
शिक्षा: सावित्री ने भीख नहीं मांगी - उन्होंने दार्शनिक वाद-विवाद किया।
वंदना ऐप पर सावित्री-सत्यवान कथा का ऑडियो संस्करण उपलब्ध है।
वट सावित्री व्रत के मंत्र और आधुनिक महिलाओं के लिए संपूर्ण पूजा विधि

वट सावित्री पूजा हिंदू कैलेंडर की सबसे सुंदर सेरेमनियों में से एक है - प्रकृति पूजा, पैतृक वंदना और वैवाहिक भक्ति को एक अनुष्ठान में जोड़ती है।
तैयारी: सूर्योदय पर व्रत शुरू करें। लाल या पीले वस्त्र पहनें। थाली में: कच्चा सूती धागा, कुमकुम, हल्दी, फूल, सुपारी, पान के पत्ते, दीया, अगरबत्ती।
संकल्प: पूर्व दिशा में मुंह करके जल लेकर संकल्प बोलें।
पूजा क्रम: 1. वट वृक्ष की जड़ों पर कुमकुम और हल्दी लगाएं 2. फूल अर्पित करें 3. दीया और अगरबत्ती जलाएं 4. सुपारी और पान के पत्ते रखें
परिक्रमा: धागा पकड़कर 7 बार वृक्ष की परिक्रमा करें। प्रत्येक चक्कर में मंत्र पढ़ें।
व्रत तोड़ना: सूर्यास्त पर चंद्रमा देखकर प्रसाद से व्रत तोड़ें।
वंदना ऐप पर वट सावित्री पूजा ऑडियो गाइड और सावित्री कथा उपलब्ध है।
त्वरित उत्तर
क्या अविवाहित कन्या या विधवा वट सावित्री व्रत रख सकती हैं?+
अविवाहित कन्याएँ संशोधित रूप में रख सकती हैं - भविष्य में उत्तम, दीर्घायु पति की प्रार्थना हेतु। पीला पहनें (लाल नहीं), सिंदूर न लगाएँ, सत्यवान जैसे पति के लिए सावित्री से प्रार्थना करें। विधवाएँ पारंपरिक रूप से यह व्रत नहीं रखतीं, पर बरगद पर जाकर दिवंगत पति की आत्मा हेतु प्रार्थना कर सकती हैं - आधुनिक व्यवहार में कोई निषेध नहीं।
यदि घर के पास बरगद का पेड़ न हो तो?+
एक दिन पहले जाकर बरगद की छोटी टहनी कुछ पत्तों सहित ले आएँ। मिट्टी-जल भरे गमले में लगाएँ। सारी पूजा गमले के चारों ओर करें। वैकल्पिक रूप से बरगद के चित्र को चौकी पर रखकर पूजा करें। व्रत भाव पर आधारित है - स्थान पर नहीं। 108 धागे की परिक्रमा टहनी/चित्र पर करें।
क्या निर्जल व्रत के बिना वट सावित्री व्रत किया जा सकता है?+
हाँ - फलाहार व्रत (दिन में एक बार फल+दूध) पूर्णतया मान्य। निर्जल पारंपरिक व अधिकतम पुण्य देता है, पर स्वास्थ्य प्राथमिक। गर्भवती, स्तनपान कराने वाली, मधुमेह रोगी या 60+ महिलाएँ केवल फलाहार करें। पति की दीर्घायु आपके निर्जलन पर नहीं - भक्ति पर निर्भर है।
क्या वट सावित्री और करवा चौथ एक ही हैं?+
दोनों पति की दीर्घायु के व्रत हैं, पर भिन्न। करवा चौथ (अक्टूबर) में सूर्यास्त के बाद चंद्र दर्शन व छलनी से पति का मुख देखना होता है। वट सावित्री (मई/जून) दिन में बरगद के चारों ओर 108 परिक्रमा व सावित्री-सत्यवान कथा। दोनों शक्तिशाली हैं - अनेक महिलाएँ दोनों रखती हैं। वट सावित्री अधिक प्राचीन व महाभारत में उल्लिखित; करवा चौथ बाद में प्रचलित हुआ।
About the author
Pandit Mahesh Trivedi · Festival Traditions & Panchang
Pandit Mahesh leads the festival-date and Panchang content on Vandnaa. He cross-references multiple regional panchangs (Drik, Vaishnava, Bengali, Marathi) for every festival date published on the site.
Meet the Vandnaa editorial team →


